रुपये में गिरावट और आम आदमी पर इसका 'साइड इफेक्ट'

समस्या सरकार के उपायों में भी है जो तेल पर लगने वाली एक्ससाइड ड्यूटी में कटौती के लिए तैयार नहीं है. राजकोषीय घाटे को पूरा न करने पाने के डर के कारण एक्साइज ड्यूटी में कटौती एक दूर की कौड़ी है.

News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 6:03 PM IST
रुपये में गिरावट और आम आदमी पर इसका 'साइड इफेक्ट'
चित्र: मीर सुहेल/News18
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Updated: September 5, 2018, 6:03 PM IST
भारतीय रुपया हर दिन गिरने का नया रिकॉर्ड बना रहा है. करीब 68.50 पर बने रहने वाले रुपये में डॉलर के मुकाबले 4 प्रतिशत की गिरावट आई है. बुधवार सुबह सकारात्मक शुरुआत करने वाला रुपया गिरकर 71.79 के नए स्तर तक पहुंच गया है. दलाल स्ट्रीट में बिक्री की शुरुआत के साथ ही मंदी की स्थिति देखने को मिली.

रुपये में गिरावट की वजह

भारतीय रुपये में आई रिकॉर्ड गिरावट के पीछे की वजह उभरते हुए बाजारों में आई गिरावट, अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और डॉलर का मजबूत होना है. तुर्की की मुद्रा लीरा और कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतें भी रुपये की ऐतिहासिक गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं. अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें और एफआईआई की तेज बिक्री एक अन्य कारण है.

भारत वर्तमान में निर्यात से अधिक आयात कर रहा है जो स्थिति को और बदतर बना रहा है.

आम आदमी पर असर

एक कमजोर मुद्रा हमेशा देश को नुकसान पहुंचाती है. चाहे फिर वह भारत हो या फिर दुनिया का कोई दूसरा हिस्सा. आसान शब्दों में कहा जाए तो मुद्रा में गिरावट होने से सबकुछ महंगा हो जाता है. इसमें विलासिता शामिल है जैसे विदेश में छुट्टी मनाना, विदेशों में पढ़ाई, आयातित सामान जैसे कि कार और स्मार्टफोन खरीदना आदि. यह मुद्रास्फीति को जन्म देता है और रोटी, कपड़ा और मकान महंगा हो जाता है.

रुपये में गिरावट का एक सीधा असर होम लोन पर पड़ता है. इसका मतलब यह है कि यह घर खरीदने के लिए सही समय नहीं है. एक और क्षेत्र जो चिंता करने वाला है वह है आयात. डॉलर के मुकाबल रुपये की कम कीमत आयात को महंगा बनाता है. कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जिन्हें आयात करना ही पड़ता है. भारत में तेल का आयात जरूरी है. जो चालू खाता घाटे के मोर्ट पर निश्चित तौर पर दोहरा झटका है.

हालांकि, निर्यातकों के लिए यह अच्छी खबर है, क्योंकि रुपये में गिरावट के कारण निर्यात में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होती है, हालांकि व्यापार युद्ध ने भारत को नकारात्मक रुप से प्रभावित किया है. आईटी और फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज को रुपये की कीमत गिरने का लाभ मिल सकता है लेकिन तभी जब व्यापार युद्ध इसमें बाधा न बने.

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फिलहाल कोई राहत नहीं

फिलहाल तेल की कीमतों में गिरावट के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं. विशेषज्ञों की मानें तो 2019 तल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक हो सकती हैं, हालांकि फिलहाल यह दूर की बात है.

समस्या सरकार के उपायों में भी है जो तेल पर लगने वाली एक्ससाइड ड्यूटी में कटौती के लिए तैयार नहीं है. राजकोषीय घाटे को पूरा न करने पाने के डर के कारण एक्साइज ड्यूटी में कटौती एक दूर की कौड़ी है. सूत्रों के मुताबिक सरकार द्वारा ऐसा कोई कदम उठाने की संभावना भी नहीं है, क्योंकि ऐसा तब भी नहीं किया गया जब क्रूड ऑयल की कीमत मात्र 35 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई थी.

आगे का रास्ता

संभवत आरबीआई रेपो दर में बदलाव करके या एनआरआई बॉन्ड को जारी करने पर विचार कर सका है ताकि रुपये की गिरावट को रोका जा सके. वहीं हमारे पास प्रतिक्षा करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है.

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