IAS Motivational Story: हर आदमी में कुछ न कुछ करने की क्षमता होती है, लेकिन सब कुछ करने की नहीं: डॉ. अग्रवाल

IAS Motivational Story: हर आदमी में कुछ न कुछ करने की क्षमता होती है, लेकिन सब कुछ करने की नहीं: डॉ. अग्रवाल
परीक्षा की न‍िरंतर जारी रखने वाले उम्‍मीदवार ही परीक्षा में पास होते हैं.

IAS Motivational Story: किसी काम को शुरू करने से पहले लक्ष्य पर अर्जुन की तरह निशाना लगा रखा है तो लक्ष्य हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं होगा. अगर लक्ष्य को लेकर मन में दुविधा है तो कठिनाई उठानी पड़ सकती है.

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मैं जब अपने पास आए या फोन पर मार्गदर्शन मांग रहे युवाओं से यह प्रश्न पूछता हूं कि ‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम आएएएस बन सकते हो?  तो पहले तो उन्हें यह प्रश्न ही समझ में नहीं आता. दरअसल वे इस प्रश्न को सुनकर सकते में आ जाते हैं, क्योंकि पहले कभी किसी ने उनसे इस तरह का ऊटपटांग प्रश्न किया ही नहीं होता है. हर एक से वे अब तक यही सुनते आ रहे थे कि ‘तुम कुछ भी कर सकते ह. यहां मेरा यह मानना है कि हरेक के पास कुछ न कुछ करने की क्षमता ज़रूर होती है, लेकिन सब कुछ करने की नहीं. बहुत सोचने-विचारने के बाद और कुछ ने तत्काल ही जो उत्तर दिए, उनमें से कुछ प्रमुख उत्तर इस प्रकार थे -
 मैं थ्रू-आउट फर्स्ट क्लास रहा हूं, इसलिए मुझे लगता है कि मैं यह कर लूंगा.
 लोग कहते हैं कि तुम्हारी याददाश्त बहुत अच्छी है, तुम आई.ए.एस. बन सकते हो.
 मुझे यह करना ही है, क्योंकि मेरे पापा-मम्मी ऐसा चाहते हैं और मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहता-चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए.



 मैं रट्टा मारने में माहिर हं. मैं कुछ भी रट सकता हूं, यहां तक कि मैथेमैटिक्स भी.
 मैंने कसम खा रखी है कि मुझे यह करना ही है.



दोस्तों, कुछ इसी तरह के उत्तर बदले हुए शब्दों में मुझे मिलते रहते हैं और मुझे यह लिखते हुए अफसोस हो रहा है कि ये उत्तर मुझे संतुष्ट नहीं कर पाते.  मुझे अपने उन नौजवान साथियों से कहना पड़ता है कि ‘तुम अपने उद्देश्य के बारे में एक बार फिर से सोचो.  ऐसा इसलिए, क्योंकि इनमें से कोई भी गुण ऐसा नहीं है, जिसके न रहने पर आप आई.ए.एस बन सकेंगे.

अब मैं आपके सामने कुछ सच्ची कहानियां पेश करने जा रहा हूं, ताकि आप अपनी यात्रा को शुरू करने से पहले, या यदि यात्रा शुरू कर चुके हों, तो उसे खत्म करने से पहले अपना सही-सही मूल्यांकन कर सकें कि आप आई.ए.एस. के इस रास्ते पर चलने वाले किस तरह के राहगीर हैं. यह मूल्यांकन आपके सामने आपके यथार्थ को, आपकी सच्चाई को प्रस्तुत करके आपको अधिक स्पष्ट और ठोस बनाएगा. इससे अंततः आपको फायदा ही होगा.

 मेरे पास एक लड़का आया-स्मार्ट, जोशीला और पढ़ने-लिखने में काफी कुछ ठीक-ठाक सा ही. वह मुझसे जानने आया था कि आई.ए.एस. की तैयारी कैसे करनी चाहिए. जब मैं उसे तैयारी करने के कुछ सूत्र बता रहा था, उसी दौरान वह बार-बार यह कहे जा रहा था कि ‘सर, इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े, मैं करूंगा. यहां तक कि मैं अपना सर तक कटवा सकता हूं. मुझे यह बनना है. मैंने उसे एक महीने बाद फिर से आने को कहा, और वह आ गया.

बात की शुरुआत उसने इस प्रश्न से की- ‘सर, मैंने सुना है कि आई.ए.एस. अफसरों की तनख्वाह कुछ ज्यादा नहीं होती?’ मैंने कहा, ‘तुमने ठीक सुना है.’ उसका अगला प्रश्न था-‘सर, मैंने यह भी सुना है कि उनके ट्रांसफर भी काफी जल्दी-जल्दी होते रहते हैं, जिसके कारण उनके बच्चों की पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाती?’ उसकी यह बात भी ठीक थी. तीसरा प्रश्न उसने थोड़ा सकुचाते हुए किया कि ‘सर, क्या यह सही है कि एमपी-एमएलए जैसे लोग कलेक्टर को डांटकर चले जाते हैं?’  मैंने कहा कि ‘हमेशा तो ऐसा नहीं होता, लेकिन मैं यह भी नहीं कह सकता कि ऐसा हो ही नहीं सकता.’

इतनी बातचीत के बाद अब आप उस नौजवान का फाइनल उत्तर सुनिए जो एक महीना पहले आई.ए.एस. बनने के लिए अपनी गर्दन तक कटवाने को तैयार था. ‘तो सर, मैं सोच रहा हूं कि जब आई.ए.एस. बनने के बाद भी इतनी सारी झंझटें रहेंगी, तो फिर बनने से फायदा ही क्या है. ‘ मैंने उसके निर्णय का सम्मान करते हुए उससे मुक्ति पा ली, क्योंकि उसको आई.ए.एस. बनाया ही नहीं जा सकता था.
 एक लड़की थी. एमबीबीएस के आखिरी साल में थी. उसका दावा था कि ‘मैं फस्र्ट अटैम्प्ट में ही क्वालीफाई करूंगी और वह भी टाॅप टेन की रैंक के साथ.’ मैं उसके इस उबाल में पानी के छींटें डालता, किन्तु बेकार. दुर्भाग्य से तीन अटैम्प्ट देने के बाद उसने चैथा न देने का फैसला किया, लेकिन सबसे दुर्भाग्यजनक बात उसकी यह रही कि वह प्रारम्भिक परीक्षा तक क्वालीफाई नहीं कर पाई.

 एक लड़के ने बीए की अपनी सभी परीक्षाएं कम्पार्टमेंट के साथ पास की थीं. फिर भी उसे लगता था कि वह आईएएस कर सकता है, क्योंकि उसने सुन रखा था कि इसे कोई भी कर सकता है. और मज़ेदार बात तो यह कि उसे अपने सुने हुए पर न केवल विश्वास ही था; बल्कि उसने उस पर चलना भी शुरू कर दिया था. अच्छा हुआ कि सच्चाई को जानने में उसने अपनी जिन्दगी के दो साल से अधिक नहीं गंवाए. अब उसने अपना रास्ता बदल दिया था.
- डाॅ०विजय अग्रवाल
(लेखक पूर्व सिविल सिविल सर्वेन्ट एवं  afeias के संस्थापक हैं.)

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First published: May 26, 2020, 10:25 PM IST
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