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'जीरो बजट खेती' के जरिए 5.78 लाख किसान कर रहे हैं कमाई! जानिए इसके बारे में सबकुछ

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 10:58 AM IST
'जीरो बजट खेती' के जरिए 5.78 लाख किसान कर रहे हैं कमाई! जानिए इसके बारे में सबकुछ
चार राज्यों ने कायम की मिसाल, बाकी इस मामले में हैं जीरो

आंध्र प्रदेश, जहां के 5.23 लाख किसान इस मिशन में जुड़ चुके हैं. जबकि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. बाकी राज्य इस मामले में जीरो हैं.

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  • Last Updated: December 11, 2019, 10:58 AM IST
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नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान रंग लाने लगा है. देश के 5.78 लाख किसानों (Farmers) ने उनके बताए रास्ते पर चलकर मिसाल कायम कर दी है. हम बात कर रहे हैं जीरो बजट खेती (Zero Budget Natural Farming) की, जिसके जरिए किसानों ने रासायनिक खादों पर निर्भरता बिल्कुल खत्म करके पर्यावरण और सेहत को अच्छा रखने की दिशा में काम शुरू किया है. इस मिशन में लीडर बनकर उभरा है आंध्र प्रदेश. जहां के 5.23 लाख किसान इस मिशन में जुड़ चुके हैं. जबकि कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. बाकी राज्य इस मामले में जीरो हैं.

ऐसी खेती को बढ़ावा देने के पीछे मोदी सरकार का मदसद यह है कि किसानों को किसी भी फसल को उगाने के लिए किसी तरह का कर्ज न लेना पड़े. इससे किसान कर्ज से मुक्त होगा और आत्मनिर्भर बनेगा. जीरो बजट खेती का उत्पाद महंगा बिकेगा. इससे उसकी आय बढ़ेगी.

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क्या होती है जीरो बजट खेती


किस राज्य में कितने क्षेत्र में प्राकृतिक खेती

जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग (ZBNF) के तहत आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक 2.03 लाख हेक्टेयर में किसान खेती कर रहे हैं. दूसरे नंबर पर है कर्नाटक जहां 19609 और तीसरे पर हिमाचल प्रदेश है जहां 1512 हेक्टेयर में ऐसी खेती शुरू हुई है. कृषि के जानकारों का कहना है कि आंध्र प्रदेश में इस खेती में किसान दिलचस्पी दिखा रहे हैं तो इसकी वजह भी है. वहां पर इसके प्रमोशन के लिए सरकार ने 280.56 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

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जीरो बजट खेती के लिए काम>> भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मोदीपुरम, पंतनगर, लुधियाना और कुरुक्षेत्र में बासमती/मोटे चावल और गेहूं में जीरो बजट प्राकृतिक खेती का मूल्यांकन करने के लिए एक अध्ययन शुरू किया है.
>> हिमाचल प्रदेश में मई, 2018 से ‘प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान’ योजना चल रही है.
>> कर्नाटक में बागवानी विश्वविद्यालयों के माध्यम से राज्य के 10 क्षेत्रों में प्रत्येक में 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रायोगिक आधार पर जेडबीएनएफ पर काम शुरू किया गया है.
>> केरल में जेडबीएनएफ के प्रति किसानों में रुचि पैदा करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
जीरो बजट खेती को लेकर कृषि विशेषज्ञ बंटे हुए हैं. मशहूर कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा कहते हैं कि खेती का यह मिशन सही दिशा में जा रहा है. दो साल में ही 5.78 लाख किसानों का इससे जुड़ना बड़ी बात है. इस खेती से किसान खुशहाल होगा और उसका उत्पाद खाने वालों की सेहत ठीक रहेगी. जबकि राष्ट्रीय किसान संघ के फाउंडर मेंबर बीके आनंद इस खेती को व्यवहारिक नहीं मानते. उनका कहना है कि इस खेती का नाम लेना बहुत अच्छा लगता है लेकिन इससे उत्पादन कम हो जाएगा.

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जीरो बजट खेती में बाजार पर निर्भरता खत्म हाे जाती है


क्या होती है जीरो बजट खेती?
जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर निर्भर होती है. इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती. इसमें रासायनिक खाद के स्थान किसान खुद गोबर से तैयार की हुई खाद बनाते हैं. ऐसी खाद गाय-भैंस के गोबर, गौमूत्र, चने के बेसन, गुड़, मिटटी तथा पानी से बनाई जा सकती है. इसमें नीम और गौमूत्र का कीटनाशक इस्तेमाल किया जाता है.

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First published: December 11, 2019, 6:54 AM IST
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