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न मांग बढ़ी, न प्रोडक्शन की कमी, फिर कौन बढ़ा रहा राशन और सब्जियों का दाम

न मांग बढ़ी, न प्रोडक्शन की कमी, फिर कौन बढ़ा रहा राशन और सब्जियों का दाम

किसानों को दाम नहीं मिल रहा है और खरीदने वालों को महंगी मिल रही हैं सब्जियां (Symbolic picture)

किसानों को दाम नहीं मिल रहा है और खरीदने वालों को महंगी मिल रही हैं सब्जियां (Symbolic picture)

किसान नेता का आरोप-केंद्र सरकार के आदेश के बावजूद सब्जियों और अनाज को नहीं ले जाने दे रही पुलिस, बिचौलियों की भी बड़ी भूमिका, जानिए मंडी भाव से रिटेल में कितना महंगा है आलू, प्याज और टमाटर

नई दिल्ली. इस वक्त देश में राशन (Ration) व सब्जियों (Vegetables) की मांग और आपूर्ति की स्थिति कुछ ऐसी है कि जैसे प्लेट में खाना सजा है और पेट में भूख है. लेकिन मुंह में निवाला मुश्किल से जा रहा है. हाथ काम नहीं कर रहा है. ठीक समझे हैं आप. इन चीजों की डिमांड और सप्लाई में हाथ की भूमिका निभाते हैं ट्रक वाले, गोदाम और मंडियां. कोविड-19 लॉकडाउन (Covid-19 Lockdown) की वजह से माल लेकर ट्रक आ नहीं पा रहे हैं. ऐसे में न किसानों (farmers) को उचित दाम मिल पा रहा है न तो उपभोक्ता को सही रेट पर सामान. मुनाफा लूट रहे हैं राशन और सब्जियों के कारोबारी और मुनाफाखोर. जबकि न तो डिमांड बढ़ी है और न प्रोडक्शन की कमी है. सरकार ने कृषि गतिविधियों को छूट भी दे दी है. लेकिन मामला संभल नहीं रहा. तो फिर अड़चन क्या है, किसानों की मेहनत का फल कौन खा रहा है?

पुलिस की वजह से रोके जा रहे सब्जियों, अनाज के ट्रक: सिंह

हमने इसका जवाब किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह से तलाशने की कोशिश की. वो कहते हैं कि अनाज, दूध, चीनी और सब्जियों का उत्पादन सरप्लस है. छिंदवाड़ा सहित कई जगह टमाटर खेतों में सड़ रहा है, लेकिन पुलिस तंत्र सामान को पहुंचने नहीं दे रहा. केंद्र सरकार के आदेश के बावजूद पुलिस वालों की भ्रष्ट कार्य प्रणाली की वजह से ट्रक रास्ते में रोके जा रहे हैं. इसलिए खरीदने वाले को महंगा सामान मिल रहा है और किसान को अपना उत्पाद या तो सस्ते में बेचना पड़ रहा है या फिर वे फेंकने को मजबूर हो रहे हैं. इसमें बड़ी भूमिका बिचौलियों की भी है. इन दोनों ने मिलकर सप्लाई चेन को ध्वस्त कर दिया है.

मांग और उत्पादन में कोई दिक्कत नहीं है. सिर्फ वस्तुओं (commodity) की आपूर्ति में गड़बड़ी है. यानी उत्पादक से खरीदने वाले तक पहुंचाने की दिक्कत है. ये परेशानी पुलिसिया तंत्र की वजह से आ रही है. पुलिस वालों को यह समझना होगा कि कोई भी ट्रक पिकनिक मनाने के लिए नहीं जाता है. वो जब भी सड़क पर आता है तो जरूरी सामान की सप्लाई कर रहा होता है. गेहूं गोदामों में भरा पड़ा है लेकिन मिलें खरीद नहीं पा रही हैं.

lockdown impact on fruits, vegetables 6, देहरादून की सब्जी मंडी में फलों के दाम रिटेल में बिकने वाले फलों से काफ़ी कम हैं. सब्जी मंडी में अंगूर 30 से 35 रुपये किलो, संतरा 30 रुपये किलो, सेब 50 से 80 रुपये किलो और केला 30 रुपये दर्जन बिक रहा है लेकिन रिटेल में यह सब दोगुने दामों पर बिक रहे हैं.
आलू, प्याज, टमाटर के मंडी और खुदरा रेट में कई गुना का अंतर है


मंडी और खुदरा रेट में इतना अंतर क्यों?

