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रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप- खुलने की चुनौतियां, बंद होने के खतरे

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Updated: November 5, 2019, 6:34 PM IST
रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप- खुलने की चुनौतियां, बंद होने के खतरे
आरसेप यानी रीजनल कांप्रिहेंसिव इकनोमिक पार्टनरशिप

RCEP समझौता एक ऐसा प्रस्त‍ावित व्यापक व्यापार समझौता है, जिसके लिए आसियान (ASEAN) के 10 देशों के अलावा 6 अन्य देश-चीन, भारत, दक्ष‍िण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच बातचीत चल रही थी.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 6:34 PM IST
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नई दिल्ली. भारत सरकार ने रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) में शामिल नहीं होने का फैसला किया है. इस फैसले के गंभीर आर्थिक और राजनीतिक परिणाम हैं. रीजनल कॉम्प्रीहेन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) यानी आरसेप समझौता एक ऐसा प्रस्त‍ावित व्यापक व्यापार समझौता है, जिसके लिए आसियान (ASEAN) के 10 देशों के अलावा 6 अन्य देश-चीन, भारत, दक्ष‍िण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच बातचीत चल रही थी. इसके लिए बातचीत साल 2013 से ही चल रही थी. मोटे तौर पर इस आरसेप का उद्देश्य एक एकीकृत बाजार बनाने का था, यानी आरसेप के तमाम सदस्य देशों को एक दूसरे के बाजार में जाने मे आसानी सुनिश्चित की जा सके, ऐसी आरसेप से उम्मीद थी. भारत के अलावा आरसेप में 15 दूसरे देश हैं. जाहिर है, अब समझौते में 15 देश रहेंगे, भारत नहीं रहेगा. यूं भारत के इस समझौते में ना रहने से इस समझौते के आर्थिक और राजनीतिक महत्व में कमी आयेगी फिर भी इस समझौते का अपना अलग महत्व है. अगर भारत आरसेप में शामिल हो जाता तो फिर समग्र तौर पर आरसेप देशों का बाजार इतना बड़ा हो जाता कि दुनिया की लगभग आधी आबादी इन देशों की निवासी होती और ग्लोबल सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान एक तिहाई होता.

भारत के पास क्या है देने को
भारत के पास बहुत बड़ा बाजार है, आबादी के मामले में दुनिया का दूसरे नंबर का मुल्क होने के कई फायदे हैं. आबादी मतलब बाजार, जिसमें घुसने के लिए कई देश, कई कंपनियां उत्सुक होंगी, स्वाभाविक है. भारत की सेवा क्षेत्र में महाऱथ है, यानी भारत सेवा क्षेत्र में कई देशों में जाकर निवेश कर सकता है, वहां मुनाफा कर सकती हैं भारतीय कंपनियां.

भारत की समस्या यह है भारत के पास एक मजबूत मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर या निर्माण सेक्टर ऐसा नहीं है जो सस्ती रेट पर बढ़िया आइटम तैयार कर सके. कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है कि भारत जिन क्षेत्रों में आरसेप के देशों में जाकर बढ़िया कर सकता है, वहां उसे घुसने की इजाजत नहीं है, पर भारत में घुसने की इजाजत वो तमाम देश और कंपनियां चाहते हैं, जो यहां बेपनाह सस्ते आइटम बेच सकते हैं. चीनी कंपनियां इस सूची में सबसे ऊपर हैं. यहां यह नोट किया जा सकता है कि अब भी जबकि आरसेप समझौता नहीं है, तब भी भारत में बिकने वाले दस स्मार्टफोनों में से करीब सात चाइनीज ब्रांड के हैं. आरसेप जब चाइनीज आइटमों को घुसने की लगभग खुली छूट देगा, तब भारत में बननेवाले आइटमों की हालत क्या होगी, यह सोचा जा सकता है. इसलिए भारत के तमाम उद्योग आरसेप का विरोध कर रहे थे, हालांकि इस विरोध में कई बार यह इच्छा भी शामिल थी कि हमें घटिया और महंगा सामान बेचने की छूट मिलती रहनी चाहिए. कड़ी प्रतिस्पर्धा में हमको ना डाला जाये.

