IAS Preparation Tips: सिविल सेवा परीक्षा और नई शिक्षा नीति, जानें क्या होगा असर

IAS Preparation Tips: सिविल सेवा परीक्षा और नई शिक्षा नीति, जानें क्या होगा असर
नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषा को स्थान मिलने से जटिलता पैदा हो गई है

UPSC Success Tips 2020: नई शिक्षा नीति में प्राइमरी स्तर पर स्थानीय भाषा को स्थान दिया गया है. हालांकि, जहां तक बात सिविल सेवा की है तो उसमें अंग्रेजी का महत्त्व न सिर्फ बना हुआ है बल्कि बढ़ता हुआ प्रतीत होता है. ऐसे में इन बच्चों के लिए सिविल सेवा को और भी जटिल बनाया जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 2, 2020, 12:12 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. चूंकि हमारे देश की राजनीतिक प्रणाली संघात्‍मक है इसलिए स्‍वाभाविक रूप से किसी भी ऐसे देश में सिविल सेवा में भर्ती के लिए दो अलग-अलग स्‍तर होते हैं. पहला स्‍तर संघीय सरकार का होता है. इसमें नियुक्‍त अधिकारी केन्‍द्र सरकार में काम करते हैं. दूसरा स्‍तर राज्‍यों का अपना-अपना होता है. इनमें वे अपनी-अपनी जरूरतों के अनुसार सिविल सेवा के लिए परीक्षाएं आयोजित करते हैं. इसके लिए उनके पास अपने-अपने लोक सेवा आयोग हैं. इन्‍हें अपना पाठ्यक्रम तैयार करने एवं परीक्षा की प्रणाली निर्धारित करने की पूरी स्‍वायत्‍तता है. हालांकि हमारे यहाँ देखने में यही आ रहा है कि अधिकांश राज्‍य मुख्‍यत: संघ लोक सेवा आयोग की प्रणाली का ही अनुकरण करते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा लेने के बारे में राज्‍यों के सामने कभी कोई दिक्‍कत देखने और सुनने में नहीं आयी. लेकिन जब भी बात संघ में सिविल सेवकों की भर्ती किए जाने की होती है, तो उसके बारे में हमेशा कुछ विवाद उठकर खड़े हो जाते हैं, जिनमें सबसे अधिक तीव्र और जटिल विवाद भाषा को लेकर होता है.
ऐसा होना स्‍वाभाविक भी है. भारत में राज्‍यों के पुनर्गठन का मुख्‍य आधार भाषा ही रही है. आजादी के 73 साल के बाद सभी राज्‍यों की भाषाओं ने विकसित होकर अपने-अपने यहाँ की सिविल सेवा परीक्षाओं में राज्‍य की भाषा के ज्ञान को अनिवार्य बना दिया है. प्रशासन की व्‍यावहारिकता की दृष्टि से इसे किसी भी कोण से गलत नहीं कहा जा सकता.

लेकिन सम्‍पूर्ण देश के संदर्भ में संघ लोक सेवा आयोग के सामने यह एक बहुत बड़ी व्‍यावहारिक दुविधा खड़ी होती है कि वह किसे अपनी परीक्षा का माध्‍यम बनाए? सन् 1978 तक अंग्रेजी उसका माध्‍यम रही, जिसे देश के केवल 2 प्रतिशत लोग ही बोलते थे. यह घोर अलोकतांत्रिक था. इसके बाद से संविधान में निहित अन्‍य भारतीय भाषाओं को भी माध्‍यम के रूप में चुना तो गया, लेकिन अंग्रेजी भाषा का कार्यवाहक ज्ञान अनिवार्य बना रहा. यह आज भी है, जिसके कारण योग्‍य होते हुए भी देश के बहुत से गैर अंग्रेजी भाषी युवा इस सेवा से दूर कर दिए जाते हैं.
सोचने की बात है कि ऐसा हो क्‍यों रहा है? इसका उत्‍तर स्‍पष्‍टत: केन्‍द्र सरकार की भाषा संबंधी कमजोर और ढुलमुल नीति ही रही है. यदि व्‍यावहारिक स्‍तर पर देखा जाए, तो अंग्रेजी के स्‍थान पर हिन्‍दी भाषा के कार्यवाहक ज्ञान को अनिवार्य माना जाना चाहिए था, जिससे देश की लगभग तीन-चौथाई आबादी परिचित है. लेकिन जब भी इस तरह की कोई बात उठती है, विशेषकर कुछ राज्‍यों के द्वारा उसका घोर विरोध किया जाने लगता है. ऐसे में सरकार को यथास्थिति बनाए रखने में ही राजनैतिक लाभ दिखाई देता है. लेकिन क्‍या इसे एक स्‍वतंत्र एवं उदारवादी लोकतांत्रिक देश में सही कहा जा सकता है?



अभी सरकार ने राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 घोषित की है, इसमें भी भाषा की इस अस्‍पष्‍टता को दूर करने की कोई ईमानदार कोशिश नजर नहीं आती. बल्कि सच तो यह है कि शिक्षा में स्‍थानीय भाषाओं को स्‍थान देने से इसे केन्‍द्रीय सेवाओं के लिए और भी जटिल बना दिया गया है.

साफ है कि यदि संघ को अपनी परीक्षा में अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को अनिवार्य रखना ही है, तो उसे चाहिए था कि प्राथमिक स्‍तर में ही इसे अनिवार्य कर दे. उसने ऐसा नहीं किया, क्‍योंकि सरकार जानती है कि इसका कुछ राज्‍यों को छोड़कर शेष भारत में तीखा विरोध होता. लेकिन इस नीति में भाषा संबंधी जो प्रावधान किए गए हैं, उसे इस रूप में गलत तो कहा ही जा सकता है कि स्‍थानीय एवं राज्‍य की भाषाओं से शिक्षा प्राप्‍त विद्यार्थी 21 साल की उम्र के बाद कम से कम केन्‍द्र सरकार की सिविल सेवाओं के लायक तो रह ही नहीं जाएंगे. मुझे लगता है कि इस समस्‍या पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. इसका हल नहीं ढूंढा जाना युवाओं पर किया जाने वाला एक अप्रत्‍यक्ष अन्‍याय ही होगा.

(लेखक पूर्व सिविल सर्वेन्‍ट एवं afeias के संस्‍थापक हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज