SCO मीटिंगः आतंकवाद से लेकर ऊर्जा तक, ये मुद्दे होंगे भारत के लिए अहम

आतंकवाद से लेकर तेल और गैस आपूर्ति तक तमाम मुद्दों पर इस शिखर वार्ता में चर्चा हो सकती है. भारत अपने लिए आतंकवाद के खिलाफ समर्थन जुटा सकता है.

News18Hindi
Updated: June 13, 2019, 1:33 PM IST
SCO मीटिंगः आतंकवाद से लेकर ऊर्जा तक, ये मुद्दे होंगे भारत के लिए अहम
आतंकवाद से लेकर तेल और गैस आपूर्ति तक तमाम मुद्दों पर इस शिखर वार्ता में चर्चा हो सकती है. भारत अपने लिए आतंकवाद के खिलाफ समर्थन जुटा सकता है.
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Updated: June 13, 2019, 1:33 PM IST
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 19वें शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रवाना हो चुके हैं. यह शिखर सम्मेलन 13-14 जून को होगा. सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे. हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी इसमें भाग लेंगे, लेकिन बताया जा रहा है कि पीएम मोदी उनसे अलग से मुलाकात नहीं करेंगें. बता दें कि पीएम मोदी ने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंचने के लिए भी पाकिस्तान के बजाय ओमान के रास्‍ते को चुनकर शिखर सम्‍मेलन से ठीक पहले पड़ोसी मुल्‍क को सख्‍त संदेश देने की कोशिश की है.

क्या है भारत के लिए इसका महत्व?



आतंकवाद के खिलाफ जुटा सकता है समर्थन
एससीओ को शंघाई पैक्ट कहते हैं. यह यूरोप और एशिया के देशों का राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़ा हुआ एक संगठन हैं. पिछले साल हुई मीटिंग में आतंकवाद को खत्म करने को लेकर कदम उठाने की बात कही गई थी. इसलिए अभी जिस तरह से आतंकवाद से दुनिया के कई देश परेशान हैं उसे देखते हुए इस साल भी इस पर बहस हो सकती है. पिछले कुछ दिनों में भारत में एक के बाद एक कई आतंकवादी घटनाएं हुई हैं. भारत इस मंच पर अपनी बात रखकर ज्यादा से ज्यादा देशों का अपने पक्ष में समर्थन पा सकता है.

इस संगठन के अधिकांश देशों में तेल और प्राकृतिक गैस के प्रचुर भंडार हैं. इससे भारत को मध्य-एशिया में प्रमुख गैस एवं तेल की खोज करने वाली परियोजनाओं तक व्यापक पहुंच मिल सकेगी. यह संगठन पूरे क्षेत्र की समृद्धि के लिए जलवायु परिवर्तन, शिक्षा, कृषि, ऊर्जा और विकास की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर सकता है. इससे भारत को भी लाभ होगा.

पाकिस्तान को अलग-थलग करने में मिल सकती है मदद
भारत के सामने इस वक्त एक बड़ी चुनौती है पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ती हुई नजदीकी को रोकना. भारत लगातार अमेरिका के नज़दीक होता जा रहा है ज़ाहिर है यह रूस को बहुत ज्यादा पसंद नहीं आएगा. फिर भी इस फोरम से भारत, रूस को ज़रिया बनाकर चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नज़दीकियों को रोकने में कामयाब हो सकता है. बता दें कि चीन 'बेल्‍ट एंड रोड योजना' के जरिये इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है.
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भारत का मध्‍य एशिया और रूस के साथ व्‍यापार बेहद कम है जबकि चीन के साथ इन देशों का अरबों डॉलर का व्‍यापार है. तेल और गैस से समृद्ध इन देशों के साथ व्‍यापार में भारत को संपर्क की बड़ी समस्‍या से जूझना पड़ता है. मध्‍य एशिया में दुनिया की 42 फीसदी आबादी निवास करती है और यह भारत के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है. भारत ने मध्‍य एशिया और अफगानिस्‍तान से जुड़ने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह में काफी निवेश कर रखा है.

अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध पर हो सकती है बात
अमेरिका ने ईरान और वेनेज़ुएला पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया हुआ है. ये दोनों देश विश्व में तेल के तीसरे और चौथे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता हैं. भारत में इन दो देशों से होने वाली तेल की आपूर्ति अहम है.

अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से भारत में आयात बंद है. शिखर वार्ता में इस बात पर विचार किया जा सकता है कि अमेरिका के प्रतिबंधों के मुद्दे को किस तरह से सुलझाया जाए और ईरान और वेनेज़ुएला से तेल की आपूर्ति कैसे फिर से शुरू की जाए. चूंकि चीन भी इस तरह के प्रतिबंधों की वजह से परेशानी झेल रहा है इसलिए वह इस मामले में भारत का साथ दे सकता है.

क्या है शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ)?
साल 1996 में इसकी शुरुआत पांच देशों ने शंघाई इनीशिएटिव के तौर पर की थी. उस समय उनका सिर्फ़ ये ही उद्देश्य था कि मध्य एशिया के नए आज़ाद हुए देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर कैसे तनाव रोका जाए और धीरे-धीरे किस तरह से उन सीमाओं को सुधारा जाए और उनका निर्धारण किया जाए.

ये मक़सद सिर्फ़ तीन साल में ही हासिल कर लिया गया. इसकी वजह से ही इसे काफ़ी प्रभावी संगठन माना जाता है. अपने उद्देश्य पूरे करने के बाद उज़्बेकिस्तान को संगठन में जोड़ा गया और 2001 से एक नए संस्थान की तरह से शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन का गठन हुआ. साल 2017 में भारत और पाकिस्तान इसके सदस्य बने.

साल 2001 में नए संगठन के उद्देश्य बदले गए. अब इसका अहम मक़सद ऊर्जा पूर्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना और आतंकवाद से लड़ना बन गया है. ये दो मुद्दे आज तक बने हुए हैं. शिखर वार्ता में इन पर लगातार बातचीत होती है.

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