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मंदी: UK और यूरोप एक बार फिर 30 साल पहले वाले संकट में! बाहर निकलना इस बार भी नहीं आसान!

आज के संकट को समझने के लिए हमें 1992 के संकट को समझना होगा.

आज के संकट को समझने के लिए हमें 1992 के संकट को समझना होगा.

यूनाइटेड किंगडम की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाउंड अब तक के सबसे निचले स्तर पर है. 30 साल पहले ...अधिक पढ़ें

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हाइलाइट्स

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं ब्रेटन वुड्स सिस्टम का हिस्सा बनी थीं.
1979 में यूरोपीय देशों ने एक विनिमय दर तंत्र (Exchange Rate Mechanism - ERM) बनाया.
1990 में, यूके ने ईआरएम में शामिल होने का फैसला किया, लेकिन ये टाइमिंग गलत थी.

नई दिल्ली. यूनाइटेड किंगडम की अर्थव्यवस्था इस समय एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है. इसकी मुद्रा स्टर्लिंग पाउंड अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर है और तेजी से घट रही है. सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरें तेजी से बढ़ने के चलते ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक को बाजारों को शांत करने के लिए सरकारी बॉन्ड खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा है. ब्रिटेन के इस संकट पर विचार करते समय दिमाग उस घटना को याद करता है, जो 30 साल पहले हुई थी. आज के संकट को समझने के लिए हमें 1992 के संकट को समझना होगा. इसलिए इतिहास में गोता लगाना जरूरी है.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं ब्रेटन वुड्स सिस्टम (Bretton Woods system) का हिस्सा बनने के लिए सहमत हो गई थीं. इस सिस्टम में सभी करेंसीज़ अमेरिकी डॉलर (यूएसडी) के मुकाबले आंकी गई थीं, और यूएसडी, बदले में, सोने के मुकाबले आंकी गई थी. एक स्थिर मौद्रिक नीति चलाने की जिम्मेदारी अमेरिका पर थी, और अन्य केंद्रीय बैंकों ने बस उसके एक्शन की नकल की. यदि अमेरिका में मुद्रास्फीति अधिक होती, तो केंद्रीय बैंक उच्च ब्याज दरों के लिए मौद्रिक नीति को कड़ा करता. ऊंची ब्याज दरों से अमेरिका में अधिक पूंजी जाएगी, जिससे अन्य मुद्राओं स्वाभाविक रूप से गिरेंगी. अन्य केंद्रीय बैंक भी अपनी करेंसियों के गिरने से रोकने के लिए नीतिगत दरों में वृद्धि करेंगे.

ब्रेटन वुड्स सिस्टम से अमेरिका हो गया था बाहर
1971 में अमेरिका ब्रेटन वुड्स समझौते से बाहर हो गया, क्योंकि वह घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों के दोहरे लक्ष्यों को एकरूप करने में सक्षम नहीं था. सिस्टम के टूटने से देशों को अपनी मुद्राओं के लिए नए ठिकाने की तलाश करनी पड़ी. 1970 के दशक में तेल के दोहरे झटकों के कारण दुनियाभर में महंगाई में वृद्धि देखी गई, जिससे अस्थिरता बढ़ गई.

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बात 1979 की है, जब यूरोपीय देशों ने एक विनिमय दर तंत्र (Exchange Rate Mechanism – ERM) स्थापित करने का निर्णय लिया. इसकी मेंबर करेंसीज़ को सभी करेंसीज़ के खिलाफ आंका गया और एक बैंड में उतार-चढ़ाव की अनुमति दी गई. ईआरएम ब्रेटन वुड्स सिस्टम के समान था और USD को यूरोपीय करेंसीज़ से बदल दिया गया था. समय के साथ, इस सिस्टम में पश्चिम जर्मनी का वर्चस्व होने लगा, क्योंकि इसकी मौद्रिक नीति अन्य सदस्यों की तुलना में मुद्रास्फीति से निपटने में अधिक प्रभावी थी. विनिमय दर को पश्चिम जर्मन मुद्रा ड्यूश मार्क (Deutsche Mark) से जोड़कर रखते हुए, बाकी देशों ने जर्मनी की कम मुद्रास्फीति को अन्य देशों में आयात करने का लक्ष्य रखा.

ब्रिटेन के सामने नहीं था दूसरा विकल्प, लेकिन…
ब्रिटेन 1979 में ईआरएम में शामिल नहीं हुआ, क्योंकि सरकार को लगता था कि वह अपने आर्थिक हाउस को खुद से व्यवस्थित कर सकती है. हालांकि, ब्रिटेन में 1980 के दशक में मुद्रास्फीति पश्चिम जर्मन की महंगाई की तुलना में बहुत अधिक बनी रही. अंत में, 1990 में, यूके ने ईआरएम में शामिल होने का फैसला किया. लेकिन इस समय शामिल होना ब्रिटेन के लिए काफी खराब रहा. इसके 2 कारण थे.

पहला, 1990 के दशक में यूके सहित सभी मेंबर देशों के मैक्रोइकॉनमिक फंडामेंटल काफी खराब थे. उनके पास जर्मनी की तुलना में अधिक मुद्रास्फीति और घाटा था. ERM में शामिल होना और पश्चिम जर्मनी की मौद्रिक नीति का अपनाना, तब के लिए एक अच्छी हेल्प हो सकता था, लेकिन परमानेंट इलाज नहीं था.

