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IAS Success Story: जितनी बार फेल हुए, बोले-अगली बार निकाल लूंगा, आखिर चौथे प्रयास में पास की UPSC की परीक्षा

देव की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा राजस्थान के गांव में हुई.

देव की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा राजस्थान के गांव में हुई.

अच्छा स्टडी मैटेरियल इंग्लिश में होने के कारण इंग्लिश को भी अच्छे से सीखना हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी के सामने एक चुनौती की तरह होता है. लेकिन इस उम्मीदवार ने अंग्रेजी भी सीखी.

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    नई दिल्ली. IAS Success Story: सिविल सर्विस का सपना भारत की युवा जनसंख्या के एक बड़े तबके में होता है, वैसा ही कुछ सपना राजस्थान के पश्चिमी रेगिस्तान के पिछड़े जिले बाड़मेर के एक गांव के लड़के का भी था. पर हिंदी मीडियम से पढ़ाई कर अफसर बन पाउंगा या नहीं इस बात को लेकर डर उसे था. उसने गांव से प्रारंभिक स्कूली शिक्षा ली.

    मन बना लिया कि अफसर बनना है, लेकिन रास्ते और मंजिल का कोई पता नहीं था. ऐसे में उसे बहुत सारी परेशानियां आईं. अच्छा स्टडी मैटेरियल इंग्लिश में होने के कारण इंग्लिश को भी अच्छे से सीखना हिंदी माध्यम के अभ्यर्थी के सामने एक चुनौती की तरह होता है, इस लड़के ने उसको भी पार किया. और एक दिन अफसर बनकर ही दम लिया. आईएएस सक्सेज स्टोरी (IAS Success Story) में आज बात कर रहे हैं देव चौधरी की...

    पिता जी टीचर थे
    देव के पिताजी अध्यापक थे और बेहतर शिक्षा के लिए गांव से शहर आ गए और आगे की स्कूली शिक्षा शहर में ही हुई 11वीं से आगे फिर से सरकारी स्कूल और फिर बाड़मेर कॉलेज से ही बी.एस-सी. किया. यूँ तो सिविल सर्विस का सपना उनका बचपन से ही था, लेकिन उसके लिए तैयारी स्नातक पूर्ण होने के बाद ही प्रारंभ हुई. देव ने वर्ष 2012 में पहली बार यूपीएससी का एग्जाम दिया और प्रीलिम्स पास कर लिया, लेकिन मेंस नहीं निकाल पाये.

    चौथे प्रयास में मिली सफलता
    अगली बार अपनी गलतियों को सुधारा और 2013 में पुनः प्रयास किया. उस समय प्रीलिम्स, मेंस दोनों पास हो गए, लेकिन अंतिम रूप से चयन नहीं हुआ. वहीं 2014 में अंतिम चयन भी हो गया, लेकिन सर्विस में आई.ए.एस. का जो सपना था, वह पूरा नहीं हुआ. 2015 में चौथे प्रयास में आई.ए.एस. बनने का सपना साकार हुआ. देव फ़िलहाल गुजरात कैडर में 2016 बैच के IAS अधिकारी हैं.

    निराश हुए लेकिन हार नहीं मानी
    देव को शुरुआती असफलताओं ने निराश भी किया, लेकिन मन में कहीं-न-कहीं एक आशा हमेशा रही कि इस बार नहीं तो अगली बार. लेकिन लक्ष्य से पहले हार नहीं माननी है. वो बताते हैं कि, जब और लोग चयनित हो सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? यद्यपि मुझे अन्य नौकरी जैसे विचार नहीं आए. पर यू.पी.एस.सी. की अनिश्चितताओं को देखते हुए अन्य नौकरी रखने का विचार भी खराब नहीं होता है.

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