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किताबों की कमी में गुजरा था कभी इनका बचपन, अब बस में लाइब्रेरी बनाकर कराती हैं बच्चों की पढ़ाई

News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 3:19 PM IST
किताबों की कमी में गुजरा था कभी इनका बचपन, अब बस में लाइब्रेरी बनाकर कराती हैं बच्चों की पढ़ाई
अफगानिस्‍तान से ताल्‍लुक रखने वाली फ्रेश्‍ता ने बस लाइब्रेरी की शुरुआत की है. ये बसें रोजाना स्‍कूल और बाजारों में घूमकर बच्‍चों को किताबें उपलब्‍ध करवाती हैं.

अफगानिस्‍तान से ताल्‍लुक रखने वाली फ्रेश्‍ता ने 'बस लाइब्रेरी' की शुरुआत की है. ये बसें रोजाना स्‍कूल और बाजारों में घूमकर बच्‍चों को किताबें उपलब्‍ध करवाती हैं.

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  • Last Updated: November 25, 2019, 3:19 PM IST
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कई बार एक छोटी सी कोशिश किसी इंसान का जीवन संवार सकती है. इस बात को सच साबित कर रही हैं ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वालीं फ्रेश्‍ता करीम. फ्रेश्‍ता ऐसे बच्‍चों को पढ़ाने का काम कर रही हैं, जो किसी वजह से पढ़ाई से दूर हैं. अफगानिस्‍तान से ताल्‍लुक रखने वाली फ्रेश्‍ता ने 'बस लाइब्रेरी' की शुरुआत की है. मुसाफिरों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने वाली बस को फ्रेश्‍ता ने लाइब्रेरी बनाकर उसमें तमाम तरह की किताबें रखी हैं, जिसमें हर दिन बच्‍चे आकर पढ़ाई करते हैं. कैसे कर रही हैं वो ये सब कुछ आइए जानते हैं.

दरअसल फ्रेश्‍ता जब कॉलेज में थीं तो उन्‍हें किताबों की कमी महसूस हुई. इसलिए पढ़ाई पूरी करते हुए वह चार्माग्‍ज नामक संस्‍था बनाने के लिए प्रेरित हुईं. इस संस्‍था के माध्‍यम से उन्‍होंने बस लाइब्रेरी बनाने का फैसला किया. ये दो बसें रोजाना काबुल के बाजारों और स्‍कूलों में घूमती हैं. इन जगहों पर 600 बच्‍चे लाइब्रेरी में आकर पढ़ते हैं. फ्रेश्‍ता खुद भी बच्‍चों को पढ़ाती हैं.

अफगानिस्‍तान में सबसे कम है साक्षरता दर
फ्रेश्ता कहती हैं कि यूनेस्काे के आंकड़े बताते हैं कि अफगानिस्तान में साक्षरता दर दुनिया में सबसे कम है. यहां हर 10 में से केवल 3 वयस्क पढ़ पाने में सक्षम हैं. इसकी वजह काबुल के अधिकतर निजी स्कूलाें में लाइब्रेरी नहीं हैं. जाे हैं भी उनमें बच्चाें के लिए किताबें नहीं हैं.

बस है सबसे सस्‍ता तरीका
फ्रेश्‍ता बताती हैं कि बच्चाें तक किताबाें पहुंचाने का बसें कम खर्चीला और बेहतर तरीका है. संस्था ने एक सरकारी कंपनी से इन्हें किराए पर लिया. संगठन काे स्थानीय काराेबारियाें और समुदायाें से दान मिलता है. उसी से किताबें खरीदी जाती हैं.

तीसरी बस माेबाइल सिनेमा
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फ्रेश्‍ता कहती हैं कि संस्था तीसरी बस भी तैयार कर रही है, जाे माेबाइल सिनेमा की तरह काम करेगी. बच्चे लाइब्रेरी में पढ़ते हैं. एक-दूसरे से बात करते हैं और खेलते हैं. धीरे-धीरे उनमें पढ़ने की आदत बन रही है.

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First published: November 25, 2019, 2:56 PM IST
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