टर्म लाइफ इंश्योरेंस लेते समय इन बातों का जरूर रखें ध्यान, नहीं तो कैंसिल हो सकता है क्लेम

टर्म लाइफ इंश्योरेंस में इन बातों का रखें ख्याल.

टर्म लाइफ इंश्योरेंस में इन बातों का रखें ख्याल.

टर्म लाइफ इंश्योरेंस लेते है. जो 5, 10 और 20 साल तक के लिए कवर देता है. इस दौरान अगर पॉलिसी धारक की मौत हो जाती है. तो नॉमिनी को एकमुश्त बड़ी रकम दी जाती है. जिससे पॉलिसी धारक का परिवार भविष्य में जीवन यापन कर सके.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2021, 1:49 PM IST
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नई दिल्ली. अक्सर लोग अपने परिवार को सुरक्षा देने के लिए टर्म लाइफ इंश्योरेंस लेते है. जो 5, 10 और 20 साल तक के लिए कवर देता है. इस दौरान अगर पॉलिसी धारक की मौत हो जाती है. तो नॉमिनी को एकमुश्त बड़ी रकम दी जाती है. जिससे पॉलिसी धारक का परिवार भविष्य में जीवन यापन कर सके. आज की भाग-दौड़ भरी जिदंगी में ज्यादातर लोग टर्म लाइफ इंश्योरेंस को ही महत्व दे रहे है. लेकिन कई बार टर्म लाइफ इंश्योरेंस लेते समय गलती हो जाती है. जिसका खामियाजा आपके परिवार को भुगतना पड़ता हैं. इसलिए जब भी आप टर्म इंश्योरेंस ले तो कुछ जरूरी बातों का ध्यान अवश्य रखें. 

जानिए कैसे काम करता है टर्म इंश्योरेंस - सबसे पहले जानना जरूरी है कि  टर्म इंश्योरेंस होता क्या है. केनरा HSBC ओबीसी लाइफ इंश्योरेंस के सीनियर रिलेशनशिप ऑफिसर आशय सारस्वत ने बताया कि,  इस तरह के इंश्योरेंस में लोग अपने परिवार को वित्तीय सुरक्षा देने के लिए टर्म प्लान लेते हैं. जो सीमित अवधि के लिए निश्चित भुगतान दर पर कवरेज प्रदान करती है. यदि पॉलिसी की अवधि के दौरान बीमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो मृत्यु लाभ राशि नामांकित व्यक्ति को दी जाती है. वहीं टर्म इंश्योरेंस में अभी तक मैच्योरिटी नहीं मिलती थी. लेकिन कुछ बीमा कंपनियों ने मैच्योरिटी देना शुरू कर दिया है.

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इन वजहों से कैंसिल हो सकता है टर्म इंश्योरेंस का क्लेम 


  • टर्म प्लान के क्लेम को बीमा कंपनी उस स्थिति में देने से मना कर सकती है अगर पॉलिसीधारक की हत्या हो जाए और उसमें नॉमिनी का हाथ होने की भूमिका सामने आए या उस पर हत्या का आरोप हो.


  •  अगर टर्म पॉलिसी लेने वाला शराब के नशे में ड्राइव कर रहा हो या उसने ड्रग्स लिया हो तो इस स्थिति में मृत्यु होने की स्थिति में बीमा कंपनी टर्म प्लान की क्लेम राशि देने से इंकार कर सकती है.




  •  अगर टर्म पॉलिसी लेने से पहले से व्यक्ति को कोई बीमारी है और उसने पॉलिसी लेते हुए बीमा कंपनी को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं दी तो उक्त बीमारी से मौत होने पर बीमा कंपनी टर्म प्लान का क्लेम रिजेक्ट कर सकती है.


  •  इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI ने जीवन बीमा के तहत आत्महत्या के क्लॉज में 1 जनवरी 2014 से बदलाव किए हैं. इसलिए 1 जनवरी 2014 से पहले जारी हुई पॉलिसी में आत्महत्या के पुराने क्लॉज रहेंगे, जबकि बाद की नई पॉलिसी में नए आत्महत्या क्लॉज को लागू किया जाएगा. हालांकि कुछ बीमा कंपनियां आत्महत्या के मामले में कवरेज देती हैं कुछ नहीं देती हैं.



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