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इतनी गर्मी में भी शहर से क्यों पैदल गांव जाने को मजबूर हैं प्रवासी मजदूर?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: May 19, 2020, 9:21 PM IST
इतनी गर्मी में भी शहर से क्यों पैदल गांव जाने को मजबूर हैं प्रवासी मजदूर?
यूपी में प्रवासी कामगारों के लौटने का सिलसिला जारी है.

प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी है कानून, लेकिन इसका पालन नहीं करवा पाती हैं सरकारें, फिर कैसे रुकेगा पलायन, कानून में इनके आवास और यात्रा भत्ते का भी है प्रावधान, क्या किसी को आज तक मिला?

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नई दिल्ली. कोरोना लॉकडाउन (corona lockdown) की वजह से प्रवासी श्रमिक सिर्फ बेरोजगार नहीं हुए हैं, बल्कि उनका सुख-चैन सब कुछ छिन गया है. अपने ही मुल्क में उन्हें अपने गांव जाने के लिए मिन्नतें मांगनी पड़ रही हैं. किसी भी हाइवे पर देखिए, मजदूरों के पांव अपने गांव की ओर बढ़ते जा रहे हैं. चिलचिलाती धूप में बेबस मासूम भी बेरहम व्यवस्था के शिकार हो रहे हैं. तो क्या सरकारी तंत्र कामगारों की इस लाचारी और बेबसी से अनजान है?

केंद्र और राज्य सरकारें लगातार दावा कर रही हैं कि श्रमिकों के लिए खाने-पीने का इंतजाम किया गया है. उनका किराया माफ करने को कहा गया है. लेकिन क्या यह सच है? हिन्द मजदूर सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एसडी त्यागी सरकार से सवाल करते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को घर बैठे राशन और खाना मिले, कमरे का किराया माफ हो जाए तो क्या वो 42 डिग्री सेल्सियस तापमान में 1000 किलोमीटर की यात्रा पर निकलेगा? सच्चाई तो ये है कि कानून में प्रवासी श्रमिकों (migrant workers) के लिए जो अधिकार हैं उसे भी सरकार नहीं दिला पा रही है.

क्या शहर से उठ गया विश्वास 



उनका आरोप है कि सरकारों ने कागजी दावे भर किए हैं. न तो किसी मजदूर के मकान मालिक ने किराया माफ किया न कोटेदार ने राशन दिया और न ही उन्हें अप्रैल में पैसा मिला. ऊपर से खाना मिलना कम या बंद हो गया है. सरकार का कोई लंगर नहीं चल रहा. इसलिए लोग अपने घर जाने को मजबूर हुए हैं. इन श्रमवीरों का सरकार और शहर के लोगों से विश्वास उठ गया इसलिए वे गांव जा रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि गांव का समाज उन्हें जिंदा रख लेगा. यहां पर वे शहरी और सरकारी दोनों क्रूरता का शिकार हो रहे हैं. उनका शहर से विश्वास टूट गया है.



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सरकारी दावों के बीच क्यों जारी है मजदूरों का पलायन


सिर्फ खाना देकर कैसे हो सकती है नुकसान की भरपाई

पीपुल्स राइट्स एंड सोशल एक्शन रिसर्च सेंटर (PRASAR) के संस्थापक एसए आजाद सरकार से सवाल करते हैं कि क्या खाना खिलाने भर से कोई ऐसा व्यक्ति शहर में रुक सकता है जिसके पास अपना आशियाना और पक्की नौकरी नहीं है. हर श्रमिक का लॉकडाउन में हर माह औसतन 15 हजार रुपये का नुकसान हुआ है. क्या उसकी भरपाई सिर्फ 20 रुपये पैकेट वाले खाने से हो सकती है? अगर हो सकती तो वो अपने घर पैदल ही क्यों निकल जाता.

विश्वास है कि लंबा चलेगा लॉकडाउन, इसलिए पलायन

मानवाधिकार कार्यकर्ता आजाद कहते हैं कि महामारी काल में जब सरकारों और समाज को देश का निर्माण करने वाले श्रमवीरों के साथ खड़े होने का वक्त था तब उन्होंने मुंह मोड़ लिया. राशन वाले ने उधार देना बंद कर दिया. मकान मालिक किराये के लिए दबाव बनाने लगे तो उनके पास क्या विकल्प बचता है. दूसरा अब लोगों को यह विश्वास हो चला है कि लॉकडाउन लंबा चलेगा. इसलिए पलायन तेज हुआ है. ज्यादातर सरकारों ने यह भी झूठ बोला है कि वे जरूरतमंदों को खाना खिला रहे हैं.