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दूसरा कारण, जर्मनी की अपनी अर्थव्यवस्था समस्याओं का सामना कर रही थी. 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने के बाद, पश्चिम जर्मनी और पूर्वी जर्मनी का पुनर्मिलन होने जा रहा था. पश्चिम जर्मन का केंद्रीय बैंक चिंतित था कि पुनर्मिलन से मुद्रास्फीति बढ़ेगी और मौद्रिक नीति को सख्त करना होगा.

इन दो कारणों ने यूके और अन्य नीति निर्धारक मेंबर्स को दुविधा में डाल दिया. ईआरएम को जारी रखने के लिए सदस्यों को अपनी मौद्रिक नीतियों को भी कड़ा करना पड़ा. हालांकि, एक सख्त नीति किसी भी अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर देती है. दूसरा विकल्प था ईआरएम को छोड़ना और पाउंड को गिरते रहने देना. लेकिन यह कोई अच्छा विकल्प नहीं था, क्योंकि उन्होंने हाल ही में ईआरएम में एंट्री ली थी और ऐसा करना सरकार के लिए प्रतिष्ठा को ठेस की तरह होता. यूके सरकार ने अपने सीमित विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके ईआरएम में बने रहने की कोशिश की.

वित्तीय निवेशक जॉर्ज सोरोस को लगता था- नीति टिकाऊ नहीं
वित्तीय निवेशक, विशेष रूप से जॉर्ज सोरोस (George Soros), समझते थे कि यूके सरकार की नीति टिकाऊ नहीं थी. उन्होंने उम्मीदें बनाई थीं कि अंततः सरकार के पास ईआरएम छोड़ने और पाउंड को गिरने देने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने सरकार के पाउंड खरीदने के फैसले के खिलाफ पाउंड को बेचने के लिए फाइनेंशियल पोजिशन लेना शुरू कर दिया. यह तबाही से पहले की बात है.

16 सितंबर 1992 को बुधवार था. यह हिसाब-किताब देखने का दिन था. सरकार ने महसूस किया कि करेंसी को बचाना बहुत महंगा साबित हो रहा है. आखिरकार, सरकार ने ईआरएम को छोड़ दिया और पाउंड को गिरने देने की अनुमति दे दी. इस फैसले से निवेशकों को बाजारों की मार झेलनी पड़ी. सरकार ने बाद में अनुमान लगाया कि इस बुधवार की लागत लगभग 3.5 बिलियन पाउंड थी. इसे काला बुधवार (Black Wednesday) कहा गया.

अब 2022 में कुछ समानताएं, कुछ फर्क
तो अब आते हैं 2022 पर. हम देखते हैं कि तब और अब में कुछ समानताएं और अंतर हैं. समानता यह है कि ब्रिटेन का मैक्रो इकॉनमिक प्रदर्शन एक बार फिर कमजोर हो गया है. अर्थव्यवस्था ने पिछले 15 वर्षों में कई झटके झेले हैं, जैसे कि 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट, 2016 ब्रेक्सिट, 2020 की महामारी और अब 2022 का युद्ध. अर्थव्यवस्था कम विकास, उच्च मुद्रास्फीति और घाटे का सामना कर रही है, जैसा कि 1990 के दशक में हुआ था.

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मुख्य अंतर यह है कि 1992 के उलट करेंसी को बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के गिरने की अनुमति है. 1992 में बड़े झटके के बाद, सरकार ने 1998 में मुद्रास्फीति को टार्गेट करने का एक खास फ्रेमवर्क अपनाकर अपनी मौद्रिक नीति में सुधार किया था. ITF के तहत, केंद्रीय बैंक को मुद्रास्फीति का एक लक्ष्य और उसे प्राप्त करने के लिए स्वायत्तता दी गई थी. केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को पाने और व्यापक आर्थिक बुनियादी बातों में सुधार के लिए ब्याज दरों का उपयोग करेगा. विनिमय दरों का स्तर बाजारों पर छोड़ दिया गया था.

अब जर्मन की इकॉनमी भी नहीं बचा सकती!
1992 का संकट केवल यूके तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इटली और फ्रांस जैसे अन्य सदस्य देश भी इसकी चपेट में आए थे. इन देशों ने यूरो को एक सामान्य मुद्रा के रूप में अपनाने का फैसला किया, लेकिन यूके ने इससे बाहर रहने का विकल्प चुना. यूके यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहा, लेकिन 2016 में इस सिस्टम से बाहर हो गया. महामारी और अब यूक्रेन युद्ध ने फिर से यूके और यूरोप को एक तरफ धकेल दिया है. जर्मन अर्थव्यवस्था भी इस समय चरमरा रही है और इन्हें बचाने में सक्षम नहीं दिखती.

अमेरिकी अर्थव्यवस्था उच्च मुद्रास्फीति के दौर से गुजर रही है, लेकिन उसकी आक्रामक मौद्रिक नीति और बेहतर आर्थिक संभावनाओं का मतलब है कि निवेशक अन्य मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर को पसंद करते हैं. यूरो में भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरावट है. मौजूदा विनिमय दर संकट ने ब्रिटेन और यूरोप को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है, जैसा कि 30 साल पहले हुआ था. उस समय संकट से बाहर आना आसान नहीं था और अब भी बाहर आना आसान नहीं होगा. यूके और यूरोप को अपने आर्थिक हाउस को व्यवस्थित करने के लिए गहरे सुधारों की आवश्यकता है.

इसके लेखक अमोल अग्रवाल अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में फैकल्टी हैं.

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