टमाटर: राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) के मुताबिक आंध्र प्रदेश की मदनपल्ली बाजार में टमाटर (Tomato) 370 से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रहा है. जबकि उत्तर प्रदेश की खलीलाबाद मंडी में इसका दाम 605 रुपये, अलीगढ़ में 1400, चंदौली में 2000 और हरियाणा के चरखी दादरी में 1800 रुपये प्रति क्विंटल है. यानी अधिकतम 20 रुपये किलो. लेकिन खुदरा रेट 50 रुपये तक है.

प्याज: महाराष्ट्र की येवला मंडी में प्याज (Onion) का रेट 666 से 1,065 रुपये प्रति क्विंटल है. यूपी के अकबरपुर में 1400 रुपये, खैर-अलीगढ़ में 2000, खलीलाबाद में 1500 और हरियाणा के चरखी दादरी में 1200 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन खुदरा मार्केट में इसका रेट 35 से 40 रुपये है.

आलू:  पंजाब की जालंधर मंडी में आलू (Potato) का अधिकतम रेट 1,400, अमृतसर में 1,150, यूपी के खलीलाबाद में 800, खैर-अलीगढ़ में 1,000, चंदौली में 14,00,  दादरी में 1,350, हरियाणा के चरखी दादरी में 1,600 और हिमाचल के चंबा में 2,000 रुपये प्रति क्विंटल है. लेकिन खुदरा मार्केट में यह 35 रुपये किलो तक बिक रहा है.

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प्याज का थोक रेट 6.66 से 15 रुपये किलो तक है


किसानों को स्थानीय मंडी तक सीमित रखने वाले एक्ट सस्पेंड हों

मंडी और खुदरा रेट में कई गुना का अंतर क्यों रहता है. आपके जेहन में भी यह सवाल उठता ही होगा. किसी चीज की बंपर पैदावार के बावजूद खुदरा बाजार में उसकी कीमत कम क्यों नहीं होती? कुछ कृषि विशेषज्ञ इसकी वजह एपीएमसी (कृषि उत्पादन बाजार समिति) एक्ट को भी बताते हैं. जिसके जरिए व्यापारियों और कमीशन एजेंटों का गठजोड़ (कार्टेल) बनता है और भाव कम नहीं होता.

एपीएमसी एक्ट की वजह से व्यापारी और कमीशन एजेंट किसानों पर अनाप-सनाप शर्तें थोपते हैं. एपीएमसी के लाइसेंसधारी ट्रेडर आपस में गठजोड़ करके किसानों से कम भाव पर उनकी उपज खरीद लेते हैं. बाद में कीमतें बढ़ाकर भारी मुनाफा कमाते हैं. अगर यह एक्ट खत्म कर दिया जाए तो कोई भी किसान किसी भी रिटेल मार्केट में जाकर सीधे-सीधे ग्राहकों को अपनी उपज बेच सकता है.

स्थानीय मंडी में अपनी उपज बेचने के लिए बाध्य है किसान

कृषि मामलों के विशेषज्ञ पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि एपीएमसी के साथ-साथ असेंसिसयल कमोडिटी एक्ट (Essential Commodities Act) को भी कृषि क्षेत्र से कम से कम साल भर के लिए सस्पेंड किया जाना चाहिए. दोनों एक्ट के सस्पेंड होने से कोई भी किसान कहीं भी कृषि उत्पाद की खरीद और बिकी करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा. किसान को मंडी में जाने की दिक्कत नहीं होगी. जो भी उससे खरीदना चाहे खरीद लेगा. इस एक्ट की वजह से किसान अपना उत्पाद स्थानीय मंडी में बेचने के लिए बाध्य हैं. मंडी ही माध्यम है. इन दोनों एक्ट के सस्पेंड होने से मंडी में भीड़ भी कम हो जाएगी.

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Tags: Farmer, Inflation, Kisan, Lockdown. Covid 19, Ministry of Agriculture

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