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मूक-बधिरों ने की साइन लैंग्वेज को राइट टू लैंग्वेज बनाने की मांग

News18Hindi
Updated: January 25, 2020, 3:02 PM IST
मूक-बधिरों ने की साइन लैंग्वेज को राइट टू लैंग्वेज बनाने की मांग
मूक बधिरों का कहना है कि साइन लैंग्वेज को राइट टू लैंग्वेज का अधिकार दिया जाए.

मूक-बधिर सांकेतिक भाषा का संरक्षण चाहते हैं ताकि इनका यह माध्यम इनकी आवाज बना रहे. उनका कहना है कि 23वीं भाषा हमारी सांकेतिक भाषा होनी चाहिए.

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नेशनल एसोसिएशन ऑफ डेफ के निदेशक अनुज जैन का कहना है कि हम कैंपेन के द्वारा देश की मूक-बधिर आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इनके अभिव्यक्ति का सहज साधन है सांकेतिक भाषा है, जिसे साइन लैंग्वेज कहते हैं. इसके जरिये ये अपनी बात पूरे अधिकार से रखते हैं. ये लोग सांकेतिक भाषा का संरक्षण चाहते हैं ताकि इनका यह माध्यम इनकी आवाज बना रहे.

इसलिए देश के मूक बधिरों का कहना है कि साइन लैंग्वेज को राइट टू लैंग्वेज का अधिकार दिया जाए. बता दें कि अभी तक देश के संविधान में फिलहाल 22 भाषाएं अधिकृत भाषा के रूप में सूचीबद्ध हैं. मूकबधिर लोगों को कहना है कि 23वीं भाषा हमारी होनी चाहिए. इसे भी भाषा का अधिकार मिलना चाहिए.

सिग्नेचर कैंपेन से जागे लोग
साइन लैंग्वेज के शिक्षक अनुज जैन ने बताया कि याचिका पर निर्णय आना अभी बाकी है. इसके अलावा सिग्नेचर कैंपेन भी शुरू किया है, जिस पर अब तक साल भर में तकरीबन 50 हजार लोग साइन कर सांकेतिक भाषा के अधिकार की जरूरत जता चुके हैं.



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मूक-बधिर सांकेतिक भाषा का संरक्षण चाहते हैं ताकि इनका यह माध्यम इनकी आवाज बना रहे.


साइन लैंग्वेज के शिक्षक अनुज जैन का कहना है कि मूक-बधिरों के लिए जितने भी स्कूल हैं, उनमें सांकेतिक भाषा के कुशल शिक्षकों का टोटा रहता है. वहां बच्चों को सांकेतिक भाषा में बात करना सिखाने के बजाए उन्हें दूसरों की बात को सुनने और समझने पर ज्यादा जोर दिया जाता है.

2016 में पारित हुआ दिव्यांगता अधिकार विधेयक
वर्ष 2016 में दिव्यांगता अधिकार विधेयक-2016 को पारित किया गया. उसके बाद मैंने डेफ एसोसिएशन के माध्यम से मूक- बधिर स्कूलों में शिक्षकों के स्तर पर भी बदलाव के लिए मांग रखी है, जिसमें वह सबकुछ सांकेतिक हो. हर मूक-बधिर को सांकेतिक भाषा नहीं आती. इसीलिए हमारा सबसे पहला लक्ष्य यही है कि स्कूल भी इस भाषा से सुशिक्षित हों.

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First published: January 25, 2020, 3:00 PM IST
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