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आखिर किस डर के कारण भारतीय बैंक स्‍टूडेंट्स को एजुकेशन लोन देने से कर रहे हैं इनकार?

पिछले कुछ साल से भारतीय बैंक एजुकेशन लोन को लेकर उत्‍साहित नहीं हैं. बैंकों का एजुकेशन लोन पोर्टफोलियो साल-दर-साल घटता जा रहा है.

पिछले कुछ साल से भारतीय बैंक एजुकेशन लोन को लेकर उत्‍साहित नहीं हैं. बैंकों का एजुकेशन लोन पोर्टफोलियो साल-दर-साल घटता जा रहा है.

बैंकों की ओर से बांटे जा रहे एजुकेशन लोन (Education Loan) के घटने का आंकड़ा बहुत ज्‍यादा तो नहीं है, लेकिन उनका नकारात् ...अधिक पढ़ें

    नई दिल्‍ली. देश में मौजूदा दौर में एजुकेशन काफी महंगी हो गई है. अगर आप हायर एजुकेशन के लिए किसी अच्‍छे इंस्टिट्यूट में एडमिशन लेना चाहते हैं और पैसों की कमी आड़े आती है तो बैंक (Banks) आपकी मदद करते हैं. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में एजुकेशन लोन (Education Loan) को लेकर बैंकों का रवैया बदलता हुआ नजर आ रहा है. साल-दर-साल बैंकों की ओर से बांटे जा रहे एजुकेशन लोन का आंकड़ा घटता जा रहा है. बैंकों की ओर से बांटे गए एजुकेशन लोन का आंकड़ा नवंबर, 2019 में 66,902 करोड़ रुपये रहा, जो सितंबर 2017 तक 71,975 करोड़ रुपये था. साल-दर-साल (YoY) के आधार पर नवंबर, 2019 से पहले के 12 महीनों में बैंकों का एजुकेशन लोन पोर्टफोलिया 3.5 फीसदी की दर से घटा है.

    घटती मांग और बढ़ते एनपीए के कारण बैंक खींच रहे हाथ
    बैंकों की ओर से बांटे जा रहे एजुकेशन लोन के घटने का आंकड़ा बहुत ज्‍यादा तो नहीं है, लेकिन उनका नकारात्‍मक रुझान देश की अर्थव्‍यवस्‍था (Economy) की धुंधली तस्‍वीर पेश कर रहा है. एक समय था जब बैंकों के बीच एजुकेशन लोन बांटने की होड़ रहती थी. बैंक इसके लिए कैंपेन भी चलाते थे. फिर ऐसा क्‍या हुआ कि बैंकों ने अचानक एजुकेशन लोन बांटना करीब-करीब बंद कर दिया. बता दें कि बैंक किसी भी सेक्‍टर को लोन देना तभी बंद करते हैं जब या तो उस सेक्‍टर से कर्ज की मांग (Demand) कम हो जाए या उसके कारण एनपीए (NPA) बढ़ने लगे. एजुकेशन लोन के मामले में दोनों फैक्‍टर्स ने काम किया. ज्‍यादातर बैंक एनपीए के बढ़ते आंकड़ों पर अंकुश लगाने के लिए अतिरिक्‍त सावधानी बरतने लगे.

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    नौकरी नहीं मिलने पर कर्ज भुगतान बन जाता है संकट
    एजुकेशन लोन का सीधा संबंध देश की अर्थव्‍यवस्‍था और जॉब मार्केट (Job market) से है. स्‍टूडेंट्स अच्‍छी से अच्‍छी शिक्षा के लिए भारी-भरकम लोन (Heavy Loans) लेते हैं. इसके बाद जब उन्‍हें नौकरी मिलने में परेशानी होती है तो सिर्फ उन पर असर नहीं पड़ता. प्रोफेशनल कोर्स पूरा करने के बाद जॉब के लिए भटकते हुए युवाओं के सामने नौकरी के बाद दूसरा सबसे बड़ा संकट कर्ज का भुगतान होता है. भारत में करीब 4 लाख रुपये तक के एजुकेशन लोन के लिए बैंक स्‍टूडेंट्स से गारंटी नहीं मांग सकते हैं. वहीं, 4 लाख से 7.5 लाख रुपये तक के लोन के लिए बैंक किसी तीसरे व्‍यक्ति की गारंटी (Personal Guarantee) की डिमांग कर सकते हैं. इससे ज्‍यादा राशि के लोन के लिए स्‍टूडेंट को गारंटी देनी पड़ती है.

