IAS Preparation Tips: प्रारंभिक परीक्षा के जीएस पेपर का फॉर्मेट है असंतुलित, बदलाव की जरूरत

GS का पेपर असंतुलित है इसमें बदलाव पर विचार करना चाहिए.
GS का पेपर असंतुलित है इसमें बदलाव पर विचार करना चाहिए.

IAS Preparation Tips: कभी कभी राजनीति विज्ञान से 20-22 प्रश्न पूछ लिये जाते हैं, तो कभी केवल 5 प्रश्न. अन्य विषयों के साथ भी ऐसा ही होता है. इसका नतीजा यह होता है कि इससे उन परीक्षार्थियों को विशेष लाभ मिल जाता है, जिन्होंने उसी विषय को अपना वैकल्पिक विषय चुन रखा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 20, 2020, 1:43 PM IST
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UPSC Preparation Tips: विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिवार्य रूप से शामिल सामान्य ज्ञान के विषय को “अध्ययन का मध्यम मार्ग” कहा जा सकता है. इस ज्ञान के दो आधार स्तम्भ होते है. पहला यह कि एक सभ्य नागरिक के रूप में हमें जिन-जिन विषयों की आधारभूत जानकारी होनी चाहिए, वह हो. हमारे यहाँ की दसवीं कक्षा की पढ़ाई का स्वरूप इसी विचार को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है.
दूसरा यह कि इन विषयों का अध्ययन इस प्रकार किया जाये कि आगे चलकर व्यक्तियों में अनुमान लगाने, सही निर्णय लेने तथा अपने आसपास की घटनाओं के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हो सके. दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था से यह दूसरा आधार सिरे से ही गायब है. खैर....

वस्तुतः सामान्य ज्ञान ही वह माध्यम है, जिसके आधार पर व्यक्ति की सही मानसिक क्षमता का परीक्षण किया जा सकता है. इसलिए हमारे देश की सर्वोच्च सिविल सेवा में इसे इतनी अधिक अहमियत दी गई है. लेकिन यहाँ सवाल यह है कि क्या इस आधार का सही उपयोग इस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है? इसे मैं यहाँ अभी 4 अक्टूबर को हुए प्रारम्भिक परीक्षा के आधार पर रखना चाहूंगा.

इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए कि वस्तुनिष्ठ प्रणाली वाली इस परीक्षा में ‘रटन्त विद्या‘ बिल्कुल भी काम नहीं आती. अधिकांश प्रश्नों के सही विकल्पों तक स्वयं के तार्किक विश्लेषण के जरिये पहुँचना होता है. इसके बावजूद इसकी अपनी कुछ कमियां हैं, जिनकी ओर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है.
पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों में विषयों का अनुपात काफी भ्रमात्मक होता है. उदाहरण के तौर पर कभी राजनीति विज्ञान से 20-22 प्रश्न पूछ लिये जाते हैं, तो कभी केवल 5 प्रश्न. अन्य विषयों के साथ भी ऐसा ही होता है. इसका नतीजा यह होता है कि इससे उन परीक्षार्थियों को विशेष लाभ मिल जाता है, जिन्होंने उसी विषय को अपना वैकल्पिक विषय चुन रखा है. यह शेष विद्यार्थियों के प्रति अन्याय हो जाता है. जबकि मुख्य परीक्षा के प्रश्नों में विभिन्न विषयों पर पूछे गये प्रश्नों के अनुपात कमोवेश निश्चित होते हैं.



प्रारम्भिक परीक्षा में चयन का न्यूनतम प्राप्तांक औसतन 50% होता है. वस्तुनिष्ठ पद्धति का यह स्कोर बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. इसका मुख्य कारण है- आयोग के द्वारा कुछ ऐसे कठिन, बिल्कुल अनसुने-अनजाने एवं अव्यावहारिक प्रश्नों का पूछा जाना, जो परीक्षार्थियों के पल्ले ही नहीं पड़ते हैं. यहाँ सवाल यह खड़ा होता है कि यदि बॉल बाउंसर है, तो आप बैट्समेन के रन बनाने की क्षमता का मूल्यांकन करेंगे कैसे? ऐसे प्रश्न क्षमता का परीक्षण करने से अधिक परीक्षार्थी को आतंकित करते हैं. इसका अत्यंत नकारात्मक प्रभाव परीक्षा की उनकी तैयारी करने पर भी पड़ता है. वह बेवजह ही तथ्यों के संग्रहण में स्वयं को लगाने लगता है, जिनकी अन्यथा कोई उपयोगिता नहीं होती.

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जब से इसी परीक्षा के द्वारा भारतीय वन सेवा की मुख्य परीक्षा के लिए भी चयन होने लगा है, तब से पेपर का ढाँचा बेढंगा हो गया है. पर्यावरण, कृषि एवं वनस्पतिशास्त्र पर ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछे जाने लगे हैं, जिन्हें किसी भी कोण से सामान्य ज्ञान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. आयोग को चाहिए कि वह “सेम प्लेयिंग फील्ड” नीति को केन्द्र में रखते हुए इन प्रश्नों पर विचार करे.

(लेखक पूर्व सिविल सर्वेंट एवं afeias के संस्थापक है.)
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