IAS ऑफिसर की सूझबूझ का कमाल, पुणे के इस गांव में टॉयलेट से होती है लाखों की कमाई

महिलाओं को लगता था शौचालय साफ करना मैला ढोने वालों का काम है, किसानों का नहीं. शुरुआत में वे तैयार नहीं थीं लेकिन, समय के साथ लोगों की सोच बदली और आज उसी मिट्टी को उपयोग में लाकर किसान लाखों की कमाई कर रहे हैं.

News18Hindi
Updated: June 17, 2019, 1:31 PM IST
IAS ऑफिसर की सूझबूझ का कमाल, पुणे के इस गांव में टॉयलेट से होती है लाखों की कमाई
IAS Officer Ayush Prasad,
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Updated: June 17, 2019, 1:31 PM IST
कहते हैं कि एक आइडिया जिंदगी बदल सकता है. ये बात सच साबित की है पुणे के आईएएस ऑफिसर आयुष प्रसाद ने. इस ऑफिसर ने अपने एक यूनिक आइडिया से गांव वालों की जिंदगी बदल दी. उनके अनूठे प्‍लान की वजह से आज गांव वाले लाखों की कमाई कर रहे हैं.  दरअसल पुणे से सटे खेड़ तालुका गांव के निवासियों को खुले में शौच की आदत थी.

यहां के लोग टॉयलेट का इस्‍तेमाल बहुत कम या कहें कि न के बराबर करते थे. इसके लिए कई बार ऑफिसर ने कई बार अलग-अलग तरीके से गांव वालों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन परिणाम सकारात्‍मक नहीं निकले. ऐसे में उन्होंने इस समस्‍या को हल करने के लिए एक अलग ही तरीका निकाला. आयुष ने यहां के लोगों को समझाया कि लोग टॉयलेट का इस्‍तेमाल करें तो सेप्टिक टैंक खाली कर इसको मिट्टी में मिलाने से अच्छी फसल पैदा करके लाखों की कमाई की जा सकती है.

मिट्टी के परीक्षण के नतीजे सकारात्‍मक
इस बारे में पुणे मिरर से बात करते हुए IAS अधिकारी ने बताया कि सबसे पहले साल की शुरुआत में एकत्र की गई मिट्टी का परीक्षण करने के लिए प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय (DOGR) से संपर्क किया गया. मई में जब इस मिट्टी के नतीजे आए तो वे सकारात्‍मक थे. न केवल ये मिट्टी प्याज की खपत के लिए विकसित करने में सक्षम थी, बल्कि इसने रासायनिक उर्वरकों की तुलना में नौ प्रतिशत अधिक उपज और जैविक खाद की तुलना में 47% अधिक उपज दी थी.

दो और आईएएस अधिकारियों ने की मदद
परिणाम आने के बाद प्रसाद ने इस योजना को अमल में लाने के लिए दो आईएएस अधिकारियों इंदिरा असवार और सोनाली अवचेत की मदद ली. इनकी मदद से IAS आयुष प्रसाद ने ग्रामीणों को अपने अवरोधों को खत्म करने और गड्ढों की सफाई शुरू करने के लिए राजी करना पड़ा ताकि वे जीविकोपार्जन कर सकें. सोनाली अवचेत ने बताया, “महिलाएं जीविका कमाने की इच्छुक थीं, लेकिन कहीं न कहीं उनके दिमाग में कोई आंशका थी. यहीं पर हम उन्हें कुछ शौचालय के गड्ढों में ले गए, जो बेकार पड़े हुए थे और उन्हें भर दिया गया था. हमने उन्हें दिखाया कि चाय के पाउडर जैसा पदार्थ था और कुछ नहीं. हमने विश्वास बनाने में मदद करने के लिए अपने हाथों से गड्ढों को भी खाली कर दिया.''

निर्मूल साबित हुईं स्वच्छता को लेकर चिंताएं
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प्रसाद द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट पर काम करने वाले स्वयं सहायता समूह के प्रमुख दुर्गा नांगरे कहते हैं कि शुरुआत में आंतरिक विरोध था. वह कहती हैं, “बहुत सी महिलाओं को लगा कि शौचालय साफ करना मैला ढोने वालों का काम है, किसानों का नहीं. स्वच्छता को लेकर चिंताएं थीं, लेकिन, समय के साथ, हमारे पास आने वाले सरकारी अधिकारियों ने उन सभी को संबोधित किया. इसके बाद धीरे-धीरे चीजें सामान्‍य हो गईं.

वहीं इस बारे में पुणे मिरर से बात करते हुए ऑफिसर प्रसाद ने कहा कि कुछ वक्‍त के बाद हमारी  कोशिशें रंग लाईं और गांव वालों ने खुले में शौच बंद कर दिया. उसके बाद गड्ढों में पहले से मौजूद मल का इस्‍तेमाल खेतों में मिट्टी के रूप में किया जाने लगा. इसका नतीजा ये निकला कि आज गांव वाले न केवल टॉयलेट का इस्‍तेतमाल कर रहे हैं बल्‍कि लाखों की कमाई भी कर रहे हैं.

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First published: June 17, 2019, 1:07 PM IST
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