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लगातार घाटे में चल रही कंपनियां निगल रही हैं बैंक लोन का एक बड़ा हिस्‍सा

लगातार घाटे में चल रही कंपनियां निगल रही हैं बैंक लोन का एक बड़ा हिस्‍सा

सभी कंपनियों को दिए कुल बैंक लोन का 10% फीसदी हिस्‍सा लगातार घाटे में चल रही कंपनियां उपयोग कर रही हैं.

सभी कंपनियों को दिए कुल बैंक लोन का 10% फीसदी हिस्‍सा लगातार घाटे में चल रही कंपनियां उपयोग कर रही हैं.

सभी कंपनियों को दिए कुल बैंक लोन का 10% फीसदी हिस्‍सा लगातार घाटे में चल रही कंपनियां उपयोग कर रही हैं. ऐसी कंपनियों को जॉम्‍बी कं‍पनियां (Zombie Firms) कहते हैं. चिंताजनक बात यह है कि जॉम्‍बी कंपनियां इस लोन का उपयोग नए निवेश के लिए नहीं बल्कि खुद का अस्तित्‍व बचाने के लिए कर रही हैं.

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नई दिल्‍ली. लगातार घाटे में चल रही कंपनियां (Zombie Firms) देश के बैंकों द्वारा दिए जाने वाले लोन का दस फीसदी हिस्‍सा निगल रही हैं. यही नहीं गैर-बैंकिंग कॉरपोरेट सेक्‍टर के कुल कर्ज का 10 प्रतिशत ऋण भी जॉम्‍बी कंपनियां ले रही हैं. चिंताजनक बात यह है कि इस लोन से ये कंपनियां कोई नया निवेश (New Investment) नहीं कर रही बल्कि खुद को बनाए रखने में इस लोन का प्रयोग कर रही हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को जारी अपने मासिक बुलेटिन में यह जानकारी दी है. RBI हर महीने अर्थव्यवस्था और वित्तीय क्षेत्र से जुड़े ट्रेंड्स को लेकर एक बुलेटिन प्रकाशित करता है. आरबीआई के बुलेटिन में कहा गया है कि लगातार घाटे में चल रही कंपनियों पर भारी कर्ज होता है. ये संपत्तियों पर लगातार कई सालों से निगेटिव रिटर्न हासिल कर रही होती हैं.

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बैंकों के लोन का नहीं होता उत्‍पादक प्रयोग

भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने बुलेटिन में कहा है कि जॉम्‍बी कंपनियां के फंड की औसत लागत मॉनिटरी पॉलिसी के झटकों के साथ काफी बढ़ जाती है. बैंकों से मिले उधार से ऐसी कंपनियां अक्सर निवेश की नई गतिविधिया पैदा नहीं करती जैसा कि गैर-जॉम्बी कंपनियां करती हैं. ये लोन का प्रयोग खुद को सर्वाइव करने के लिए करती हैं.

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बैड लोन बड़ा सिरदर्द

RBI  बुलेटिन की यह टिप्पणियां भारतीय बैंकिंग सिस्टम  (Indian banking system) के लिए काफी अहम है. ऐसा इसलिए है क्‍योंकि देश के सार्वजनिक और निजी बैंक इस समय इस समय बैड लोन  (Bad Bank  loan) की भारी समस्या का सामना कर रहे हैं. भारतीय बैंकों को आरबीआई ने  2015 में अपनी बैलेंस शीट क्‍लीन करने के लिए मजबूर किया था. तब आरबीआई ने एसेट्स समीक्षा शुरू की थी. रिजर्व बैंक के इस कदम के बाद ही बैंकों ने बैड लोन कम करने के लिए कुछ पहल की थी. कई मामले इनसॉल्वेंसी कोर्ट्स में ले जाकर सुलटाए गए. इसी तरह एसेट रिस्ट्रक्चर कंपनियों को कुछ डिस्काउंट पर बेचकर बैंकों ने अपने बैड लोन बुक के एक बड़े हिस्से को कम किया. लेकिन ऐसा नहीं है कि ये समस्‍या जड़ से समाप्‍त हो गई है. अभी भी बैड लोन कई बैंकों के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.

Tags: Banking, Banking Sector, RBI

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