सक्सेस स्टोरी: दुकानों के खाते देखे, पार्ट टाइम जॉब की, 22 की उम्र में पहले प्रयास में बना CA

 14 लाख रुपए के पैकेज की नौकरी छोड़ दी और अपनी सीए फर्म शुरू की. उनकी कंपनी आज 3 राज्यों में काम कर रही है.

14 लाख रुपए के पैकेज की नौकरी छोड़ दी और अपनी सीए फर्म शुरू की. उनकी कंपनी आज 3 राज्यों में काम कर रही है.

श्रीराम अपने काम के अलावा अब समाजसेवा और स्टूडेंट्स की मदद भी करते है. कोविड (Covid-19) काल में जहाँ उन्होंने सीए प्रोफेशनल्स के लिए तमाम कोविड अवेयरनेस प्रोग्राम चलाए, वहीं अपने गांव में 10 बेड का कोविड सेन्टर भी बनवाया.

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नई दिल्ली. 'मंज़िलें मुश्किल नहीं होती, जब निश्चय मजबूत होता है, पहाड़ भी हो जाते हैं पार, जब इरादा अटल होता है.' ज़िंदगी के इसी फ़लसफ़े पर चलते हुए कभी दुकानदारों के खाते देखने वाले श्रीराम अटल 22 वर्ष की आयु में सीए (CA) बन गए. एक समय वो भी था जब हताशा और निराशा के चलते श्रीराम सीए की पढ़ाई छोड़कर अपने गांव लौटकर पिता के काम में हाथ बंटाने के उद्देश्य से गांव लौट गए थे, लेकिन सीए इंटर के रिजल्ट ने उनकी दिशा पूरी तरह बदल दी. वो दुगने जोश के साथ सीए की पढ़ाई में जुट गए और पहले प्रयास में ही सीए पास कर लिया। चलिए जानते हैं सीए श्रीराम अटल की यात्रा:

राजस्थान के छोटे गांव से हैं, परिवार में सबसे छोटे

श्रीराम राजस्थान (Rajasthan) के जिला नागौर के एक छोटे गांव निम्बी जोधा से हैं. उनके पिता श्री गौरीशंकर अटल पहले पत्रकारिता में थे, फिर डीड राइटर बन गए. माता-पिता के अलावा घर में उनकी चार बहनें हैं. सबसे छोटे श्रीराम हैं. डीड राइटर के काम से इतने बड़े परिवार का पालन- पोषण बड़ी मुश्किलों से हो पाता था. सीमित संसाधनों के बावजूद पिता ने कभी भी बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी. भले ही उन्हें अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ा. बचपन मे जब श्रीराम दूसरे बच्चों को साइकिल पर देखते, तो उन्हें भी इसकी इच्छा होती, लेकिन घर की तंगहाली को देखते हुए कभी कुछ नहीं कहते थे.

पढ़ाई में होशियार, पिता से मिली प्रेरणा
श्रीराम बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे. इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कक्षा 9 से लेकर सीए तक, वे तमाम परीक्षाओं में टॉपर (Topper) रहे. 12वीं कक्षा में राजस्थान में उनकी 49वीं रैंक रही. 2001 से 2006 तक पिता के साथ डीड राइटिंग का काम भी किया. पढ़ाई में उनके बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए उनके पिता गौरीशंकर अटल ने उन्हें सीए बनने के लिए प्रेरित (Inspire) किया.

सीए शुरू किया, हताशा में गांव लौटे

पिता के कहने पर श्रीराम ने सीए इंटर की पढ़ाई शुरू की. इसके लिए वे कोलकाता पहुंचे. लेकिन उनके पास महंगी कोचिंग (Coaching) और होस्टल की फीस के लिए पैसे नहीं थे. तब उन्होंने वहाँ के एक किफायती छात्रावास हलवासिया छात्र निवास में इंटरव्यू दिया और उन्हें वहां दाखिला मिल गया. लेकिन उन्हें आसपास के लोगों से हताशा होने लगी. लोग कहते थे सीए सबके बस की बात नहीं, इसमें बहुत पैसे लगते है, लोग सालों तक लगे रहते हैं और थक-हारकर पढ़ाई छोड़ देते हैं. श्रीराम ने मेहनत करके जैसे-तैसे सीए की परीक्षा दी, लेकिन हताश होकर पिता के काम में हाथ बंटाने के उद्देश्य से गांव वापस लौट आए.



