Hindi Diwas 2020: रोमन लिपि में हिंदी लिखने का युवाओं में बढ़ रहा चलन, मानसिकता में करना होगा बदलाव

Hindi Diwas 2020: रोमन लिपि में हिंदी लिखने का युवाओं में बढ़ रहा चलन, मानसिकता में करना होगा बदलाव
रोमन हिंदी का चलन काफी बढ़ रहा है.

खासकर युवाओं में इसका चलन काफी बढ़ रहा है. कॉलेज में पढ़ने वाले या कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने वाले युवाओं में इसकी प्रवृत्ति और ज्यादा देखी जाती है, जो कि आने वाले समय में देवनागरी लिपि के लिए खतरनाक संकेत है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 13, 2020, 7:17 PM IST
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नई दिल्ली. मोबाइल और सोशल मीडिया (Social Media) पर रोमन हिंदी का प्रचलन काफी बढ़ता जा रहा है. रोमन हिंदी का मतलब है कि मैसेज तो हिंदी में लिखे जा रहे हैं लेकिन उसके लिए जिस लिपि का प्रयोग किया जा रही है वह देवनागरी न होकर रोमन लिपि है. रोमन लिपि का प्रयोग अंग्रेजी भाषा के लिए किया जाता है.

युवाओं में ज्यादा बढ़ रहा चलन
देखा जाए तो खासकर युवाओं में इसका चलन काफी बढ़ रहा है. कॉलेज में पढ़ने वाले या कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने वाले युवाओं में इसकी प्रवृत्ति और ज्यादा देखी जाती है, जो कि आने वाले समय के हिसाब से देवनागरी लिपि के लिए खतरनाक संकेत है. एक तो रोज़गार की स्थितियां भी ऐसी पैदा हो गई हैं कि लोगों में अंग्रेजी को लेकर झुकाव बढ़ता जा रहा है क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि अंग्रेजी पढ़ने के बाद रोजगार के अवसर उनके लिए बढ़ जाएंगे.

पक्ष में भी दिए जाते हैं तर्क
हालांकि, कुछ लोग इसके पक्ष में भी तर्क देते हैं. उनका कहना है कि इससे हिंदी और ज्यादा आसान हो जाएगी तथा और ज्यादा लोगों तक इसकी पहुंच भी बन जाएगी. जैसे अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति से बात करते हैं जिसे हिंदी समझ तो आती है लेकिन पढ़नी नहीं आती तो उससे रोमन लिपि के सहारे बात की जा सकती है. कुछ भाषा वैज्ञानिकों का भी कहना है कि अगर यही स्थिति रही तो इस बदलाव से बचना काफी मुश्किल हो जाएगा, यानी कि आज नहीं तो कल इसमें बदलाव आएगा ही.



रोजगार की भाषा बनाना होगा
साथ ही हिंदी के विकास के लिए इसे रोजगार की भाषा बनाना भी जरूरी होगा. क्योंकि कोई भी भाषा रोजगार के जुड़ जाती है तो उसका विकास काफी तेजी से होने लगता है. इसलिए हिंदी को साहित्य की किताबों से निकालकर ज्ञान-विज्ञान और रोज़गार से भी जोड़ना होगा. साथ ही हम आप अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव कर लें और हिंदी के प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करने लगें तो ऐसा किया जा सकता है. हां, एक बात सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि 'मुझे हिंदी नहीं आती है' कहने में गर्व करने की मानसिकता से भी बाहर आना होगा.

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समय रहते होना होगा जागरुक
लेकिन खास बात है कि किसी भी भाषा की खूबसूरती उसके शब्दों के साथ साथ उसकी लिपि में भी निहित होती है. इसके उलट अगर कहा जाए कि अंग्रेजी को देवनागरी में लिखा जाए तो कैसा लगेगा. या किसी भी अन्य भाषा को उसकी अपनी लिपि में न लिखकर दूसरी भाषा की लिपि में लिखा जाए तो कैसा रहेगा. हिंदी तो पहले से ही काफी समावेशी रही है. इसमें तमाम दूसरी भाषाओं के शब्द मिलते हैं. यहां तक कि बोलचाल को छोड़ दीजिए और लेखन में भी तमाम तत्सम शब्दों के बजाय देशज और अंग्रेजी, फारसी, उर्दू व अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया गया है. लेकिन समावेशी होना ठीक है पर बदलाव इतना हो जाए कि किसी भाषा का मूल स्वरूप ही बदल जाए तो इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है. इसलिए कहीं न कहीं समय रहते जागरुक होना जरूरी ताकि इस चलन को रोका जा सके.
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