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व्यापार समझौतों में भारत के तजुरबे
सच यह है कि अधिकांश व्यापार समझौतों से भारत लाभ नहीं उठा पाया है, वह क्यों नहीं उठा पाया है, यह अलग विश्लेषण का विषय है. एसियान देशों के साथ हुए व्यापार घाटे के आंकड़े देखें, तो साफ होता है कि ग्लोबल कारोबार के मामले में भारत पिट रहा है. यानी भारत दूसरे देशों को माल नहीं बेच पा रहा है, दूसरे देशवाले भारत में आकर माल बेचकर मुनाफा कमा कर निकल लेते हैं. यानी आर्थिक व्यवस्था में भारत की भूमिका बतौर बड़े बाजार की है, जिसे माल बेचा जा सकता है.
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2009-10 में एसियान देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 8 अरब डालर का था, यह 2018-19 में बढ़कर 22 अरब डालर हो गया. यानी भारत एसियान देशों से लगातार ज्यादा आयात कर रहा है, और निर्यात कम ही कर पा रहा है. आरसेप में मूलत एसियान देश ही शामिल हैं, चीन आरसेप में अतिरिक्त खतरा है. अकेले चीन के साथ पचास अरब डालर से ज्यादा का व्यापार घाटा है. आरसेप समझौते का मतलब है कि चीन से तमाम आइटम आना बहुत सस्ता और आसान हो जायेगा. चीन से आनेवाले 80-90 प्रतिशत आइटम सस्ते हा जायेंगे यानी ये सस्ते चाईनीज आइटम घरेलू भारतीय उत्पादों को उस तरह से बाजार से बाहर कर देंगे जिस तरह से मोबाइल हैंडसेट बाजार में भारतीय कंपनियां बाहर हैं. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय कंपनियों को बेहतर नहीं होना चाहिए. इसका मतलब इतना है कि भारतीय कंपनियां अभी चीनी आइटमों का मुकाबला करने की हालत में नहीं हैं.

खतरे में उद्योग
न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से डेयरी उत्पाद सस्ते आकर भारत के आइटमों के लिए खतरा पैदा करते. देश के बड़े डेयरी संगठन अमूल ने पीएम मोदी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होने देश के दस करोड़ दूध कारोबारियों के हितों की रक्षा की. आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड बहुत सस्ते डेयरी उत्पादों से भारत को पाटने क्षमता रखते हैं, अगर आरसेप समझौता हो जाता तो.

टैक्सटाइल, रसायन, प्लास्टिक के कारोबार के लोगों की भी यही चिंता है कि सस्ते चीनी आइटम कहीं भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह ना कर दें. चीन बहुत सस्ते में आइटम बेचने की सामर्थ्य रखता है.

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चीन तत्व
चीन सस्ते आइटम बेचता है और तमाम वजहों से बेचता है. पर चीन अपने यहां आसानी से विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं देता, तमाम चीनी ब्रांड के फोन यहां बिक सकते हैं, पर भारत की टेलीकाम कंपनियों को व्यापक और सस्ती सेवाएं बेचने की इजाजत चीन नहीं देगा. यानी चीन एक हद तो मुक्त व्यापार का समर्थक है, पर एक हद के बाद वह कतई तानाशाह देश की तरह बरताव करता है.

2011 में एक किताब 2011 में पीटर नवारू और ग्रेग आट्री की एक किताब आयी थी-डैथ बाय चायना, इसमें लेखकों ने बताया था कि किस तरह से चीन अमेरिकन अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहा है, ट्रंप इस किताब से बहुत प्रभावित हुए थे. इस किताब में बताया गया था कि इन तरीकों से चीन अमेरिका को ठगने की कोशिश करता रहा है-

(1) अवैध तरीके से दी जानेवाली निर्यात सब्सिडी
(2) बहुत चतुराई से चीनी मुद्रा की धोखाधड़ी
(3) अमेरिकन तकनीकी चीनियों द्वारा चोरी
(4) पर्यावरण का भारी नुकसान
(5) कामगारों की सेहत और सुरक्षा के साथ समझौता
(6) गैर कानूनी तौर पर लगाया गया आयात शुल्क
(7) बहुत कम कीमतों के जरिये बाजार पर कब्जा और फिर उपभोक्ताओँ का शोषण
(8) विदेशी कंपनियों को चीन से दूर रखना

