लाइव टीवी

कोरोना के अलावा बहुत कुछ कह रहा है शेयर बाजार!

News18Hindi
Updated: March 19, 2020, 4:24 PM IST
कोरोना के अलावा बहुत कुछ कह रहा है शेयर बाजार!
पांच साल में बाजार की पूंजी जहां की तहां रहने का मतलब

कुछ दिनों हफ्तों या महीनों से नहीं बल्कि कई तिमाहियों से. कोरोना ने बुरा असर जरूर डाला है लेकिन एक अकेला वही कारण मानना खुद को मुगालते में रखना है. देश के माली हालात पर गौर करना हो तो अर्थव्यवस्था के सबसे विश्वसनीय संकेतक शेयर बाजार को देख लेना चाहिए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 19, 2020, 4:24 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. अर्थव्यवस्था को लेकर निश्चिंतता जताना खुद में एक चिंता की बात है. अर्थशास्त्र में फीलगुड थोड़ी देर ही काम आता है. लेकिन देश की माली हालत दिन पर दिन बिगाड़ पर है. कुछ दिनों हफ्तों या महीनों से नहीं बल्कि कई तिमाहियों से. कोरोना (Coronavirus) ने बुरा असर जरूर डाला है, लेकिन एक अकेला वही कारण मानना खुद को मुगालते में रखना है. देश के माली हालात पर गौर करना हो तो अर्थव्यवस्था के सबसे विश्वसनीय संकेतक शेयर बाजार को देख लेना चाहिए.

मामला दैनिक उतार-चढ़ाव का न माना जाए
कुछ दिनों से शेयर बाजार में उतार चढ़ाव बहुत ज्यादा है. उतार का सारा दोष कोरोना पर मढ़ा जा रहा था. बीच में एक बार चढ़ाव आया तो हम अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती की बात कर गए. पूंजी बाजार के फंडामेंटल की भी बातें होने लगीं. लेकिन उसके बाद दो दिन से बाजार फिर उसी रफ्तार से डूब रहा है. बाजार के विश्लेषक फिर कोरोना करने लगे. सवाल किया जाना चाहिए कि क्या कोरोना के पहले बाजार कोई अच्छी हालत में था?

तीन साल नीचा स्तर कहना कितना सही?



बुधवार को शेयर बाजार का सेंसेक्स 1,710 अंक और डूबा. सेंसेक्स 28,870 अंक पर आ गया. विश्लेषणों में कहा गया कि यह तीन साल का निचला स्तर है. यानी यह कहा गया कि तीन साल पहले सेंसेक्स इसी स्तर पर था. गौरतलब है कि आज से तीन साल पहले 17 मार्च 2017 को सेंसेक्स 29,649 अंकों पर था. तब भी वह बहुत ही बुरी तरह जूझ रहा था. उसके दो साल पहले 20 मार्च 2015 को भी लगभग इसी स्तर यानी 28,261 पर था. यानी अर्थव्यवस्था का आइना शेयर बाजार पांच साल बाद उसी जगह खड़ा पाया जा रहा है जहां वह पांच साल पहले खड़ा था.



ये भी पढ़ें: सरकार ने 75 करोड़ लोगों को दिया तोहफा! PDS से ले सकेंगे 6 महीने का राशन

पांच साल में बाजार की पूंजी जहां की तहां रहने का मतलब
आमतौर पर जिस रफ्तार से महंगाई बढ़ती है और आमतौर पर जिस रफ्तार से औसत व्यक्ति की जरूरतें बढ़ती हैं उस हिसाब से पांच-छह साल में एक रुपए की कीमत घटकर कमोबेश आधी रह जाती है. इसीलिए बाजार में अपनी पूंजी का निवेश करने वाला यही उम्मीद लगाता है कि उसे कम से कम 10 से 15 फीसदी सालाना लाभ तो मिलना ही चाहिए. लेकिन मौजूदा हालात में बाजार की पूंजी की हालत देखें तो वह उतनी बढ़ने की बजाए जहां की तहां है. और अगर महंगाई और दूसरे गणित लगाएं तो आज बाजार की कुल पूंजी की कीमत कमोबेश आधी बची है.

