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आप किस तरह की जॉब करते हैं, इसकी परिभाषा तय कर रही है सरकार!  

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली समेत एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन से लाखों कामगारों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है. देश में पटाखों के मैन्युफैक्चरिंग का हब तमिलनाडु का शिवकाशी और यहां काम करने वाले लोग इस बैन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. कुल मिलाकर 8 लाख लोगों की जॉब संकट में पड़ती दिख रही है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली समेत एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन से लाखों कामगारों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है. देश में पटाखों के मैन्युफैक्चरिंग का हब तमिलनाडु का शिवकाशी और यहां काम करने वाले लोग इस बैन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. कुल मिलाकर 8 लाख लोगों की जॉब संकट में पड़ती दिख रही है.

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    फॉर्मल जॉब की संख्‍या में अपेक्षित इजाफा नहीं होता देख सरकार अब इसकी परिभाषा बदलने की जुगत में जुट गई है. नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया की अध्‍यक्षता वाली एक समिति ने इस तरह की सिफारिश भी कर डाली है. समिति ने कहा है कि देश में रोजगार के जितने अवसर निकलते हैं, उसके सही आंकड़े नहीं मिल पाते हैं और अक्‍सर ये आंकड़े वास्‍तविकता से कम होते हैं. इस कारण लगातार माथापच्‍ची के बावजूद इस मसले पर सरकार खुद को लाचार पाती है.

    व्‍यावहारिक परिभाषा अपनाने पर बल
    टास्‍क फोर्स ने फॉर्मल वर्कर्स की व्‍यावहारिक परिभाषा अपनाने की सिफारिश की है. पैनल ने कहा है कि वैसे वर्कर्स को भी फॉर्मल वर्कर्स की कैटेगरी में शामिल करना चाहिए, जिन्‍हें प्राइवेट इंश्‍योरेंस या पेंशन कवर प्राप्‍त है. पैनल के अनुसार, जिसका टीडीसी कटता है और जो वैसी कंपनियों में काम करता है, जिन्‍हें जीएसटीएन से बाहर रखा गया है, उन्‍हें भी जॉब्‍स की इस काउंटिंग में शामिल किया जाना चाहिए.

    पैनल की ये हैं सिफारिशें
    मई में गठित पैनल ने कहा है कि नीचे दिए गए संगठनों में से किसी एक के तहत कवर्ड लोगों को भी फॉर्मल वर्कर्स माना जाना चाहिए.

    1. इम्‍पलॉईज स्‍टेट इंश्‍योरेंस एक्‍ट 1948

    2. इम्‍पलॉईज प्रोविडेंट फंड्स और मिसलेनियस प्रॉविजन एक्‍ट 1952 या फिर ऐसी अन्‍य सोशल सिक्‍युरिटी स्‍कीम

    3. सरकारी और अन्‍य पब्लिक सेक्‍टर कर्मी

    4. प्राइवेट इंश्‍योरेंस या पेंशन स्‍कीम या पीएफ फंड्स के तहत आने वाले वर्कर्स

    5. फॉर्म 16 या फिर ऐसे अन्‍य इनकम टैक्‍स फॉर्म के जरिए टीडीएस देने वाले वर्कर्स


    पैनल का कहना है कि भारतीय कंपनियों में कर्मचारियों के साथ अधिकांश मामलों में लिखित अनुबंध नहीं होता है और लगभग 75 फीसदी वर्कर्स ऐसी कंपनियों में काम करते हैं जिनमें 10 से कम वर्कर्स हैं.

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