IAS Preparation Tips: जान‍िये, सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम का सच

IAS Preparation Tips: जान‍िये, सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम का सच
सिविल सेवा परीक्षा 2019 का परिणाम हाल ही मे जारी किया गया है.

IAS Preparation Tips: आईएएस बनने के ल‍िये भाषा की भूम‍िका क‍ितनी है और क‍ितनी होनी चाह‍िये, यह जानने का व‍िषय है. क्‍या इससे फर्क पड़़ता है क‍ि आप अंग्रेजी में परीक्षा दे रहे हैं या ह‍िन्‍दी में?

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 11, 2020, 2:24 PM IST
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IAS Preparation Tips: सिविल सेवा के लम्‍बे समय से प्रतीक्षीत परिणाम अन्‍तत: आ गये हैं. रिजल्‍ट के आते ही मीडिया जिस तरह से सक्रिय हो जाता है, उससे पूरे देश में, विशेषकर महाराष्‍ट्र और गुजरात सहित पूरे हिन्‍दी भाषी क्षेत्र में उत्‍साह का एक जबर्दस्‍त माहौल बन जाता है. ये सफल प्रतियोगी देश के युवाओं के तात्‍कालिक हीरो के रूप में सामने आते हैं. इसके लिए मीडिया की प्रशंसा की जानी चाहिए. ऐसा खासकर इसलिए, कि मीडिया ने ऐसा करके देश की उस तथाकथित अभिजात्‍य सेवा का लोकतांत्रिकरण करने का प्रशंसनीय काम किया है. और इस परीक्षा के अंतिम परिणाम मेरे इस निष्‍कर्ष की गवाही भी देते हैं, केवल इसी साल नहीं, बल्कि हर साल.

हालांकि आईएएस सेवा के फैलते हुए दायरे ने बड़े शहरों एवं उच्‍च वर्ग की दीवारों को ध्‍वस्‍त किया है, लेकिन ''भाषाई लौह दीवार” को दरकाने में वह असफल रहा है. इस प्रकार इस सेवा ने अब अपने लिए एक अलग ही तरह का आरक्षित वर्ग तैयार कर लिया है.

आइये, इस 'नवीन आरक्षित वर्ग' को पहचानने की कोशिश करते हैं:



सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं को प्रवेश किये हुए 40 साल हो गये हैं, लेकिन अंग्रेजी के सामने वे अभी भी लगभग-लगभग पूर्णत: आत्‍मसमर्पण की ही मुद्रा में हैं. दुख की बात और यहांं तक कि आश्‍चर्य की बात यह है कि परीक्षा के आंकड़ों का बहुत विस्‍तार के साथ प्रकाशन करने वाला आयोग भाषा संबंधी आंकड़ों के मामले में बिल्‍कुल मौन है. वह यह नहीं बताता कि अंतत: किस भाषा के कितने-कितने प्रतियोगी सफल हुए हैं. इसलिए इस बारे में एकमात्र सहारा अनुमान का ही रह जाता है.
हिन्‍दी सहित इतनी सारी संविधान सम्‍मत भाषाओं में सफल होने वाले परीक्षार्थियों का प्रतिशत पांंच के आसपास ही बताया जाता है. यानी कि अंग्रेजी पहले की तरह आज भी आईएएस सेवा की भाषा बनी हुई है.

सफल प्रतियोगियों की शैक्षणिक पृष्‍ठभूमि‍ की दृष्टि से इसके चरित्र को समावेशी नहीं कहा जा सकता. सच में यह देखकर आश्‍चर्य ही होता है कि कुल सफल युवाओं में लगभग आधे केवल एक ही शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आ रहे हैं- इंजीनियरिंग वर्ग से. इस सेवा में उनका इतना अधिक दबदबा हो चुका है कि अब लोग आईएएस बनने के लिए पहले इंजीनियर बनते हैं.

यदि हम इंजीनियर के इस वर्ग में मेडिकल डॉक्‍टर्स तथा विज्ञान की पृष्‍ठभूमि वाले युवाओं को जोड़ लें, तो इसका कुल प्रतिशत 80 तक पहुंंच जाता है. यानी कि समाज के लिए काम करने वालों की शैक्षणिक पृष्‍ठभूमि सामाजिक विज्ञान की न होकर शुद्ध विज्ञान की है.

यह इसका दूसरा अभिजात्‍यीय चेहरा है. यह परीक्षा ऊपर से तो ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल किए हुए लगता है, जो तथ्‍यात्‍मक दृष्टि से सही भी है. लेकिन सच्‍चाई केवल यह होती है कि इन्‍होंने अपने जीवन के शुरु के कुछ साल ही गांंवों में गुजारे होते हैं. इनकी अधिकांश पढ़ाई और सिविल सेवा की तैयारी बड़े नगर केन्‍द्रीत होते हैं. यह उसका तीसरा चेहरा है

मुझे लगता है कि अपेक्षित परिणाम से उत्‍साहित युवाओं को इस परीक्षा के इस आंतरिक सत्‍य से परिचित होना ही चाहिए.
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