EPF vs NPS: बुढ़ापे में पैसों की कमी से बचने के लिए कहां करे निवेश?

NPS के जरिए तीन तरह का निवेश विकल्प होता है, जबकि EPF में केवल एक ही विकल्प मिलता है.

Retirement Planning: रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी को वित्तीय रूप से सुरक्षित करना बेहद जरूरी है. इसके लिए कर्मचारी भविष्य निधि और नेशनल पेंशन स्कीम सबसे पॉपुलर स्कीम हैं. लेकिन, इनके भी अपने फायदे-नुकसान हैं. इनमें से किसी भी विकल्प को चुनने से पहले सभी पहुलाओं पर विचार करना भी जरूरी है.

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    नई दिल्ली. रिटायरमेंट के बाद अपने भविष्य को वित्तीय रूप से सुरक्षित रखने के लिए म्यूचुअल फंड्स, स्टॉक्स, फिक्स्ड डिपॉजिट, रियल एस्टेट, नेशनल पेंशन स्कीम और कर्मचारी भविष्य निधि जैसे विकल्प मौजूद हैं. इनमें निवेश के जरिए रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी का खर्च उठाया जा सकता है. इनमें EPF और NPS सबसे बेहतर विकल्प माने जाते हैं. जानकारों का कहना है कि इन दोनों विकल्पों के अपने फायदे-नुकसान हैं, उदाहरण के तौर पर देखें तो एनपीएस के जरिए आपके पास विकल्प होता है कि इक्विटी, कॉरपोरेट डेब्ट या सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करें. जबकि, ईपीएफ में निवेश की गई रकम पूर्वनिर्धारित रूप से डेब्ट में ही जाती है. इस प्रकार एनपीएस में इक्विटी का सबसे ज्यादा एक्सपोजर होता है. इसमें निवेश करने से बेहतर रिटर्न मिलने के आसार रहते हैं.

    कर्मचारी भविष्य निधि (EPF)
    कर्मचारी भविष्य निधि के तहत कर्मचारियों को अपनी सैलरी से कम से कम 12 फीसदी वेतन जमा करनी होती है. नियोक्ता भी कर्मचारी के ईपीएस में इतनी ही रकम डालता है. हालांकि, कर्मचारी अपने EPF योगदान में 12 फीसदी से ज्यादा का निवेश कर सकते हैं. यह योगदान कर्मचारी के रिटायरमेंट फंड में होता है. 58 साल की उम्र के बाद ईपीएफ फंड की पूरी रकम निकाली जा सकती है. हालांकि, मेडिकल खर्च, घर बनाने, शिक्षा आदि के लिए इसमें से आंशिक रकम भी निकालने का प्रावधान है. ईपीएफ पर टैक्स छूट का भी लाभ मिलता है. यह EEE कैटेगरी में आता है.

    नेशनल पेंशन स्कीम यानी (NPS)
    नेशनल पेंशन स्कीम में निवेश करना अनिवार्य है. किसी इन्वेस्टर को खुद ही एनपीएस में अकाउंट खुलवाना होता है. इसके तहत टियर-1 अकाउंट्स में कम से कम 500 रुपये और टियर-2 अकाउंट्रस में 1,000 रुपये तक का निवेश किया जा सकता है. एनपीएस अकाउंट में निवेश की कोई तय लिमिट नहीं है.

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    एनपीएस की एक कमी यह है कि 60 साल की उम्र पर पूरी रकम निकालने के बाद इसमें से 40 फीसदी रकम को एन्युटी प्लान में डालना होता है. इसके बाद सब्सक्राइबर बाकी बचे 60 फीसदी रकम का इस्तेमाल कर सकता है. इसके अलावा सब्सक्रिप्शन शुरू करने के 10 साल के बाद ही आंशिक निकासी की अनुमति मिलती है. यह रकम भी कुल जमा रकम के 25 फीसदी से ज्यादा का नहीं होगा.

    एनपीएस पर मिलने वाले टैक्स छूट की बात करें तो इसपर इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80C के तहत टैक्स छूट का लाभ मिलता है. इसके अलावा इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80CCD 1B के तहत भी 50,000 रुपये का टैक्स छूट मिलेगा. कर्मचारी सेक्शन 80CCD 2 के तहत क्लेम कर सकते हैं. यह क्लेम बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते के 10 फीसदी रकम के बराबर ही होगी.

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    क्या है निष्कर्ष?
    एनपीएस और ईपीएफ, दोनों के अपने फायदे-नुकसान हैं. जानकारों का सुझाव होता है कि दोनों स्कीम में एक तय रकम के साथ निवेश करना फायदेमंद साबित हो सकता है. खासतौर से उन लोगों के लिए जो रिटायरमेंट के लिए प्लानिंग कर रहे हैं. इन दोनों विकल्पों के कॉम्बिनेशन को चुनने से न केवल इनके रिटर्न पर फायदा होगा, बल्कि दोनों पर कुल 2 लाख रुपये का टैक्स छूट का भी लाभ मिलेगा. जानकारों का यह भी कहना है कि उचित विकल्प में निवेश करना मतलब यह भी है कि आप संभावित रिटर्न का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं. साथ ही, रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी के लिए केवल एक ही विकल्प पर निर्भर रहना कम फायदेमंद होगा. ऐसे में किसी भी फैसले से पहले इन निवेश विकल्पों पर विचार करना उचित होगा.

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