शुगर एक्सपोर्ट पर सब्सिडी का प्रस्ताव घटा, जानिए क्या होगा इसका असर

शुगर एक्सपोर्ट पर सब्सिडी 3.5 रुपये प्रति किलो घटाने का प्रस्ताव है.

केंद्रीय खाद्घ मंत्रालय ने शुगर एक्सपोर्ट (Sugar Export) पर सब्सिडी प्रस्ताव को 9.5 रुपये से 6 रुपये प्रति किलाग्राम तक घटा दिया है. कुछ दिन पहले ही शुगर इडस्ट्री ने अत्यधिक स्टॉक के कारण चीनी कीमतों को लेकर चिंता जाहिर की थी.

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    नई दिल्ली. शुगर इंडस्ट्री के लिए शुगर एक्सपोर्ट (Sugar Export) पर सब्सि​डी का प्रस्ताव घटा दिया गया है. आज शाम को शुगर एक्सपोर्ट पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर बैठक भ होनी है. CNBC-आवाज़ ने सूत्रों के हवाले से यह जानकरी दी है. पहले शुगर एक्सपोर्ट पर सब्सिडी का प्रस्ताव 9.5 रुपये प्रति किलोग्राम करने की मांग थी. अब इस घटाकर 6 रुपये प्रति किलाग्राम कर दिया गया है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, खाद्घ मंत्रालय ने सब्सिडी का प्रस्ताव घटाया है.​ नवंबर महीने के आखिरी सप्ताह में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल शुगर इंडस्ट्रीज के साथ बैठक की थी.

    कुछ दिन पहले ही शुगर इडस्ट्री ने अत्यधिक स्टॉक के कारण चीनी कीमतों को लेकर चिंता जाहिर की थी. यह इंडस्ट्री अक्टूबर-नवंबर में अपनी बैलेंस शीट तय करता है, जिसमें अपेक्षित उत्पादन, पिछले साल के स्टॉक का कैरी फॉरवर्ड, घरेलू खपत और निर्यात को ध्यान में रखा जाता है.


    सीज़न के शुरुआत में ​ही निर्यात के लिए क्यों तैयार है शुगर इंडस्ट्री?
    एक रिपोर्ट के अनुसार जिस सीजन की शुरुआत हुई, उसके लिए सालाना उत्पादन 326 लाख टन (इथेनॉल के बिना) होने का अनुमान लगाया गया और सीजन की शुरुआत 107 लाख टन के स्टॉक से हुई. हालांकि, उद्योग के सूत्रों का अनुमान है कि चीनी का उत्पादन 20 लाख टन कम हो सकता है क्योंकि मिलों से इथेनॉल का उत्पादन होने की उम्मीद है और इस प्रकार इस सीजन में कुल उपलब्ध चीनी बैलेंस 413 लाख टन होने की उम्मीद है. 260 लाख टन की घरेलू खपत में कटौती के बाद, अगले सीजन (2021-22 के सीजन) का शुरुआती स्टॉक 155 लाख टन होने का अनुमान है.

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    बिना ​सब्सिडी के निर्यात के लिए क्यों तैयार नहीं शुगर इंडस्ट्री?
    दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट और कच्चे माल की कीमत में अंतर है. अंतरराष्ट्रीय बाजरों में शुगर कॉन्ट्रैक्ट 21-22 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से ट्रेड कर रहे हैं जबकि उत्पादन लागत 32 रुपये प्रति किलोग्राम है. इसे बेमेल ने सभी निर्यात संभावनाओं को खत्म किया है क्योंकि मिलों का इससे और ज्यादा नुकसान होगा. मिलों को समस्या का सामना करना पड़ता है जबकि भारतीय चीनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान बनाई है.

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