दुनिया के सबसे बड़े व्यापार समझौते में क्यों शामिल नहीं हुआ भारत, क्या होगा इसका असर?

बैंकॉक में आयोजित ASEAN सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (REUTERS/Soe Zeya Tun)
बैंकॉक में आयोजित ASEAN सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (REUTERS/Soe Zeya Tun)

RCEP समझौते पर रविवार को चीन समेत 15 देशों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. RCEP का मकसद आसियान और एफटीए साझेदारों के साथ आधुनिक, व्यापक और उच्च-गुणवत्ता की आर्थिक साझेदारी बनाने पर है, लेकिन भारत ने पिछले साल ही इससे अपना नाम वापस ले लिया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 16, 2020, 9:14 AM IST
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नई दिल्ली. पूरी दुनिया की GDP में करीब 26 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा की हिस्सेदारी रखने वाले एशिया-पैसिफिक क्षेत्र (Aisa-Pacific Region) के 15 देशों ने रविवार को दुनिया के सबसे बड़े व्यापार डील पर ह​स्ताक्षर कर दिए हैं. इन 15 देशों के बीच खास सहमति से दुनिया की एक तिहाई आबादी पर असर पड़ेगा. क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (RCEP) पर 10 राष्ट्रों वाले दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (ASEAN) के वार्षिक शिखर सम्मेलन के इतर रविवार को डिजिटल माध्यम से इस पर हस्ताक्षर किए गए. इस डील के साथ ही RCEP का मकसद है कि आसियान और FTA (Free Trade Agreement) साझेदारों के साथ आधुनिक, व्यापक और उच्च-गुणवत्ता की आर्थिक साझेदारी सहमति बन सके. सभी सदस्य देशों को इसका परस्पर लाभ मिल सकेगा.

हालांकि, चीन समेत 15 देशों के इस समूह में भारत का नाम नहीं है. पिछले साल नवंबर में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने सभी सदस्यों को चौंकाते हुए भारत का नाम वापस से ले लिया था. इस समूह से भारत के निकल जाने के बाद अन्य सभी 15 देशों ने रविवार को RCEP पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. माना जा रहा है कि इनमें से कई देश आर्थिक रूप से ​चीन पर निर्भर हो रहे हैं. उनका कहना है कि इस समझौत के साथ ही चीन अब ए​शिया-पैसिफिक क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाना चाहता है.

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क्या है RCEP?
नवंबर 2012 में कम्बोडिया में 10 आसियान देशों और 6 FTA साझेदार देशों के बीच क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी पर पहली बार बातचीत हुई थी. 10 आसियान देशों में ब्रुनेई दारुस्सलम, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लोआस, मलेशिया, म्यांमार, फिलिपिंस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम शामिल थे. जबकि 10 मुक्त व्यापार समझौता साझेदारों में ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, कोरिया और न्यूजीलैंड शामिल थे.

इस समझौते के तहत सभी सदस्य देशों के लिए टैरिफ कटौती पर एक जैसे ही मूल नियम होंगे. इसका मतलब है कि वस्तुओं के आयात-निर्यात के लिए तय प्रक्रियाएं कम होंगी और कारोबार करने में सहूलियत मिलेगी. इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियां (Multi-National Companies) इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए ​आएंगी. साथ ही इस क्षेत्र को सप्लाई चेन और डिस्ट्रीब्युशन हब के तौर पर विकसित करने में मदद मिलेगी.

चूंकि, आयात के लिए चीन एक प्रमुख सोर्स होने के साथ-साथ अधिकतर सदस्य देशों के लिए निर्यातक भी है, ऐसे में माना जा रहा है कि इस डील से चीन अब एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में व्यापार नियम को अपने तरीके से प्रभावित कर सकता है. चीन का जोर इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बढ़ाने पर हो सकता है. नये टैरिफ 2022 से लागू हो जाएंगे, जिसके बाद सभी सदस्य देशों के बीच आयात-निर्यात शुल्क 2014 के स्तर पर पहुंच जाएंगे.

RCEP पर हस्ताक्षर करने वाले 15 देशों के नेता वर्चुअल ग्रुप फोटो में. (Reuters)


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भारत ने क्यों लिया आरसीईपी से बाहर निकलने का फैसला?

RCEP समझौते से भारत के निकलने की सबसे बड़ी वजह कुछ मुख्य चिंताओं पर कोई बात नहीं होना था. टैरिफ अंतर के कारण मूल नियमों के कुछ खतरे थे. व्यापार घाटे और सेवाओं को शुरू किए जाने के मुद्दों पर निष्पक्ष रूप से सहमति बनाने की जरूरत थी.

समझौते के बाद आसान सेवाओं और निवेश नियमों के साथ आयात शुल्क में 80 से 90 फीसदी की गिरावट आती. भारत की कुछ कंपनियों को डर था कि आयात शुल्क में गिरावट के बाद देश में बड़े स्तर पर आयात शुरू हो जाएगा. खासतौर से चीन से आयात बढ़ेगा, जिसके साथ पहले से ही भारत का व्यापार घाटा बहुत ज्यादा है. RCEP के अन्य सदस्य देशों के साथ भी भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा था.

बातचीत के दौरान भारत सरकार ने सर्वाधिक सहाययुक्त राष्ट्र (MFN - Most Favored Nation) के मुद्दे की अनुपलब्धता पर भी बात की थी. MFN के तहत भारत को RCEP सदस्यों को भी वही लाभ देना अनिवार्य हो जाता जो कुछ अन्य देशों को देता है. भारत ने टैरिफ कटौती के लिए 2014 को आधार बनाने पर भी सवाल खड़ा किया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत ने यह फैसला देश के लोगों की जिंदगी और उनके जीवनयापन को ध्यान में रखते हुए लिया है, खासतौर से समाज के ​वंचित वर्ग को. इस समझौते से अपना नाम वापस लेने के बाद भी अधिकारियों का कहना है कि भविष्य के RCEP सदस्य बनने की गुंजाईश है.

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थाईलैंड में आयोजित 16वें आसियान सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


भारत के लिए क्या है इसका मतलब?

RCEP में भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होता. जानकारों का कहना है कि भारत को निवेश के मोर्चे पर नुकसान उठना पड़ सकता था और उपभोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा भुगतान करना पड़ता. खासतौर पर एक ऐसे समय में, जब कोविड-19 महामारी की वजह से वैश्विक व्यापार, निवेश और सप्लाई चेन के लिए अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी हैं. सदस्य देशों के पास भारतीय बाजार में पहुंच के मोके खत्म हो जाएंगे.

भारत के लिए यह एक मौका है कि अपने घरेलू उद्योगों को मजबूत बनाया जा सके और आत्मनिर्भर बनने के सपने को साकार किया जा सके. डेयरी, कृषि, स्टील, प्लास्टिक, कॉपर, एल्युमिनियम, मशीन टूल्स, पेपर, ऑटोमोबाइल्स, केमिकल्स समेत कई अन्य सेक्टर्स के लिए आरसीईपी समझौते पर भारत असहमत था. सस्ते विदेशी सामानों से घरेलू कारोबार पर असर पड़ता.
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