SBI समेत कई सरकारी बैंक ने डूबे कर्ज पर लिया ये फैसला

सरकारी बैंकों ने एनपीए (डूबे कर्ज) से निपटने की कोशिश तेज कर दी है. एसबीआई ने 3948 करोड़ रुपये के 8 एनपीए बेचने के लिए बोली मंगाई है. आइए जानें क्या होते है एनपीए और कैसे डालते आपकी जेब पर असर?

News18Hindi
Updated: September 11, 2018, 5:28 PM IST
SBI समेत कई सरकारी बैंक ने डूबे कर्ज पर लिया ये फैसला
SBI समेत कई सरकारी बैंक ने डूबे कर्ज पर लिया ये फैसला
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Updated: September 11, 2018, 5:28 PM IST
सरकारी बैंकों ने एनपीए (डूबे कर्ज) से निपटने की कोशिश तेज कर दी है. एसबीआई ने 3948 करोड़ रुपये के 8 एनपीए बेचने के लिए बोली मंगाई है. वहीं आंध्रा बैंक ने 1553 रुपये के 53 एनपीए बेचने के लिए बोली मंगाई है. पीएनबी ने भी पिछले 5 महीनों यानि अप्रैल और अगस्त में डिफॉल्टरों से 11 हजार 378 करोड़ रुपये की रिकवरी की है.आपको बता दें कि रिजर्व बैंक ने 200 बड़े खातों की जांच शुरू कर दी है. (ये भी पढ़ें-SBI ने बदला कैश जमा करने का नियम, जान लें ये जरूरी बातें )

क्या होते हैं एनपीए- एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बैंक का वो कर्ज जो डूब गया हो और जिसे फिर से वापस आने की उम्मीद नहीं के बराबर हो उसे एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) कहा जाता है. वीएम पोर्टफोलियो के हेड विवेक मित्तल बताते हैं कि अक्सर अगर बैंक को कर्ज की किश्त 3 महीने पर नहीं आती है तो उस अकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया जाता है. हालांकि, यह मुमिकन है कि उसमें से कुछ रकम वापस आ भी जाए. (ये भी पढ़ें-Post Office Vs SBI: जानें कहां FD कराने पर आपको मिलेगा ज्यादा रिटर्न)

सरकारी बैंकों की हालत बेहद खराब- रेटिंग एजेंसी केयर की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 8 ऐसे सरकारी हैं जिनका एनपीए रेशियो 15 फीसदी से ज्यादा है. दो बैंक- आईडीबीआई और इंडियन ओवरसीज- का रेशियो तो 22 फीसदी से ज्यादा है.

क्या है समाधान- विवेक मित्तल बताते हैं कि बैंकों के पैसा डूबने का सीधा मतलब कि बैंक के पास कर्ज देने की रकम में कमी आ गई है. इससे कर्ज देने की रफ्तार में कमी आएगी. लिहाजा अर्थव्यवस्था में सुस्ती बढ़ेगी. मतलब यह कि किसी एक को ठीक कीजिए तो दूसरा अपने आप ठीक होगा.

सबसे अचूक इलाज है अर्थव्यवस्था में तेजी. लेकिन तेजी बहुत सारे फैक्टर्स पर निर्भर करते हैं. तत्काल सरकार ने बैंकों में नई पूंजी डालने का जो फैसला किया है उससे कुछ फायदा हो सकता है. नई पूंजी आने से बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए रकम बढ़ेगी तो बैंकों की सेहत में सुधार हो सकता है.
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