म्यूचुअल फंड्स से जुड़े उन 5 सवालों के जवाब, जिनका सीधा मुनाफे पर होता है असर

म्यूचुअल फंड्स से जुड़े उन 5 सवालों के जवाब, जिनका सीधा मुनाफे पर होता है असर
म्यूचुअल फंड्स से जुड़े उन 5 सवालों के जवाब, जिनका सीधा मुनाफे पर होता है असर

एक आम निवेशक म्यूचुअल फंड्स में एसआईपी के जरिए पैसा तो लगा देता है लेकिन अक्सर कई सवाल उसके मन में होते है जिनके जवाब नहीं मिलने पर उसके निवेश में होने वाला फायदा कई बार घाटे में भी बदल जाता है. आइए जानें ऐसे ही सवालों के जवाब...

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एक आम निवेशक किसी के कहने पर भी म्यूचुअल फंड्स में निवेश कर तो देता है लेकिन आगे क्या करना है कब तक फंड्स में बने रहना है. इस सवाल का जवाब उसके पास नहीं होता है. इस पर एक्सपर्ट्स कहते है कि लक्ष्य पूरा होने के बाद फंड से निकलना सही होता है. इक्विटी फंड में लक्ष्य करीब होने पर कुछ साल पहले निकल सकते हैं. अगर लगातार बेंचमार्क से कम रिटर्न मिला तो भी निकल सकते हैं. इसके लिए बेंचमार्क के साथ कैटैगरी के बाकी फंड्स से तुलना करें. फंड के अंडरपरफॉर्मेंस की वजह पर गौर करें, वजह संतोषजनक ना होने पर निकल सकते हैं और उसी कैटेगरी का बेहतर फंड चुन सकते हैं. आइए समझें म्यूचुअल फंड्स में बदलाव के सही समय का फॉर्मूला.

(1) शेयर बाजार की तेजी या फिर गिरावट पर फंड्स में बदलाव करना चाहिए?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि जब बाजार अपनी ऊंचाई के करीब पहुंच रहा होता है तो कई निवेशक यह सोचते हैं कि क्या उन्हें म्यूचुअल फंड स्कीम से प्रॉफिट बुक कर लेना चाहिए. इसी तरह से जब बाजार गिर रहा होता है तो कई निवेशक सोचते हैं कि नुकसान से बचने के लिए जल्द से अपना पैसा सुरक्षित कर लेना चाहिए. हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि अपने फंड से पैसे निकालने का यह सही तरीका नहीं है. इससे आपको नुकसान झेलना पड़ सकता है. (ये भी पढ़ें-3 से 4 लाख में शुरू करें ये बिजनेस, लाखों में होगी कमाई)

निवेशकों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी स्थिति में आपकी स्कीम के फंड मैनेजर प्रॉफिट बुकिंग करके आपके नुकसान को घटा रहे होते हैं. फंड मैनेजर्स ऐसे स्टॉक्स को लगातार बेच रहे होते हैं, जिनमें नुकसान हो रहा है या आगे नुकसान की संभावना है. साथ ही ऐसे स्टॉक्स में निवेश कर रहे होते हैं जिनका प्रदर्शन बढ़िया है. इसलिए बाजार के उतार-चढ़ाव पर स्कीम से निकलना बेहतर फैसला नहीं है.
(2)अगर अच्छे रिटर्न नहीं मिले तब क्या करना चाहिए


आपने जिस स्कीम में पैसा लगाया है, वह अगर अंडरपरफार्म कर रही है तो इसकी समीक्षा बेहद जरूरी है. इसी तरह से हो सकता है कि स्कीम के फंडामेंटल्स में बदलाव आया हो और आपके पैरामीटर पर स्कीम खरी नहीं उतर रही हो. ऐसे में आपको अपने फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स की मदद लेनी चाहिए. इसके बाद स्कीम को भुनाया जा सकता है. (ये भी पढ़ें-44 साल पुरानी इस स्कीम से भारत को हटा सकता है अमेरिका!)

(3)अगर पैसे की जरुरत है तब क्या करें
सभी ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड्स से आसानी से बाहर निकला जा सकता है. अगर आपको आगे पैसे की अचानक जरूरत पड़ सकती है तो आपको लिक्विड या कॉन्टीजेंसी फंड में निवेश करना चाहिए. फंड को रिडीम करना ठीक नहीं हैं. इससे वित्तीय लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल हो सकता है. ये भी दिमाग में रखना जरूरी है कि टैक्स और एग्जिट लोड भी चुकाने पड़ सकते हैं.

(4) क्या एक साल में ही फंड से निकल जाना चाहिए
कई निवेशक अपने खास वित्तीय लक्ष्य मसलन बच्चों की शिक्षा, उनकी शादी, कार खरीदने, विदेश यात्रा के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड में एसआईपी के जरिए निवेश करते हैं. वित्तीय लक्ष्य पूरे होने में एक साल या 15 महीने का समय बचने पर आप सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान (एसटीपी) की सुविधा ले सकते हैं. एसटीपी के लिए आप डेट या लिक्विड फंड चुन सकते हैं या पूरी रकम डेट फंड में ट्रांसफर कर सकते हैं. ऐसा करने से आप बाजार के उतार-चढ़ाव से बच सकते हैं.

(5) हर साल अच्छा मुनाफा पाने के लिए क्या करना चाहिए
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि निवेशकों को साल में कम से कम एक बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करनी चाहिए. यह तय करने के लिए आपके वित्तीय लक्ष्य आपकी रिस्क प्रोफाइल से मैच कर रहे हैं या नहीं. अगर इक्विटी मार्केट में उतार-चढ़ाव से आपका एसेट एलोकेशन 5 फीसदी से ज्यादा बदलता है तो आपको पोर्टफोलियो को री-बैलेंस करना चाहिए. उदाहरण को तौर पर पोर्टफोलियों में इक्विटी एलोकेशन 60 फीसदी है, जो बाजार की तेजी के बाद एक साल में यह बढ़कर 70 फीसदी हो गया है. ऐसे में आप कुछ इक्विटी फंड बेचकर इसे री-बैलेंस कर सकते हैं और इस पैसे को डेट फंड में निवेश कर सकते है.

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