सीए इंटर के रिजल्ट ने बदली मनोदशा

श्रीराम मई में गांव वापस लौटकर पिता का हाथ बंटाने लगे. तभी दो महीने बाद सीए इंटर परीक्षा का परिणाम आया। उन्होंने पहले प्रयास में ही अच्छे अंकों से परीक्षा पास कर ली थी, जबकि उनके साथ के तमाम छात्र फेल हो गए थे। परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. सभी ने उनकी हौसला अफजाई की. रिजल्ट के बाद श्रीराम ने ठान लिया कि अब तो सीए करना ही है. इसके बाद सीए फाइनल की तैयारी के लिए वर्ष 2007 में वे अपने चचेरे भाई के पास दिल्ली आ गए.

रेफरेंस के बिना आर्टिकलशिप में हुई दिक्कतें

श्रीराम सीए फाइनल की तैयारी के लिए दिल्ली तो आ गए, लेकिन यहां उन्हें कोई जानता नहीं था, कोई रेफरेंस नहीं था. इसके चलते उन्हें सीए आर्टिकलशिप (Articleship) के लिए बड़ी दिक्कतें आईं. रेफरेंस के बिना कोई भी उन्हें आर्टिकलशिप पर रखने के लिए तैयार नहीं था. आखिरकार एक जगह 3 हजार रुपए प्रतिमाह पर उनका चयन हो गया. उस समय उनके लिए 3 हजार रुपए 30 हजार रुपए से कम नहीं थे.

सुबह क्लास, दिन में आर्टिकलशिप, शाम को पार्ट टाइम जॉब

आर्टिकलशिप मिलने के बाद श्रीराम की दिनचर्या बिल्कुल व्यस्त हो गई. वो सुबह 5 बजे उठते. 6 से 10 बजे तक कोचिंग क्लास होती. वहीं से सीधे आर्टिकलशिप के लिए जाते. शाम को 6 बजे वहां से निकलकर दो दुकानों पर खाते देखने की पार्ट टाइम जॉब करते. इसके बाद घर आकर खाना खाकर रात को फिर 3 घंटे पढ़ते.

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सीए बने, जॉब की, फिर अपनी फर्म बनाई

श्रीराम 2009 में सीए बने. 2010 में कैंपस प्लेसमेंट (campus placement) के तहत उन्हें भूषण स्टील (वर्तमान में टाटा स्टील) में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिली. लेकिन कुछ वर्ष बाद अपना कुछ करने की चाह में 14 लाख रुपए के पैकेज की नौकरी छोड़ दी और अपनी सीए फर्म शुरू की. उनकी कंपनी आज 3 राज्यों में काम कर रही है. इसके अलावा वे ग्लोबल चैम्बर ऑफ प्रोफेशनल (Global Chamber of Professionals) के वाईस प्रेसिडेंट भी हैं.

स्टूडेंट्स की हेल्प भी करते हैं

श्रीराम अपने काम के अलावा अब समाजसेवा और स्टूडेंट्स की मदद भी करते है. कोविड (Covid-19) काल में जहाँ उन्होंने सीए प्रोफेशनल्स के लिए तमाम कोविड अवेयरनेस प्रोग्राम चलाए, वहीं अपने गांव में 10 बेड का कोविड सेन्टर भी बनवाया और वहां ऑक्सीजन consontrater भी लगाएं ग्लोबल चैम्बर ऑफ प्रोफेशनल्स के तहत उन्होंने एक स्टूडेंट विंग भी बनाई है जिसके तहत वे स्टूडेंट्स की कोचिंग, आर्टिकलशिप और जॉब संबंधी समस्याओं का समाधान करते हैं.

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