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OPINION: तब किस काम की होगी आर्थिक वृद्धि

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Updated: November 23, 2019, 1:26 PM IST
OPINION: तब किस काम की होगी आर्थिक वृद्धि
...तब किस काम की होगी आर्थिक वृद्धि

विश्व के लगभग हर भौगोलिक क्षेत्र (Geographical Area) में मौसम की चाल बदलने लगी है. गर्मी, सर्दी और बारिश की अवधियां बदल रही है. इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था (World Economy) के हर क्षेत्र पर पड़ने लगा है.

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  • Last Updated: November 23, 2019, 1:26 PM IST
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सुधीर जैन
नई दिल्ली. अब एक दो देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की चपेट में है. विश्व के लगभग हर भौगोलिक क्षेत्र (Geographical Area) में मौसम की चाल बदलने लगी है. गर्मी, सर्दी और बारिश की अवधियां बदल रही है. इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था (World Economy) के हर क्षेत्र पर पड़ने लगा है. उधर यह हमें पहले से पता है कि आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) के लिए जो उद्यम किए जा रहे हैं वे जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं. यानी देखना पड़ेगा कि ताबड़तोड़ औद्योगिकीकरण कहीं घाटे का सौदा तो साबित नहीं हो रहा है?

इस साल गुज़रा मानसून (Monsoon Season) गवाह है कि बारिश की बेतरतीब चाल से भारत में भयावाह बाढ़ और सूखे (Flood and Draught) ने क्या गुल खिलाया. विशेषज्ञ इन सभी आपदाओं का एक कारण जलवायु परिवर्तन को मान रहे हैं. और यह जाना जा चुका है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण पृथ्वी का ताप बढ़ना है. और यह वैश्विक ताप कार्बन उत्सर्जन से बढ़ रहा है जिसका कारण औद्योगिक गतिविधियां हैं. बढ़ते उद्योग और वाहनों ने इंसानों का तो दम घोंटा ही, साथ ही खराब हुए पर्यावरण (Environment) ने ऐसा और इतना नुकसान पहुंचा दिया जिसकी भरपाई होना मुश्किल है.

ऐसा नहीं है कि जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए कुछ किया ना गया हो. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2015 में हुआ पेरिस समझौता इस दिशा में लिया गया अभी तक का सबसे बड़ा कदम था. कोई 196 देशों ने इस समझौते पर दस्तखत किए थे. अमेरिका, फ्रांस, चीन जैसे विश्व के सभी ताकतवर देश इस समझौते में शामिल थे. इस समझौते का मुख्य मकसद हर देश के कार्बन उत्सर्जन की सीमा तय करना था ताकि पृथ्वी में तापमान बढ़ने की गति को धीमा किया जा सके. यह तभी संभव था जब आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार पर लगाम लगाई जाए. लेकिन, आर्थिक लाभ में कटौती कर पाना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता. तात्कालिक लाभ के सामने भविष्य की अनदेखी हो जाती है. ऐसा ही कुछ अमेरिका की तरफ से होता दिख रहा है.

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दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका पेरिस समझौते से अलग होने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर चुका है. अमेरिकी सरकार ने इसका कारण यह बताया है कि इस समझौते में बंधे होने के कारण उत्पादन और रोजगार बढाने में अड़चन आ रही है. अमेरिका का तर्क है कि उसका अपना हित वैश्विक हित की तुलना में सबसे पहले है. इस बात को अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति ट्रम्प ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे के जरिए खूब प्रचारित कर चुके हैं. लेकिन पेरिस समझौते से अलग होने के बाद यह सवाल जरूर खड़ा हो गया कि आर्थिक वृद्धि की आड़ में पर्यावरण को होने वाली गंभीर क्षति को कब तक अनदेखा किया जा सकता है. वह भी तब जब अमेरिका खुद कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है.
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अमेरिका के इस कदम ने विशेषज्ञों को एक महत्वपूर्ण अवधारणा पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है. अब तक की अवधारणा यह थी कि आर्थिक विकास और पर्यावरण की रक्षा का काम एक साथ चल सकता है. अमेरिका के फैसले और उसके पीछे दिए तर्क से यह बात बन रही है कि ये दोनों एकसाथ नहीं चल सकते. यानी नए सिरे से सोच विचार का माहौल बनता दिख रहा है.

पीछे मुड़कर देखें तो एक दशक पहले तक सामान्य अवधारणा यही थी कि आर्थिक विकास और पर्यावरण की चिंता आपस में विरोधाभासी हैं. लेकिन इस क्षेत्र में हुए शोध कार्यों और विचार विमर्श से अब यह निष्कर्ष निकल कर आ रहा है कि पर्यावरणसंगत नीतियाँ और औद्योगिक प्रक्रियाएं न सिर्फ जलवायु परिवर्तन को रोक सकती हैं बल्कि यह बुद्धिमत्ता और संयम एक समय बाद आर्थिक लाभ भी दे सकता है.

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विशेषज्ञों ने यह हिसाब लगाकर बताया है कि प्र्यावरण की कीमत पर किया जाने वाला आर्थिक विकास भविष्य में आर्थिक विकास की संभावनाओं को खा जाता है. मसलन ‘ग्लोबल कमीशन ऑन द इकॉनमी एंड क्लाइमेट‘ की रिपोर्ट में निकल कर आया कि पर्यावरण सुधार के लिए अगर सख्त कदम उठाए जाएं तो 2030 तक 26 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक हानि को रोका जा सकता है यानी आर्थिक लाभ हासिल किया जा सकता हैै.

अमेरिका के ही नेशनल क्लाइमेट असेसमेंट की तरफ से बताया गया है कि अगर इसी तरह पृथ्वी की आबोहवा बिगड़ती रही तो इस सदी के अंत तक वार्मिंग की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फसल नष्ट होने, श्रम की बर्बादी आदि से कई सौ बिलियन डॉलर का नुकसान झेलना पड़ जाएगा. इसी तरह अमेरिका के ही नेशनल ब्यूरो ऑफ इकनोमिक रिसर्च के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से सन 2100 तक अमेरिकी आय में साढ़े दस फीसद की गिरावट आ सकती है. लगता है कि यही कारण है कि खुद अमेरिका के भीतर ही अमेरिकी सरकार के फैसले की आलोचना खुलकर हो रही है. अमेरिका के ही कई संगठनों, संस्थाएओं, समूहों ने ऐलान कर दिया है कि सरकारी फैसले के बावजूद वे पेरिस समझौते के प्रावधानों के हिसाब से संयम बरतेंगे यानी प्र्यावरण की चिंता करते हुए ही आर्थिक गतिविधियां करेंगे.



हिसाब यहीं खत्म नहीं होता. अगर बात सिर्फ आर्थिक लाभ हानि की ही है तो पेरिस समझौते से अमेरिका के अलग होने से वह स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में पैदा हाने वाले वैश्विक बाजार को खो देगा. विशेषज्ञों का हिसाब बताता है कि इस वैश्विक बाजार से वंचित होना अमेरिका के लिए फायदे का सौदा नहीं होगा. वह भी तब जब अमेरिका के बड़े प्रतिद्वंदी देश सौर और पवन उर्जा और दूसरी लो कार्बन टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ा रहे हैं और इनक्षेत्रों के बाजार में अपनी पैठ जमाते जा रहे हैं.

इस बात को गौर से देखा जाना चाहिए कि अमेरिका के अंदर ही अलग अलग स्तर पर पेरिस समझौते के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं. इसके पीछे सिर्फ पर्यावरण की चिंता और सेहत का ख्याल ही नहीं बल्कि आर्थिक लाभ हानि का गुणाभाग भी है. अमेरिका के भीतर लगभग 3800 इकाइयां पेरिस समझौते को अपनी स्तर पर लागू रखने के पक्ष में ऐलान कर चुकी हैं. इन इकाइयों में जनप्रतिनिधि समूह, उद्योग प्रतिष्ठान और सामाजिक संस्थाएं शामिल हैं.

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कई कंपनियां पर्यावरण संगत नीतियों से होने वाले आर्थिक लाभ के तर्क भी दे रही हैं. ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि किसी देश में राष्ट्रीय स्तर पर सरकार अलग नीति अपनाए और उस देश के उद्योग व्यापार अलग वैश्विक नीति का समर्थन करते नजर आएं. मसलन दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कंपनी वालमार्ट ने पेरिस समझौते की शर्तों को अपने स्तर पर लागू रखने का निर्णय लिया है. वालमार्ट करीब दो दर्जन देशों में व्यापार करती है. वालमार्ट ने इस समझौते के समर्थन में कई तर्क रखे हैं. मसलन अगर वैश्विक ताप बढ़ता है तो खाने पीने की चीजों को स्टोर करने के लिए रेफ्रिजरेशन की व्यवस्था साल में ज्यादा दिनों के लिए करनी पड़ेगी.



उपभोक्ता और कच्चे माल के विक्रेता अस्थिर मौसम का शिकार बनने लगेंगे जिससे व्यापार घटने के खतरे पैदा हो जाएंगे. इसी के साथ वालमार्ट द्वारा बेचे जा रहे कृषि आधारित उत्पादन में सूखे और अतिवृष्टि से कमी आने लगेगी इससे कम्पनी के व्यापार पर असर पड़ेगा. इन्ही अंदेशों के कारण अमेरिका की कई कंपनियां कार्बनिक उत्सर्जन कम करने में अपना फायदा देख रही हैं.

अमेरिका के ये उदाहरण पूरी दुनिया के लिए लागू हो सकते हैं. जो देश इस समय यह सोच रहे हैं की जलवायु परिवर्तन से उन्हें अभी कोई तात्कालिक संकट नहीं है तो उन्हें भी यह समझना पड़ेगा कि अगर पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा तो आज नहीं तो कल सभी पर आंच आएगी. और फिर उस स्थिति को सँभालने में आज से कहीं ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. उस समय तक पूरे जीव जगत पर असर पड़ चुका होगा. जीव जगत में वह मानव भी शामिल है जिसके लिए आर्थिक वृद्धि की बात की जाती है. फिर ऐसी आर्थिक वृद्धि किस काम की?

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First published: November 23, 2019, 1:21 PM IST
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