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सोशल बज!! सैंडल और चप्पल में अंतर कोर्ट ने कुछ इस तरह समझाया...

सोशल बज!! सैंडल और चप्पल में अंतर कोर्ट ने कुछ इस तरह समझाया...

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हाईहील, सैंडल, फ्लोटर, बैली, स्लीपर इसमें क्या अंतर होता है, ये अगर किसी भी लड़की से पूछें तो वो आसानी से बता देगी. पर आजकल इसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है. इसकी वजह है दिल्ली हाईकोर्ट का एक फैसला.

    हाईहील, सैंडल, फ्लोटर, बैली, स्लीपर इसमें क्या अंतर होता है, ये अगर किसी भी लड़की से पूछें तो वो आसानी से बता देगी. पर आजकल इसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है. इसकी वजह है दिल्ली हाईकोर्ट का एक फैसला. इसमें बताया गया है कि कि महिलाओं की चप्पल को सैंडल कहने के लिए उसमें स्ट्रैप होना जरूरी नहीं. यानी अगर स्ट्रैप नहीं है तो उसे चप्पल कहकर ही पुकारा जाए ये जरूरी नहीं.

    अब सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि न्यायपालिका एक तरफ कहती है कि उसके पास लोग कम हैं, इसलिए हजारों लाखों मामले फाइलों में धूल खा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ इस तरह के मामले में फैसला देकर सोशल बज क्रिएट कर रही है. इससे अच्छा होता कि अदालतें गंभीर और जरूरी मसलों पर वक्त देती.

    क्या है मामला?
    दिल्ली हाई कोर्ट का सैंडल पर दिया गया ये आदेश 2003 के एक मुकदमे पर था. इसमें एक फुटवियर कंपनी और कस्टम विभाग के बीच का विवाद कोर्ट पहुंचा. कंपनी ने सैंडल बनाने के लिए सामान आयात करने में 10 फीसद छूट का लाभ लिया था. जबकि कस्टम विभाग के अनुसार कंपनी चूंकि सैंडल नहीं बनाती, चप्पल बनाती है, तो उसे 10 नहीं सिर्फ पांच फीसद रियायत मिलनी चाहिए.

    मुकदमा 14 साल से चल रहा था. इस विवाद में काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट और फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट भी आ गए. दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद हालांकि अभी ये तय नहीं है कि ये मामला यहीं खत्म हो जाएगा. पर कस्टम विभाग दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा.

    करोड़ों मामले टैक्स के अदालत में लंबित हैं
    31 मार्च 2015 तक देश में 6.14 लाख करोड़ टैक्स के मुकदमे अदालतों में फंसे थे. ये हमारी सालाना टैक्स वसूली की आधी रकम है. टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन रिफॉर्म कमीशन की रिपोर्ट में पार्थसारथी शोम ने बताया था कि भारत ऐसा देश है जहां टैक्स देने वालों और टैक्स वसूलने वालों के बीच सबसे ज्यादा मुकदमे चल रहे हैं.

    ऐसे विवाद रोकने की कोशिश जरूरी
    अब जरूरत इस बात की है कि ऐसे कदम उठाए जाएं कि ये विवाद खड़े ही न हों. अप्रत्यक्ष करों जैसे एक्साइज, कस्टम और सर्विस टैक्स के ज्यादातर विवाद छोटी-छोटी बातों पर खड़े हो जाते हैं.

    मसलन सैंडल के स्ट्रैप या किसी लिबास में जिप को लेकर. या फिर स्टील के बचे हुए टुकड़ों को कबाड़ माना जाए या उन्हें कहीं और इस्तेमाल के लायक स्टील. या फिर किसी आयुर्वेदिक टूथपेस्ट को दवा मानें या सामान्य दंत मंजन. इन विवादों से बचने का एक ही तरीका है. टैक्स के नियम आसान बनाए जाएं.

    Tags: Budget, DELHI HIGH COURT, Gst

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