डैथ बाय चायना के लेखकोँ का संक्षेप में आशय यह था कि चीन जानबूझकर अपनी करेंसी युआन को सस्ता रखता है, ताकि उसके आइटम दूसरे देशों में सस्ते मिल पायें. इसे यूं समझें कि जैसे अगर एक डालर में सात युआन आ रहे हैं तो सात युआन का कोई आइटम अमेरिका में एक डालर का मिलेगा. चीन अपने युआन की कीमत गिरा दे यानी एक डालर में चौदह युआन मिलने लग जायें, तो अमेरिका में वही आइटम आधा डालर का मिलेगा या एक डालर में वो आइटम दो मिलने लगेंगे. चीन विदेशी बाजारों में अपना माल खपाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा करता रहा है. खुद भारत भी इसका एक हद तक भुक्तभोगी है, चीनी मोबाइल चीनी आइटम इस कदर सस्ते मिलते हैं भारत में कि भारतीय उद्योगपतियों के लिए उनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है.

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भारत में अगर कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता, तो इस पर जुलूस धरना प्रदर्शन हो जाते हैं. चीन की तानाशाही में मजदूरों को आवाज उठाने की इजाजत नहीं है. यह अपने आप में विसंगति है कि जो चीन खुद को साम्यवादी होने का दावा करता है, उस चीन की अर्थव्यवस्था मजदूरों के भीषण शोषण पर टिकी है. एप्पल जैसी बड़ी कंपनियां भी चीन की स्थितियों का फायदा उठाती हैं. हाल में चाइना लेबर वाच नामक संगठन ने एक रिपोर्ट में बताया कि फौक्सकोन कंपनी जो एप्पल के लिए भी फोन बनाती है, ने अपने स्टाफ में करीब पचास प्रतिशत टेंपररी स्टाफ रखा, जो सस्ता पड़ता है. जबकि चीनी कानून के मुताबिक दस प्रतिशत से ज्यादा टेंपररी स्टाफ नहीं रखा जा सकता. एक मसला यह है कि चीन तो चलता है तानाशाही रुट पर, उसके राष्ट्रपति जिनपिंग ने खुद को आजीवन राष्ट्रपति घोषित कर दिया है. मतलब चीन में तो जिनपिंग जो चाहेंगे करवा लेंगे, पर भारत और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में यह छूट हासिल नहीं हैं. उन्हे बढ़ते असंतोष के प्रति जवाबदेह होना होता है.

भारतीय कारोबारियों को मजबूत होना होगा
आरसेप में ना जाने की मतलब यह नहीं है कि कई भारतीय कारोबारी यह संमझ लें कि उन्हे अपने हिसाब से महंगे और घटिया आइटम बेचने का लाइसेंस हासिल हो गया है. यह बात अपनी जगह सही है कि प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ता का भला होता है. बहुत लंबे अरसे से कई भारतीय कारोबार बहुत आसान माहौल में काम करने के आदी रहे हैं. याद किया जा सकता है कि एक जमाने में जब भारतीय कार बाजार प्रतिस्पर्धाविहीन था, तब एंबेसडर और फीयेट जैसे कुछेक ब्रांड ही मिलते थे. एंबेसडर ने तो अपने रंग ढंग कई दशकों तक ना बदले. प्रतिस्पर्धा आयी, तो हाल बदले. हाल में प्रख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट आयी है इस विषय पर कि निर्यात कैसे बढ़ायें. इसमें सुरजीत भल्ला की सिफारिशों का एक आशय यह भी है पहले हमें अपना घर दुरुस्त करना होगा. तमाम तरह के ग्लोबल समूह बन रहे हैं,जो आपस में व्यापार कर रहे हैं. हम लंबे समय तक अपने कारोबारियों को यह कहकर नहीं बचा सकते कि अभी हमारेवाले तैयार नहीं हैं, उनकी लागत महंगी है. उनकी क्वालिटी बढ़िया नहीं है. आरसेप में ना शामिल होना राष्ट्रहित का फैसला है, पर कंपनियों को बेहतर ना बनाना, उन पर बेहतर बनने का दबाव ना डालना कतई राष्ट्रहित का फैसला नहीं है. पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ऐेसे कारोबारों को बनाना भी जरुरी होगा जो खुले बाजार में चीनी कंपनियों समेत तमाम कंपनियों का मुकाबला कर सकें.

(आलोक पुराणिक)

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First published: November 5, 2019, 2:03 PM IST
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