SBI को इस वजह से तीन महीने में हुआ 4876 करोड़ रुपये का घाटा

देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को अप्रैल-जून तिमाही में 4,876 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. हालांकि, इससे पहले तिमाही (जनवरी-मार्च) में बैंक ने 2005.5 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था.

Cnbc-Awaaz
Updated: August 10, 2018, 6:00 PM IST
SBI को इस वजह से तीन महीने में हुआ 4876 करोड़ रुपये का घाटा
सबसे बड़े सरकारी बैंक SBI को बड़ा झटका! इस वजह से हुआ 4876 करोड़ रुपये का घाटा
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Updated: August 10, 2018, 6:00 PM IST
देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को अप्रैल-जून तिमाही में 4,876 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. हालांकि, इससे पहले तिमाही (जनवरी-मार्च) में बैंक ने 2005.5 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्रोविज़निंग बढ़ने के चलते बैंक को घाटा हुआ है. इसका मतलब साफ है कि बैंक के डूबे कर्ज बढ़ सकते हैं. इसीलिए बैंक प्रोविज़निंग करता है. बता दें कि बीएसई पर एसबीआई का शेयर 3.79 फीसदी गिरकर 304.45 रुपए पर बंद हुआ. (ये भी पढ़ें-SBI की ग्राहकों को चेतावनी! ये SMS खाली कर देगा आपका बैंक अकाउंट)

बैंक के नतीजों पर एक नज़र- वित्त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एसबीआई की ब्याज से आय 23.8 फीसदी बढ़कर 21,798 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है. वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में एसबीआई की ब्याज आय 17,606 करोड़ रुपये रही थी. तिमाही दर तिमाही आधार पर अप्रैल-जून तिमाही में एसबीआई का ग्रॉस एनपीए 2.23 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2.12 लाख करोड़ रुपये रहा है.

तिमाही आधार पर पहली तिमाही में एसबीआई का नेट एनपीए 1.10 लाख करोड़ रुपये से घटकर 99,236 करोड़ रुपये रहा है. तिमाही आधार पर पहली तिमाही में एसबीआई के नए एनपीए 32,821 करोड़ रुपये से घटकर 14,349 करोड़ रुपये के रहे हैं.

वित्त वर्ष 2019 की पहली तिमाही में एसबीआई को 2,379 करोड़ रुपये का टैक्स क्रेडिट हासिल हुआ है वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में एसबीआई को 4,495 करोड़ रुपये का टैक्स क्रेडिट हासिल हुआ था.तिमाही आधार पर पहली तिमाही में एसबीआई की अन्य आय 12,495 करोड़ रुपये से घटकर 6,679 करोड़ रुपये रही है। वित्त वर्ष 2018 की पहली तिमाही में एसबीआई की अन्य आय 8,006 करोड़ रुपये रही थी।

क्यों हुआ घाटा- बैंक ने प्रोविज़निग 115.33 फीसदी बढ़ाकर 19,228.26 करोड़ रुपये कर दी है. पिछले साल इसी तिमाही में बैंक ने 8,929.48 करोड़ रुपये की प्रोविज़निग की थी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बैंक को लगता है बैंक के कई और लोन डूब सकते हैं. इसीलिए बैंक ने प्रोविज़निग बढ़ाई है.

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क्या होता है एनपीए?-एनपीए समझने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि बैंक काम कैसे करते हैं. इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. मसलन बैंक में अगर 100 रुपये जमा है तो उसमें से 4 रुपये (CRR) रिज़र्व बैंक के पास रखा जाता है, साढ़े 19 रुपये (अभी एसएलआर 19.5 प्रतिशत है) बॉन्ड्स या गोल्ड के रूप में रखना होता है.बाकी बचे हुए साढ़े 76 रुपयों को बैंक कर्ज़ के रूप में दे सकता है. इनसे मिले ब्याज से वो अपने ग्राहकों को उनके जमा पर ब्याज का भुगतान करता है और बचा हुआ हिस्सा बैंक का मुनाफ़ा होता है.

रिज़र्व बैंक के अनुसार बैंकों को अगर किसी परिसंपत्ति (एसेट्स) यानी कर्ज़ से ब्याज आय मिलनी बंद हो जाती है तो उसे एनपीए माना जाता है.बैंक ने जो धनराशि उधार दी है, उसके मूलधन या ब्याज की किश्त अगर 90 दिनों तक वापस नहीं मिलती तो बैंकों को उस लोन को एनपीए में डालना होगा.

रिज़र्व बैंक के नियम-कोई लोन खाता निकट भविष्य में एनपीए बन सकता है या नहीं, इसकी पहचान के लिए रिज़र्व बैंक ने नियम बनाए हैं. इसके तहत बैंकों को उनके लोन खातों को स्पेशल मेंशन अकाउंट (एसएमए) के तौर पर चिन्हित करना होता है.अगर किसी लोन खाते में मूलधन या ब्याज की किश्त का भुगतान निर्धारित तिथि से 30 दिनों के भीतर नहीं होता है तो उसे एसएमए-0 कहा जाता है. अगर भुगतान 31 से 60 दिनों तक न हो तो इसे एसएमए-1 कहा जाता है. अगर मूलधन या ब्याज का भुगतान 61 से अधिक दिनों तक न हो तो उसे एसएमए-23 कहा जाता है. किसी लोन खाते को एनपीए घोषित करने के बाद बैंक को उस एनपीए खाते का तीन श्रेणियों - 'सब स्टैंडर्ड एसेट्स', 'डाउटफुल एसेट्स' और 'लॉस एसेट्स' के रूप में बाँटना पड़ता है.

जब कोई लोन खाता एक साल या इससे कम अवधि तक एनपीए की श्रेणी में रहता है तो उसे 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' कहा जाता है, एक साल तक 'सब स्टैंडर्ड असेट्स' की श्रेणी में रहता है तो उसे 'डाउटफुल असेट्स' कहा जाता है. जब बैंक यह मान लेता है कि कर्ज़ अब वसूल नहीं हो सकता तो उसे 'लॉस असेट्स' की श्रेणी में डाल दिया जाता है.

नियम का असर से घाटा-तो क्या सरकारी बैंकों के तिमाही नतीजों में जो हज़ारों करोड़ रुपये का घाटा नज़र आ रहा है वो इसी नियम की वजह से है? वीएम पोर्टफोलियो के हेड विवेक मित्तल कहते हैं कि , कुछ हद तक ये सही है कि बैंकों में डिफॉल्ट के मामले बढ़ रहे हैं. लेकिन अब बैंकों को उसकी प्रोविजनिंग यानी समाधान के लिए सिर्फ़ छह महीने दिए गए हैं, इसलिए बैंकों को इन एनपीए को घाटे के रूप में दिखाना ही होगा.

इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि बैंकों का ये कर्ज़ डूब गया है और अब वसूल नहीं होगा.लेकिन बैंकिंग मामलों पर नज़र रखने वाले जानकार इस बात को भी मानते हैं कि बैंकों के कर्ज़ देने की प्रक्रिया में खामियां हैं और इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए.इसका एक उदाहरण है देना बैंक पर रिज़र्व बैंक की कार्यवाही. रिज़र्व बैंक ने 7 मई 2018 को देना बैंक को निर्देश दिया कि अगले निर्देशों तक वो नया कर्ज़ न बांटे और न ही किसी कर्मचारी की भर्ती करे. ये जानकारी ख़ुद देना बैंक ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को दी है.(ये भी पढ़ें-सेफ ऑनलाइन बैंकिंग के लिए SBI ने बताए 4 टिप्स)
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