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#Tatastories: कहानी उस महिला की जिसने टाटा की कंपनी को डूबने से बचाने के लिए बेच डाला था अपना बेशकीमती सामान

उस समय टाटा स्टील के सामने कैश की संकट आ गई थी और कंपनी के कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं बचे थे.

उस समय टाटा स्टील के सामने कैश की संकट आ गई थी और कंपनी के कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं बचे थे.

उस समय टाटा स्टील के सामने कैश की संकट आ गई थी और कंपनी के कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं बचे थे.

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    नई दिल्ली. कहानी लेडी मेहरबाई टाटा (Lady Meherbai Tata) की... जिसके बदौलत टाटा स्टील कंपनी (Tata Group) को आज पहचान मिली है. अधिकांश लोग इस महिला को नहीं जानते होंगे, जिसे व्यापक रूप से पहली भारतीय नारीवादी प्रतीकों (first Indian feminist icons) में से एक माना जाता है. लेडी मेहरबाई टाटा, बाल विवाह उन्मूलन से लेकर महिला मताधिकार तक और लड़कियों की शिक्षा से लेकर पर्दा प्रथा तक को हटाने के लिए जानी जाती हैं. लेकिन इतना ही नहीं उन्हें देश के सबसे बड़े स्टील कंपनी, टाटा स्टील (Tata steel) को बचाने में उनके योगदान के लिए भी जाना जाता है. आइए जानते हैं कैसे इन्होंने सही समय पर सही निर्णय लेकर टाटा स्टील को डूबने से बचा लिया था...

    इस किताब में हुआ खुलासा
    अपनी नवीनतम पुस्तक टाटा स्टोरीज (#Tatastories) में हरीश भट बताते हैं कि कैसे लेडी मेहरबाई टाटा ने स्टील की दिग्गज कंपनी को बचाया था. जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने अपनी पत्नी लेडी मेहरबाई के लिए लंदन के व्यापारियों से 245.35 कैरेट जुबली हीरा खरीदा था जो कि कोहिनूर (105.6 कैरेट, कट) से दोगुना बड़ा है. 1900 के दशक में इसकी कीमत लगभग 1,00,000 पाउंड थी. यह बेशकीमती हार लेडी मेहरबाई के लिए इतना खास था कि वह इसे स्पेशल मौकों पर पहनने के लिए रख दिया था. लेकिन हालात साल 1924 में हालात ने कुछ यूं करवट लिया कि लेडी मेहरबाई ने इसे बेचने का फैसला ले लिया.

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    हुआ यूं कि उस समय टाटा स्टील के सामने कैश की संकट आ गई और कंपनी के कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं बचे थे. उस वक्त लेडी मेहरबाई के लिए कंपनी के कर्मचारी और कंपनी को बचाना ज्यादा सही लगा और वे जुबली डायमंड सहित अपनी पूरी निजी संपत्ति इम्पीरियल बैंक को गिरवी रख दी ताकि वे टाटा स्टील के लिए फंड जुटा सकें. लंबे समय के बाद, कंपनी ने रिटर्न देना शुरू किया और स्थिति में सुधार हुआ. भट ने कहा कि गहन संघर्ष के उस समय में एक भी कार्यकर्ता की छंटनी नहीं की गई थी.

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    जानिए कैसी थी लेडी मेहरबाई टाटा?
    टाटा समूह के अनुसार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की स्थापना के लिए सर दोराबजी टाटा की मृत्यु के बाद जुबली हीरा बेचा गया था. लेडी मेहरबाई टाटा उन लोगों में से एक थीं, जिनसे 1929 में पारित शारदा अधिनियम या बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम के लिए परामर्श किया गया था. उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी इसके लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया. वह राष्ट्रीय महिला परिषद और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का भी हिस्सा थीं. 29 नवंबर, 1927 को लेडी मेहरबाई ने मिशिगन में हिंदू विवाह विधेयक के लिए एक मामला बनाया. उन्होंने 1930 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में महिलाओं के लिए समान राजनीतिक स्थिति की मांग की. लेडी मेहरबाई टाटा भारत में भारतीय महिला लीग संघ की अध्यक्ष और बॉम्बे प्रेसीडेंसी महिला परिषद की संस्थापकों में से एक थीं.लेडी मेहरबाई के नेतृत्व में भारत को अंतरराष्ट्रीय महिला परिषद में शामिल किया गया था.

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