गलत नहीं है पांच साल में पूंजी दोगुनी होने की उम्मीद लगाना
ऐसा इसलिए है क्योंकि इस सहस्राब्दी के पहले दशक में आर्थिक हलचल इसी रफ्तार से बढ़ रही थी. उस दौरान अगर शेयर बाजार के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 15 अक्टूबर 2004 को सेंसेक्स 5,687 अंक था. पांच साल बाद 2 अक्टूबर 2009 को वह बढ़कर 17,135 का स्तर दिखा रहा था. यानी पांच साल में निवेशकों का पैसा तीन गुना बढ़ा. यह तब था जिस बीच देश ने 2008 की सबसे भयानक वैश्विक मंदी भी झेली थी. कहते हैं उस भयावह वैश्विक मंदी से दुनिया में अपना देश ही अपनी हुनर से निपट पाया था. इतना ही नहीं भयानक मंदी के दीर्घकालिक असर के बावजूद उसके अगले पांच साल भी शेयर की पूंजी कमोबेश दुगनी ही बढ़ी थी. गौरतलब है कि 17 अक्टूबर 2014 को 26,108 अंक था. यानी तब भी सेंसेक्स डेढ़ गुने से ज्यादा बढा था. गौरतलब यह भी है कि उन्हीं सालों में कच्चे तेल के दामों ने अपने अर्थव्यवस्था का कचूमर निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. यानी सेंसेक्स में हर पांच साल में डेढ़ से दो गुनी बढ़ोतरी साधारण बात बन चुकी थी. यही वजह है कि देश के निवेशक शेयर बाजार में अपना पैसा लगाने के लिए आकर्षित होते रहे हैं. लेकिन पिछले पांच में उनका कटु अनुभव देश की अर्थव्यवस्था के सामने बहुत ही बड़ा जोखिम बनकर हमारे सामने आ सकता है.

कोरोना के साथ-साथ दूसरे कारकों पर गौर जरूरी
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि वैश्विक महामारी घोषित किए जा चुके कोरोना पर गौर बहुत ही जरूरी है. लेकिन जीवन पहले बाकी बाद में जैसा तर्क समझदारी नहीं है. कोरोना अगर बेकाबू हो गया तो उससे वे देश ही अच्छी तरह निपट पाएंगे जिनकी जेब में पैसा होगा. हम तो अभी से संकट में आए दिख रहे हैं. जाहिर है देश को कोरोना के साथ-साथ अपनी अर्थव्यवस्था पर उसी संजीदगी के साथ निगरानी बनाए रखना पड़ेगी.

ये भी पढ़ें: कोरोना का कहर! आपके खाते में पैसे भेजेगी सरकार, शुरू हो सकती है ये स्कीम

सामने क्या है गौर करने को
शेयर बाजार जिस तरह आगाह कर रहा है उस हिसाब से अब अपने बैंकों की हालत के अनदेखी बिल्कुल भी ठीक नहीं मानी जा सकती. खासतौर पर बैंकों से दिए कर्ज का डूबते जाना बड़ी चुनौती है. बुधवार को सेंसेक्स का फिर डूबने के पीछे बैंकों के शेयर कितने जिम्मेदार हैं इसे बारीकी से देखा जाना चाहिए. अपने आयात-निर्यात के आंकड़ों पर गौर जरूरी है. रेटिंग एजंसी मूडीज भले ही कोरोना के मद्देनज़र हमारी जीडीपी का अनुमान थोड़ा सा घटा बता रही हो, लेकिन हमें अपने अंदरूनी कारणों पर अलग से ध्यान देने की जरूरत है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए मनी से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: March 19, 2020, 12:10 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading