खाद्य तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी, जानिए इस मुश्किल से कैसे निपट रही है सरकार

खाद्य तेल की बढ़ती कीमत से लोग परेशान हैं.

2019-20 में सरकार ने 263 लाख टन दालों के उत्पादन का लक्ष्य रखा था. लेकिन अब महज 5 सालों में दाल की कहानी यह हो गई है कि सरकार लाखों टन के सरप्लस पर बैठी है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) के तहत आने वाले 81 करोड़ नागरिकों को जब सरकार ने 5 किलो अतिरिक्त चावल और गेहूं देने की घोषणा की.

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    नई दिल्ली. खाने के तेल में लगी आग पिछले कुछ हफ्तों से सुर्खियों में है. सभी छह श्रेणियों के तेल की कीमतें पिछले साल भर में 50 से 70 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं. कीमतों में आई यह बढ़ोतरी कोई सामान्य कमोडिटी साइकल का हिस्सा नहीं है. यह पिछले 11 सालों में तमाम वेजिटेबल ऑयल की कीमतों में आया सबसे बड़ा उछाल है. सरसों तेल साल भर में 44% बढ़कर 171 रुपये हो गया है, सोया ऑयल और सूरजमुखी तेल भी पिछले साल भर 50-50% बढ़ चुके हैं. तेलों की कीमत में आई इस वृद्धि की शुरुआत पिछले जनवरी से ही हो गई थी और यह पिछले लगभग 15-16 महीने से लगातार बढ़ते हुए मौजूदा स्तरों पर पहुंची है.

    खास बात यह है कि तमाम चिंता जताने और बैठकें करने के बावजूद सरकार के विकल्प बहुत सीमित प्रतीत हो रहे हैं, जिसका कारण यह है कि कीमतों में आई इस बढ़ोतरी की जड़ें देश में तिलहन के उत्पादन और खपत में भारी अंतर और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेलों के दाम में लगातार आ रही वृद्धि में धंसी हैं. इनमें पहली के लिए दूरगामी रणनीति बनाकर योजना पूर्वक प्रयास करने की आवश्यकता है, जबकि दूसरे कारण पर सरकार के पास करने के लिए बहुत कुछ है नहीं.

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    देश में हरित क्रांति के बाद देश खाद्यान्नों के मामले में तो आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन दलहन और तिलहन दो ऐसी फसलें रहीं, जिसमें आयात पर निर्भरता बनी रही. मौजूदा संदर्भ में तिलहन की बात की जाए तो 2019-20 में देश में इनका कुल उत्पादन 106.5 लाख टन था, जबकि मांग थी 240 लाख टन. यानी भारत को अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए 130 लाख टन से ज्यादा तेलों का आयात करना पड़ा. आज के दौर में खाद्य तेलों की कीमतों का जो हाल दिख रहा है, यह और भी बुरा हो सकता था, यदि 2020-21 के दौरान भारत के तेल उत्पादन में बढ़ोतरी और मांग में कमी नहीं आई होती.

    दरअसल केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में दलहन और तिलहन दोनों का बुवाई रकबा बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है. दलहन में देश ने जो सफलता हासिल की है, उसे नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वपूर्ण सफलता माना जा सकता है और तिलहन के क्षेत्र में आए मौजूदा संकट का हल भी इसी सफलता से ढूंढा जा सकता है. जब मई 2014 में मोदी सरकार आई, उस समय दलहन के उत्पादन और मांग में बहुत भारी अंतर था. लेकिन अगले साल 2015-16 में लगातार सूखे की स्थिति के कारण देश में दालों की अभूतपूर्व कमी हुई. दालों के दाम 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गये और देश में हाहाकार मच गया. लेकिन सरकार ने उस स्थिति के लिए सिर्फ तुरत-फुरत समाधान न खोज कर समस्या के समाधान की एक पुख्ता दीर्घकालिक योजना की शुरुआत की.

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    सरकार ने दलहन के उत्पादन, मांग और रेगुलेटरी – तीनों मोर्चों पर काम शुरू किया। सरकार ने उत्पादन बढ़ाने के लिए एक ओर तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी की गई, वहीं दूसरी ओर 2016-17 में शुरू किए गये राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) के तहत दालों की अतिरिक्त कवरेज दी गई. इतना ही नहीं, सरकार ने ICAR इंस्टीट्यूट्स और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों की मदद से 150 बीज केंद्र तैयार करवाए, जिनसे क्वालिटी सीड का उत्पादन करने के लिए सब्सिडी दी गई और फिर किसानों को उन बीजों के मिनी किट दिए गये। साल 2016-17 सरकार ने अलग-अलग दालों के MSP पर 8-16% तक की बढ़ोतरी कर दी.

    मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत सरकार ने दलहन की खरीद के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां कीं. मूल्य स्थिरीकरण फंड (PSF) के 10000 करोड़ रुपयों से सरकार ने दालों का 20 लाख टन बफर स्टॉक तैयार करने का लक्ष्य रखा और दाल उत्पादक प्रमुख राज्यों, जैसे- मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के साथ समन्वय में दालों की सरकारी खरीद को कई गुना बढ़ाया गया.

    MSP और सरकारी खरीद में बढ़ोतरी का असर था कि 2016-17 में दालों के उत्पादन में साल दर साल 42% की बढ़ोतरी हुई, जो कि किसी भी फसल श्रेणी के लिए अभूतपूर्व था. नाफेड ने 2016-17 में किसानों से 8.7 लाख टन दालों की खरीद की, जिसका महत्व यदि समझना हो तो यह समझ लीजिए कि यह खरीद पिछले 15 साल में की गई दालों की कुल खरीद के बराबर थी. अगले साल 2017-18 में एक बार फिर MSP 7-10% बढ़ा दिया गया.

    इतना ही नहीं घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए दालों के आयात और कस्टम ड्यूटी को भी बदला गया. इन उपायों का नतीजा यह हुआ कि उस साल उत्पादन रिकॉर्ड 254 लाख टन पहुंच गया और सरकारी खरीद पिछले साल के मुकाबले दोगुने से बढ़कर 20 लाख टन तक हुई. 2018 के खरीफ सीजन के लिए जब नरेंद्र मोदी सरकार ने फसलों की लागत का डेढ़ गुना MSP देने का फैसला किया, तब दालों के उत्पादन को एक बार फिर जबर्दस्त मदद मिली. मूंग का समर्थन मूल्य 25% बढ़ा और उत्पादन 22%. चना और दूसरे दालों के उत्पादन पर भी कुछ ऐसा ही असर दिखा. साल 2018-19 में एक बार फिर सरकारी खरीद दोगुने से बढ़कर 42 लाख टन तक पहुंच गई.
    2019-20 में सरकार ने 263 लाख टन दालों के उत्पादन का लक्ष्य रखा था. लेकिन अब महज 5 सालों में दाल की कहानी यह हो गई है कि सरकार लाखों टन के सरप्लस पर बैठी है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) के तहत आने वाले 81 करोड़ नागरिकों को जब सरकार ने 5 किलो अतिरिक्त चावल और गेहूं देने की घोषणा की तो साथ में दाल भी मुफ्त देने का प्रावधान किया गया.

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    यदि इसी नजरिये से खाद्य तेलों के भाव में आई तेज बढ़ोतरी को देखा जाए, तो क्या सरकार इस आपदा को भी अवसर में बदलने को तैयार है? दालों के मामले में अपनाया गया रोडमैप और उसकी सफलता ने एक तैयार फॉर्मूला सामने रखा है. आवश्यकता है तो बस उसे क्रियान्वित करने की. फिर शायद अगले पांच साल में तिलहन भी भारतीय कृषि की एक और सफलता की बानगी बन सकेगी.

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