खाना मिलता तो नहीं होता पलायन

सुप्रीम कोर्ट (supreme court) के वकील पद्मश्री ब्रह्मदत्त कहते हैं कि सरकार का दावा ये है कि वो लोगों को राशन और खाना दे रही है. लेकिन सच्चाई सड़कों पर दिख रही है कि लोग शहर छोड़कर गांव जा रहे हैं. किसी को खाना मिलेगा तो वो क्यों पलायन करेगा, यह सोचने वाली बात है.

कितने हैं प्रवासी कामगार

बीती 23 मार्च को केंद्रीय श्रम एवं रोजगार (Labor and employment) मंत्री संतोष गंगवार ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि कुल श्रम शक्ति में अन्तरराज्यीय प्रवासी कामगारों की हिस्सेदारी 20 फीसदी होने का अनुमान है. 2016 में इसे 10 करोड़ होने का आकलन किया गया था.

प्रवासी श्रमिकों के हित के लिए है यह कानून

केंद्र सरकार ने एक से दूसरे स्थान पर जाने वाले प्रवासी श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमैन रेगुलेशन ऑफ एंप्लायमेंट एंड कंडीशन ऑफ सर्विस एक्ट-1979 बनाया हुआ है. लेकिन अधिकारी कभी इसे लागू नहीं करवाते. वरना श्रमिकों को इतना बड़ा पलायन नहीं होता. यहां तक कि प्रवासी श्रमिकों को भी पता नहीं होता कि उनके अधिकार के लिए कोई कानून बना हुआ है.

एक्ट में प्रवासी श्रमिकों के लिए प्रावधान

(1) सभी प्रमुख एंप्लायर और ठेकेदारों का रजिस्ट्रेशन

(2) श्रमिकों का पासबुक जारी करना

(3) न्यूनतम मजदूरी का भुगतान

(4) एक ही प्रकार के काम के लिए पुरुष और महिला श्रमिकों को समान मजदूरी का भुगतान

(5) आने-जाने के लिए यात्रा भत्ता (journey allowance) का भुगतान

(6) विस्थापन (displacement) भत्ते का भुगतान

(7) उपयुक्त आवास प्रदान करना

(8) चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करना

(9) सुरक्षात्मक कपड़े प्रदान करना

एडवोकेट पद्मश्री ब्रह्मदत्त कहते हैं कि कानून में प्रवासी श्रमिकों के लिए इतने सारे प्रावधान है लेकिन सरकारें इसे लागू नहीं करवातीं, इसलिए काम करने वालों को कोई फायदा नहीं मिलता. अगर कानून में दिए गए सारे अधिकार मिल गए होते तो कोई श्रमिक इतने बड़े पैमाने पर पलायन नहीं करते. क्या किसी सरकार ने प्रवासी श्रमिकों को उनके लिए आवास दिलवाया, उनकी यात्रा के लिए भत्ता दिलवाया? इसका जवाब आपको सिर्फ नहीं में मिलेगा.

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सरकार अव्यवस्थाओं की वजह से पैदल घर जाने को मजबूर हैं श्रमिक


भाजपा ने क्या कहा?

भाजपा (BJP) प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिए 80 करोड़ लोगों को तीन माह तक फ्री में पांच किलो राशन दिया है. खाना मुहैया करवाया जा रहा है. अब फैक्ट्रियां और दुकानें खुलने लगी हैं. इसलिए किसी को घर जाने की जरूरत नहीं है. हरियाणा में तो एक लाख से अधिक श्रमिकों ने दोबारा आने के लिए आवेदन दिया है.

इस महामारी से पूरी दुनिया पर बुरा असर पड़ा है. हमारे श्रमिक भी इससे अछूते नहीं हैं. लेकिन उन्हें वापस अपने गांव जाने की बजाए यदि कोई समस्या है तो यहीं पर प्रशासन को बताना चाहिए. उसका हर संभव समाधान होगा. अगर घर जाना चाहते हैं तो पैदल जाने की बजाए वे आवेदन करके अपना नंबर आने का इंतजार करें. उन्हें बस और ट्रेन से घर तक पहुंचाया जाएगा.

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First published: May 19, 2020, 5:02 PM IST
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