क्या अपार्टमेंट पजेशन में देरी के लिए ग्राहकों को मुआवजा मिलेगा? जानिए नियम

बिल्डर को बढ़े हुए कारपेट को प्रमाणित करने के लिए ग्राहक को इसका सर्टिफिकेट देने का निर्देश भी दिया गया है.
बिल्डर को बढ़े हुए कारपेट को प्रमाणित करने के लिए ग्राहक को इसका सर्टिफिकेट देने का निर्देश भी दिया गया है.

महाराष्ट्र रेरा (MahaRERA) ने एक केस में अपार्टमेंट में देरी के लिए ग्राहक द्वारा मुआवजे की मांग पर फैसला सुनाया है. यह केस मुलुंड में प्रोपेल डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के रनवाल ग्रीन्स नामक प्रोजेक्ट में एक यूनिट खरीदने वाले ग्राहक ने किया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 21, 2020, 9:13 AM IST
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मुंबई. महाराष्ट्र रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (MahaRERA) ने फैसला सुनाया है कि अगर बिल्डर ने ऑकुपेंसी सर्टिफिकेट लेकर कब्जे की प्रक्रिया शुरु कर दी है, तो अपार्टमेंट में देरी के लिए ग्राहक मुआवजा नहीं मांग सकते. महाराष्ट्र RERA के अध्यक्ष गौतम चटर्जी ने एक आदेश में कहा कि धारा 18 की शुरुआती लाइन में स्पष्ट रुप से बताया गया है कि प्रोविजन तभी लागू होगा जब प्रोजेक्ट पूरा नहीं होता या प्रमोटर कब्जा देने में असमर्थ है. एक बार निर्माण पूरा हो जाने के बाद या कब्ज़ा देने के बाद यह प्रावधान काम करना बंद कर देता है.

इसके अलावा आदेश में कहा गया है कि रियल एस्टेट अधिनियम 2016 की धारा 18 के अनुसार शिकायतकर्ता को देरी के लिए ब्याज भी नहीं दिया जाएगा. इसमें शिकायतकर्ता को बचा हुआ भुगतान कब्ज़ा मिलने के बाद तय शर्तों के मुताबिक़ करने का सुझाव दिया गया है. इसके अलावा कारपेट एरिया में वृद्धि के लिए अपार्टमेंट के एग्रीमेंट के मूल्य के अनुपात के आधार पर चार्ज करने के बारे में भी इस आदेश में बताया गया है. इसे एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है.

क्या है मामला?
बिल्डर को बढ़े हुए कारपेट को प्रमाणित करने के लिए ग्राहक को इसका सर्टिफिकेट देने का निर्देश भी दिया गया है. एश्ले नील सेराव और मार्क क्लेमेंट सेराव (Ashley Neil Serrao, Mark Clement Serrao) ने एक केस दायर किया था. उन्होंने मुंबई के मुलुंड में प्रोपेल डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा रनवाल ग्रीन्स नामक प्रोजेक्ट में एक यूनिट खरीदी थी. इसकी बिक्री के लिए 10 जनवरी 2012 को लिखित डील हुई थी, लेकिन महाराष्ट्र RERA ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी.
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खरीददारों ने अपनी शिकायत में कहा कि बिल्डर ने दिसम्बर 2015 में उन्हें अपार्टमेंट हैण्डओवर करने के लिए कहा था, लेकिन 18 जुलाई को उन्हें अतिरिक्त भुगतान करने के बाद अपार्टमेंट देने की बात कही. शिकायतकर्ताओं ने कहा कि बिल्डर ने कारपेट एरिया बढ़ाकर अतिरिक्त भुगतान की मांग की. उन्होंने यह भी कहा कि बिल्डर कारपेट एरिया बढ़ाने के बारे में उत्तर नहीं दे पाया और बढ़े हुए कारपेट का निरीक्षण करने की अनुमति भी नहीं दी. इसलिए देरी को देखते हुए बिल्डर को अपार्टमेंट जल्दी हैण्ड ओवर करने और मुआवजा देने का आदेश देने की मांग खरीददारों ने की.

बिल्डर का पक्ष क्या कहता है
इस मामले में 19 जून, 2019 को पहली सुनवाई हुई. इसमें डेवलपर के वकील ने बताया कि प्रोजेक्ट पूरा हो गया है और ग्राहक को पार्ट ऑकुपेंसी सर्टिफिकेट भी जारी किया गया है. यह 7 जुलाई 2018 को जारी किया गया था जो शिकायतकर्ता की शिकायत से पहले दिया गया है और कब्जा भी ऑफ़र किया गया है. बिल्डर ने कहा कि नियमों और शर्तों के अनुसार ग्राहक को अपार्टमेंट और सुविधाएँ हैंडओवर की जा रही थी. इसके अलावा बिल्डर ने बढ़े हुए कारपेट एरिया की बात स्वीकार करते हुए इसका प्रमाण पत्र जारी करने की बात भी कही.

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कारपेट एरिया के लिए एग्रीमेंट में अपार्टमेंट के लिए तय राशि के अनुपात में ही चार्ज करने की बात भी कही गई. बिल्डर ने यह भी बताया कि रियल एस्टेट एक्ट 2016 के सेक्शन 19 (10) का उल्लंघन शिकायतकर्ता ने किया है और वे अपार्टमेंट पर कब्जा लेने के लिए कारपेट एरिया का पैसा देने में असफल रहे हैं.
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