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    कम सैलरी से जरूरतें पूरी करना ही बन जाता है चुनौती
    बैंक अमूमन स्‍टूडेंट्स को लोन के लिए मना नहीं करते हैं. साथ ही लोन देने के सभी नियमों (Rules) में कर्ज राशि और स्‍थानीय राजनीतिक हस्‍तक्षेप से ढील दे दी जाती है. ऐसे में बैंकों को लोन की रिकवरी में भी मुश्किलें पेश आती हैं. बैंकों में एकराय है कि ज्‍यादातर कम नौ‍करियां पैदा करने वाले या कम वेतन (Low Salary) देने वाले सेक्‍टर में काम करने वाले स्‍टूडेंट्स एजुकेशन लोन के भुगतान में डिफॉल्‍ट करते हैं. कम वेतन वाली नौकरियों में स्‍टूडेंट्स अपनी जरूरतों को पूरा करने लायक कमाई ही मुश्किल से कर पाते हैं. ऐसे में बैंकों को कर्ज का भुगतान करना उनके लिए किसी मुसीबत से कम नहीं होता. एजुकेशन लोन के एनपीए में पांचवां हिस्‍सा नर्सिंग कोर्स के लिए दिए गए कर्ज का है. इसके बाद दूसरे पायदान पर इंजीनियरिंग कोर्स (Engineering Courses) है.

    बैंकों के एनपीए में बढ़ रहा है एजुकेशन लोन का हिस्‍सा
    इंडस्‍ट्री डाटा के आकलन से पता चलता है कि मार्च 2018 तक बैंकों के कुल एनपीए में एजुकेशन सेक्‍टर की हिस्‍सेदारी 8.97 फीसदी है, जो मार्च 2016 तक 7.29 फीसदी था. मार्च, 2015 तक सरकारी बैंकों (PSBs) के एनपीए में एजुकेशन सेक्‍टर की हिस्‍सेदारी 5.70 फीसदी थी. इस समय देश में बेरोजगारी (Unemployment) 45 साल के उच्‍च स्‍तर पर है. वहीं, अर्थव्‍यवस्‍था हर तिमाही के साथ सुस्‍त हो रही है. ऐसे में एजुकेशन लोन की बैंकों के एनपीए में हिस्‍सेदारी बढ़ने की आशंका है. केयर रेटिंग एजेंसी के अर्थशास्‍त्री मदन सबनवीस ने कहा कि एनपीए बढ़ने का सबसे बड़ा कारण देश में रोजगार की खराब हालत है. फिलहाल महंगी फीस देकर प्रोफेशनल कोर्स करने वाले छात्रों के लिए बाजार में नौकरियां ही नहीं हैं. इससे डिफॉल्‍ट की आशंका बढ़ गई है. ऐसे में बैंक कर्ज देने में ज्‍यादा सावधानी बरत रहे हैं.

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    लगातार सातवीं तिमाही बढ़ा है बेराजेगारी का आंकड़ा
    सीएमआईई के महेश व्‍यास का कहना है कि सितंबर-दिसंबर 2019 तिमाही में बेराजगारी की दर 7.5 फीसदी पर पहुंच गई है. उनका कहना है कि मई-अगस्‍त 2017 के बाद ये लगातार सातवीं तिमाही है जब बेरोजगारी की दर में उछाल दर्ज की गई है. तब देश में बेराजगारी की दर 3.8 फीसदी थी. रोजगार के अवसरों की कमी के साथ ही अमेरिका जैसे विकसित देशों की ओर से बदले गए वीजा नियमों से भी मुश्किल बढ़ी है. वीजा नियमों में बदलाव के कारण नौकरी के लिए भारत से विदेश जाने वाले स्‍टूडेंट्स की संख्‍या भी घटी है. इस वजह से इंजीनियरिंग जैसे कोर्स में एडमिशन लेने वाले छात्रों की संख्‍या भी कुछ साल में घटी है. साल 2014-15 में भारतीय कॉलेज और यूनिवर्सिटीज में 42.5 लाख स्‍टूडेंट्स ने इंजीनियरिंग कोर्स के लिए एनरोल लिया. वहीं, 2018-19 में ये आंकड़ा घटकर 37.7 लाख रह गया.

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    किसानों की तरह स्‍टूडेंट्स के कर्ज भी करने चाहिए माफ
    एजुकेशन लोन में डिफॉल्‍ट की समस्‍या सिर्फ भारत में ही नहीं है. दुनिया भर के बैंक इस समस्‍या से जूझ रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि पर्याप्‍त रोजगार अवसरों की कमी के कारण अगर स्‍टूडेंट्स कर्ज भुगतान नहीं कर पाते हैं तो इस बोझ को कौन वहन करेगा. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार किसानों (Farmers) के कर्ज माफ कर सकती है तो खराब अर्थव्‍यवस्‍था के दौर में स्‍टूडेंट्स के लिए भी यही रवैया अपनाया जाना चाहिए. पिछले एक दशक में भारतीय बैंक 3.14 लाख करोड़ रुपये के कृषि कर्ज माफ कर चुके हैं. इसमें किसानों के लिए महाराष्‍ट्र की कर्ज योजना शामिल नहीं है. जब देश की अर्थव्‍यव्‍स्‍था सुस्‍ती या मंदी के दौर से गुजर रही हो और बाजार में नौकरियों की कमी हो तो सरकार को स्‍टूडेंट्स के कर्ज भी माफ करने पर विचार करना चाहिए.

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    Tags: Bad loan, Bank Loan, Bank NPA, Better education opportunities, Indian Banks Association, Loan default, RBI

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