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IAS Preparation Tips: इंटरव्यू के दौरान बनावटी होने से बचें, ऐसे मिलेगी तैयारी में ऊर्जा

इंटरव्यू के दौरान अगर हम दिखाते हैं कि आईएएस बनने में हमारा निजी लाभ भी है तो इसमें समाज से किसी तरह का विरोधभास नहीं है.

जब पूछा जाता है कि ‘तुम आई.ए.एस. क्‍यों बनना चाहते हो?” तो सभी के पास एक-सा रटा-रटाया जवाब होता है कि ‘मैं देश के लिए, अपने समाज के लिए कुछ करना चाहता हूं’. इसे सुनकर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्‍यों के ओठों पर एक हल्‍की-सी हंसी की रेखा उभर आती है.

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नई दिल्लीः मैं हर साल लगभग एक हजार परीक्षार्थियों के सीधे सम्‍पर्क में आता हूं. साथ ही मेरे पास हर वर्ष लगभग दस हजार मेल्‍स आते हैं. जब कभी मैं इनमें से किसी से यह प्रश्‍न करता हूं कि ‘तुम आई.ए.एस. क्‍यों बनना चाहते हो?” तो सभी के पास एक-सा रटा-रटाया जवाब होता है कि ‘मैं देश के लिए, अपने समाज के लिए कुछ करना चाहता हूं’. यहां तक कि साक्षात्‍कार के दौरान पूछे गये इस तरह के प्रश्‍नों के उत्‍तर भी यही होते हैं. इस उत्तर को सुनकर इंटरव्यू बोर्ड के परिपक्‍व सदस्‍यों के ओठों पर हंसी की दिखाई न देने वाली एक हल्‍की-सी हंसी की रेखा उभर आती है. खैर ….

यहां मेरी मूल चिंता और प्रश्‍न यह है कि क्‍या इस उत्तर में सच्‍चाई है? क्‍या यह आपका ईमानदार उत्तर है? क्‍या यह उत्तर आपके हृदय की गहराई तथा पूर्ण चेतना के साथ आया है? यदि ऐसा ही है, तो आप मान लें कि यह एक ऐसी बड़ी घटना है, जो आपके मस्तिष्‍क और आपकी देह को निरंतर ऊर्जा प्रदान करके आपको थकने नहीं देगी, रुकने नहीं देगी और न ही निराश होने देगी. लेकिन दुर्भाग्‍यवश ऐसा है नहीं. तो फिर किया क्‍या जाये, आइये देखते हैं.

आपने आई.ए.एस. बनने का जो अपना उद्देश्‍य बताया है, दरअसल, वह आपका आदर्श है, उद्देश्‍य नहीं. आदर्शों के साथ कुछ दिक्‍कतें होती हैं. जैसे कि इसका रास्‍ता काफी कठिन होता है, कभी-कभी दण्‍डात्‍मक भी. यह अपेक्षाकृत अस्‍थायी भी होता है. अधिक समय तक टिकता नहीं है. यह त्‍याग का भी क्षेत्र है. यानी कि भौतिक रूप से आप पाते कुछ नहीं हैं. बल्कि कुछ खोते ही हैं. इसलिए यदि आई.ए.एस. बनने का आपका एकमात्र उद्देश्‍य यही है, तो अपवादस्‍वरूप कुछ को छोड़कर अधिकांश के लिए यह ऊर्जा प्रदान करने वाला माध्‍यम नहीं बन पाता. जबकि आई.ए.एस. जैसी कड़ी प्रतियोगिता की वैतरणी को पार करने के लिए इसकी बहुत अधिक जरूरत होती है.

जीवन की सच्‍चाई यह है कि जब हमारा कोई काम हमारे अपने हित से गहरे रूप से जुड़ जाता है, तब स्‍वाभाविक रूप से हम उसमें अपना जी-जान लगा देते हैं. हमारा अपना लाभ हमें थकने नहीं देता. और यदि चलते-चलते थक भी गये, तो कुछ समय बाद वह हमें कोंच-कोंचकर उठा देता है, फिर से यात्रा शुरू करने के लिए.

यहां मैं स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा कि यहां हमारे अपने हित का कोई विरोध सामाजिक हित से नहीं होता है. ये दोनों साथ-साथ चल सकते हैं. आप स्‍वयं बतायें कि आई.ए.एस. बनने के बाद आपको जो सामाजिक प्रतिष्‍ठा और पहचान मिलेगी, भविष्‍य की सुरक्षा और जीवन की जो सुविधायें मिलेंगी, दायित्‍वों के निर्वाह के लिए जो अधिकार मिलेंगे, उनका सामाजिक हितों से भला क्‍या विरोध हो सकता है.

इसलिए मेरी सलाह है कि जब तक आप सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तब तक थोड़ा सा स्‍वार्थी ही सही; बनना लाभदायक रहेगा. फिलहाल अपने दिमाग में आदर्श की जगह यथार्थ को जगह दें. यह आपको ऊर्जा देगा.

डॉ.विजय अग्रवाल
(लेखक पूर्व सिविल सर्वेन्‍ट एवं afeias के संस्‍थापक हैं.)

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