IIT की तरह लॉ यूनिवर्सिटी में भी महिलाओं को मिल सकता है 'अतिरिक्त कोटा'

कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की राज्यसभा में पेश रिपोर्ट में महिलाओं की न्यायपालिका में कम भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुये इसे बढ़ाने के सुझाव दिये गये हैं.

भाषा
Updated: January 7, 2019, 11:11 AM IST
IIT की तरह लॉ यूनिवर्सिटी में भी महिलाओं को मिल सकता है 'अतिरिक्त कोटा'
सांकेतिक तस्वीर
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Updated: January 7, 2019, 11:11 AM IST
संसद की विभाग संबंधी स्थायी समिति ने न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की भागीदारी दस प्रतिशत के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की है. समिति ने न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व बहुत कम होने का हवाला देते हुए सरकार को ये सुझाव दिया. कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की राज्यसभा में पेश रिपोर्ट में महिलाओं की न्यायपालिका में कम भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुये इसे बढ़ाने के सुझाव दिये गये हैं.

समिति ने इसके लिए अधीनस्थ न्यायापालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की तरह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज और विधि स्नातक के पांच वर्षीय पाठ्यक्रमों में महिला प्रतिभागियों के लिये ‘अतिरिक्त कोटा’ प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया है. समिति ने न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों की संख्या 50 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की है.

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भाजपा सदस्य भूपेन्द्र यादव की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने न्यायपालिका में ‘महिलाओं को आरक्षण’ विषय पर अपने प्रतिवेदन में कहा ‘‘आजादी के बाद से सुप्रीम कोर्ट में केवल छह महिला न्यायाधीश नियुक्त की गयीं. इनमें पहली नियुक्ति 1989 में हुई थी. समिति चाहती है कि उच्च न्यायपालिका में समाज की संरचना और विविधता परिलक्षित होनी चाहिये.’’

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समिति ने हालांकि कुछ राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों में महिलाओं के लिये आरक्षण लागू करने के बाद भी इसे अपर्याप्त बताते बताते हुये उच्च और अधीनस्थ न्यायालयों में अधिक महिला न्यायाधीशों को शामिल करने के उपाय करने की मंत्रालय को सिफारिश की है. समिति ने कहा कि मंत्रालय को राज्य सरकारों से विधि विश्वविद्यालयों और अधीनस्थ न्यायपालिका की भर्ती में महिला आरक्षण लागू करने को कहना चाहिये.

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रिपोर्ट के अनुसार, अधीनस्थ न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों के लिये सर्वाधिक आरक्षण (35 प्रतिशत) बिहार में है. जबकि आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना में यह 33.33 प्रतिशत, असम, राजस्थान, उत्तराखंड, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में 30 प्रतिशत एवं उत्तर प्रदेश में 20 प्रतिशत अधीनस्थ न्यायाधीशों के पद महिलाओं के लिये आरक्षित हैं.

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मंत्रालय द्वारा समिति के समक्ष पेश आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल 23 मार्च तक उच्च न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों की संख्या 73 (10.89 प्रतिशत) थी. न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये किये गये उपायों के बारे में मंत्रालय ने समिति को बताया कि संविधान के अनुच्छेद 124 और अनुच्छेद 217 के तहत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है. इसमें किसी भी जाति या वर्ग के व्यक्ति के लिये आरक्षण का प्रावधान नहीं है.

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मंत्रालय ने समिति को बताया ‘‘सरकार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध कर रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये प्रस्ताव भेजते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं के उपयुक्त उम्मीदवारों पर उचित विचार किया जाये.’’ मंत्रालय ने हालांकि आरक्षण के बारे में समिति को स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 संशोधन का कोई प्रस्ताव नहीं है.

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