इस सीजन में शुगर इंडस्ट्री को क्यों चाहिए एक्सपोर्ट पर सब्सिडी? इससे क्या होगा

चीनी सीजन की शुरुआत में अक्टूबर-नवंबर में उद्योग अपनी बैलेंस शीट तय करता है जिसमें अपेक्षित उत्पादन, पिछले साल के स्टॉक का कैरी फोरवर्ड और घरेलू खपत और निर्यात आदि को ध्यान में रखा जाता है.
चीनी सीजन की शुरुआत में अक्टूबर-नवंबर में उद्योग अपनी बैलेंस शीट तय करता है जिसमें अपेक्षित उत्पादन, पिछले साल के स्टॉक का कैरी फोरवर्ड और घरेलू खपत और निर्यात आदि को ध्यान में रखा जाता है.

चीनी सीजन की शुरुआत में अक्टूबर-नवंबर में उद्योग अपनी बैलेंस शीट तय करता है जिसमें अपेक्षित उत्पादन, पिछले साल के स्टॉक का कैरी फोरवर्ड और घरेलू खपत और निर्यात आदि को ध्यान में रखा जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 4, 2020, 2:45 PM IST
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नई दिल्ली. चीनी उद्योग ने केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Industry and Commerce Minister Piyush Goyal) की उस घोषणा पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिसमें कहा गया कि केंद्र सरकार 2020-21 के चीनी सीजन के लिए अपनी निर्यात सब्सिडी के विस्तार पर विचार नहीं कर रही है. उद्योग ने अत्यधिक स्टॉक के कारण चीनी कीमतों को लेकर चिंताएं जाहिर की है.चीनी सीजन की शुरुआत में अक्टूबर-नवंबर में उद्योग अपनी बैलेंस शीट तय करता है जिसमें अपेक्षित उत्पादन, पिछले साल के स्टॉक का कैरी फोरवर्ड और घरेलू खपत और निर्यात आदि को ध्यान में रखा जाता है. इस शीट से अगले साल चीनी उपलब्धता निर्धारित होती है. उच्च स्टॉक के होने पर मौजूदा मौसम के अलावा आगामी सीजन में भी एक्स मिल कीमतें कम रहती हैं और इससे चीनी सेक्टर के लिए लिक्विडिटी संकट आता है.

चीनी इंडस्ट्री सीजन की शुरुआत से पहले निर्यात के लिए क्यों तैयार?
इन्डियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार जिस सीजन की शुरुआत हुई, उसके लिए वार्षिक उत्पादन 326 लाख टन (इथेनॉल के बिना) होने का अनुमान लगाया गया और सीजन की शुरुआत 107 लाख टन के स्टॉक से हुई. हालांकि, उद्योग के सूत्रों का अनुमान है कि चीनी का उत्पादन 20 लाख टन कम हो सकता है क्योंकि मिलों से इथेनॉल का उत्पादन होने की उम्मीद है और इस प्रकार इस सीजन में कुल उपलब्ध चीनी बैलेंस 413 लाख टन होने की उम्मीद है. 260 लाख टन की घरेलू खपत में कटौती के बाद, अगले सीजन (2021-22 के सीजन) का शुरुआती स्टॉक 155 लाख टन होने का अनुमान है. राष्ट्रीय सब्सिडी सहकारी चीनी लिमिटेड के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने कहा कि सरकारी सब्सिडी की तरह ही निर्यात प्रोत्साहन के बिना यह असामान्य रूप से उच्च स्टॉक चीनी सेक्टर का वर्टिकल कॉलेप्स करेगा.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में पैदा होने वाला गन्ना यहां की लाइफलाइन है. गन्ने के सहारे यहां के ज्यादातर किसानों की जिंदगी चलती है. किसान गन्ना चीनी मिलों को बेचता है तो उसे उसका भुगतान होता है जिससे उसके घर का चूल्हा जलता है

सरकारी सब्सिडी के बगैर मिलें निर्यात में इच्छा क्यों नहीं दिखा रही? अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मैन्यूफेक्चर कॉस्ट और कच्चे माल की कीमत में अंतर है. अंतरराष्ट्रीय बाजरों में चीनी अनुबंध 21-22 रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से ट्रेड कर रहे हैं जबकि उत्पादन लागत 32 रूपये प्रति किलोग्राम है. इसे बेमेल ने सभी निर्यात संभावनाओं को खत्म किया है क्योंकि मिलों का इससे और ज्यादा नुकसान होगा. मिलों को समस्या का सामना करना पड़ता है जबकि भारतीय चीनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान बनाई है. पिछले सीजन 60 लाख टन चीनी निर्यात भारत से होने की सूचना थी जिसमें से 57 लाख टन बाहर जा चुकी है और बची हुई खेप दिसम्बर तक निकलने की उम्मीद है.



मिलों ने पिछले सीजन चीनी का निर्यात कैसे किया?पिछले सीजन का रिकॉर्ड निर्यात स्तर केवल केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित सब्सिडी कार्यक्रम के कारण संभव था. मिलों को निर्यात में 10.448 रुपये प्रति किलो चीनी की परिवहन सब्सिडी का वादा किया गया था. इस सब्सिडी ने मिलों की उत्पादन लागत और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच के अंतर को पाटने में मदद की थी. इसके अलावा केंद्रीय खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय अनुपालन के बारे में सख्त था, जिसके कारण निर्यात के मामले में मिलें लाइन में खड़ी हुई. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग के कारण भारतीय मीलों के अच्छे निर्यात की रिपोर्ट आई.
पिछले सीजन के निर्यात ने मिलों को लिक्विडिटी में मदद की?इसका उत्तर नहीं है. केंद्र सरकार को मिलों के कारण निर्यात सब्सिडी जारी करनी है. जिसका मूल्य 6900 करोड़ रूपये है. व्यक्तिगत मिलों ने लोन लेकर निर्यात करने का प्रयास किया है जिस पर उन्हें ब्याज देना है. 3000 करोड़ रूपये का अनपैड ब्याज भी बैलेंस शीट को प्रभावित करता है जो स्टॉक बनाए रखने के लिए लिया गया. कोरोना वायरस से भी सब्सिडी में देरी हुई है जिससे मिलों को सीजन की शुरुआत में पर्याप्त लिक्विडिटी नहीं मिली.

मिलें इथेनॉल उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित क्यों नहीं करती?पिछले हफ्ते केंद्र सरकार ने इथेनॉल में 1 से 3 रूपये प्रति लीटर की वृद्धि की. चीनी की बजाय गन्ने से इथेनॉल बनाने की तरफ यह एक संकेत था. चीनी इंडस्ट्री का अनुमान है कि इस साल लगभग 20 लाख टन चीनी को इथेनॉल की तरफ परिवर्तित किया जाएगा. इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले साल ब्याज सबवेंशन स्कीम की घोषणा की थी. हालांकि इथेनॉल के लिए यह जरूरी कदम था. वर्तमान क्षमता में मिलें 426 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन कर सकती हैं. जिसके लिए 15 से 20 लाख टन चीनी के डाइवर्जन की आवश्यकता होगी.
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