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IAS Preparation Tips: अफवाहों पर ध्‍यान द‍िये ब‍िना करें IAS परीक्षा की तैयारी

आईएएस परीक्षा की तैयारी में आपको धैर्य रखने के साथ-साथ इस बात का भी ध्‍यान रखना होगा क‍ि क‍िसी घटना की सच्‍चाई जाने बगैर उसका न‍िष्‍कर्ष ना न‍िकालें.

आईएएस परीक्षा की तैयारी में आपको धैर्य रखने के साथ-साथ इस बात का भी ध्‍यान रखना होगा क‍ि क‍िसी घटना की सच्‍चाई जाने बगैर उसका न‍िष्‍कर्ष ना न‍िकालें.

प्रारंभ‍िक परीक्षा की तैयारी पर अगर क‍िसी खबर या घटना का असर हो रहा है तो ऐसा मत होने दीज‍िये. अपना पूरा ध्‍यान स‍िर्फ परीक्षा की तैयारी में लगाएं.

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हमारे आसपास जो घटनायें घटती हैं. उन घटनाओं का हम सब पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है और उन घटनाओं का तो प्रभाव पड़ता ही पड़ता है, जिनसे हम प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं. ऐसी घटनाओं के तात्कालिक प्रभाव तो कभी-कभी इतने गहरे होते हैं कि वे हमारे निर्णयों को उलट तक देते हैं. मेरा आशय यहां रानी नागर के त्यागपत्र से है. रानी नागर साल 2014 बैच की हरियाणा कैडर की आईएएस अधिकारी थीं. उनको नौकरी करते हुए अभी मात्र पांच साल ही हुए थे. वे रहने वाली दिल्ली से सटे उत्तरप्रदेश के जिले गाजियाबाद की थीं. यानी कि एक प्रकार से उनका कैडर भी उनके घर के काफी करीब था। लेकिन उन्होंने सर्विस से इस्तिफा दे दिया.

क्यों दिया, हम उस पर नहीं जाते. हमारे लिए यहां यही तथ्य महत्वपूर्ण है कि एक युवा अधिकारी ने देश की सर्वोच्च सेवा को छोड़ दिया. तो ऐसी स्थिति में उन युवा प्रतियोगियों को क्या करना चाहिए, जो इसी सेवा में जाने के लिए रात-दिन एक किये हुए हैं. और इसकी प्रारम्भिक परीक्षा भी कुछ दिनों बाद ही होने वाली है.

ऐसी घटनायें पढ़ने के बाद मन थोड़ा विचलित हो उठता है. विचार आते हैं कि जब सेवा में रहने वाले अधिकारी ही इसे छोड़ रहे हैं, तो फिर हमें उसमें जाना ही क्यों चाहिए. इस सेवा के प्रति मन में संदेह पैदा होता है और संदेह पैदा होते ही हमारा संकल्प कमजोर पड़ने लगता है. यह संकल्प कमजोर न पड़ने पाये. इसका एक ही उपाय है कि इस घटना की सच्चाई से रू-ब-रू हुआ जाये.

मित्रो, आईएएस से त्यागपत्र देने का यह कोई नया या अपवाद वाला मामला नहीं है. सुभाषचन्द्र बोस ने 1921 में इससे त्यागपत्र दिया था. तब से लेकर अब तक इसकी निरन्तरता बनी हुई है. इसका एक अन्य पक्ष भी है, जिसे हम आईएएस अधिकारियों पर पड़ने वाले राजनीतिक दबावों, बार-बार होने वाले ट्रांसफर तथा राजनेताओं का उनके साथ सार्वजनिक रूप से किये जाने वाले अभद्र व्यवहारों के रूप में पढ़ते और सुनते हैं.

लेकिन इस तरह की घटनाओं से कभी यह निष्कर्ष निकालने की गलती नहीं की जानी चाहिए कि तब तो यह सर्विस ही बेकार है. इसे आपको एक लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में काम करने वाले सार्वजनिक व्यक्ति के साथ कभी-कभार होने वाली दुर्भाग्यजनक घटनाओं के रूप में लेना चाहिए.
यहां मेरे आपसे दो प्रश्न हैं. पहला यह कि इस सेवा के अतिरिक्त जब अन्य सेवाओं के अधिकारी त्यागपत्र देते हैं, तो क्या उनके त्यागपत्र राष्ट्रीय न्यूज बनते हैं.

दूसरा प्रश्न यह कि देश में अभी कुल लगभग 6500 आईएएस अफसर हैं. इनमें से साल भर में कितने त्यागपत्र देते हैं. आपको यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह के त्यागपत्र आइसबर्ग की तरह होते हैं, जिनका 90 प्रतिशत सत्य आपको मालूम नहीं पड़ता है. यदि वे इसे छोड़ रहे होते हैं, तो निश्चित तौर पर इसकी अपेक्षा किसी अन्य बेहतर एवं अपने मनपसन्द अवसर को पकड़ने के लिए. उन्हें यह अवसर कभी नहीं मिला होता, यदि वे आईएएस न होते तो. इसलिए मेरी सलाह है कि स्वयं को ग़लत निष्कर्ष निकालने से बचायें. मन छोटा न करें और पूरे जोश के साथ प्री की तैयारी में जुटे रहें.

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