Preparation Tips: ये चुनौतियां पार कर ली, तो बन जाएंगे IAS अधिकारी

डॉ. विजय अग्रवाल | News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 1:00 PM IST
Preparation Tips: ये चुनौतियां पार कर ली, तो बन जाएंगे IAS अधिकारी
डॉ. विजय अग्रवाल से जानें सिविल सेवा परीक्षा की चुनौतियां.

राज्यों की परीक्षाओं में बैठने वाले अधिकांश परीक्षार्थी राज्य के ही होते हैं. जबकि आईएएस में बैठने वाले युवा पूरे देश के होते हैं. लेकिन सफलता के मापदण्ड सभी के लिए समान होते हैं.

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आज छोटी से छोटी नौकरी पाने के लिए; विशेषकर यदि वह सरकारी नौकरी हुई, तो प्रार्थियों को प्रतियोगिता की प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ता है. चूंकि देश की अधिकांश सेवायें विशेषज्ञता वाली होती हैं; जैसे कि डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक आदि-आदि, इसलिए उससे संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले युवा ज्ञान की अपनी-अपनी शाखाओं वालों से ही जूझ रहे होते हैं.

प्रतियोगिता के दरवाजे ज्ञान के सभी क्षेत्रों के लिए खुले
इस मायने में सिविल सेवायें परीक्षायें, चाहे वे केन्द्र की हों, या राज्यों की, बिल्कुल ही अलग हैं. चूंकि इसका संबंध प्रशासन से होता है और प्रशासन को 'सामान्यज्ञ' कहा जाता है, इसलिए इस प्रतियोगिता के दरवाजे ज्ञान के सभी क्षेत्रों के लिए खुले होते हैं. इसमें कोई भी स्नातक बैठ सकता है - इंजीनियर, डॉक्टर, चार्टड एकांउन्टेंट, वकील, लेक्चरर, एमबीए आदि कोई भी.

यहां एक बात ध्यान में रखने की है. जहां तक राज्यों की सिविल सेवाओं का प्रश्न है, उनमें ये प्रोफेशनल जाना नही चाहते. लेकिन जब बात आईएएस की आती है, तब हमें वहाँ इनकी भीड़ दिखाई देती है. अभी तो स्थिति यह है कि इस परीक्षा में सफल होने वाले लोगों में 51 फीसदी (2016-17 के अनुसार) केवल इंजीनियर ही थे.

आईएएस में बैठते हैं पूरे देश के युवा 
राज्यों की परीक्षाओं में बैठने वाले अधिकांश परीक्षार्थी राज्य के ही होते हैं. जबकि आईएएस में बैठने वाले युवा पूरे देश के होते हैं. इसकी रेंज दूर-दराज के गाँव के एक सरकारी स्कूल के विद्यार्थी से लेकर कैंम्ब्रिज-आक्सफोर्ड में पढ़ने वाले भारतीयों तक की होती है. लेकिन इन सबके लिए परीक्षा एक ही होती है. सफलता के मापदण्ड सभी के लिए समान होते हैं.

परीक्षा में सबके लिए समान नीति का पालन
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इस प्रकार ज्ञान के विभिन्न शाखाओं का साझा मंच तथा पूरे देश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं के स्तर को एक मानकर चलने की नीति ने इस परीक्षा को एक अलग ही प्रकार का जटिल एवं कठिन स्वरूप प्रदान कर दिया है. सतह पर तो यह परीक्षा सबके लिए समान नीति का पालन करती हुई दिखाई देती है. लेकिन व्यावहारीक रूप में यह समानता 'असमानताओं के बीच समानता' की तरह है.

विद्यार्थी की योग्यता पर निर्भर है सफलता
लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि इस परीक्षा में सामान्य स्तर के युवाओं के लिए कोई-संभावना नहीं है. इन समस्त असमान स्थितियों के बावजूद परीक्षा के स्वरूप का निर्धारण कुछ इस तरह से किया गया है कि सफलता शैक्षणिक संस्थाओं की मोहताज न रहे. इसमें सफलता विद्यार्थी की अपनी योग्यता और व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करती है, जिसे अपने स्तर पर भी प्राप्त किया जा सकता है. यही कारण है कि परीक्षा के परिणाम आने के बाद हमें एक-दो नहीं, बल्कि कई-कई सफल प्रतियोगियों की अत्यंत प्रेरक एवं भावप्रवण सच्ची कहानियां पढ़ने को मिल जाती हैं. दरअसल, ये सफल युवा वही लोग होते हैं, जो इस परीक्षा द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौतियों एवं उसकी अपेक्षाओं से अच्छी तरह परिचित होकर अपने आपको उसके अनुकूल तैयार करते हैं.

यह वह परीक्षा नहीं है कि अंकों का एक निश्चित प्रतिषत प्राप्त कर लेने के बाद आपको सफलता मिल ही जाती है. यह प्रतियोगी परीक्षा है, जिसमें आपकी सफलता आपके प्राप्तांकों के साथ ही साथ दूसरों के प्राप्तांकों की तुलना पर निर्भर करती है. इसलिए जब भी आप इस परीक्षा के लिए अपना मूल्यांकन करें, तो आपके मूल्यांकन की परिधि आपके आसपास के प्रतियोगियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. चूंकि उसका स्वरूप अखिल भारतीय है, और यह देष की सर्वोच्च सेवा है, इसलिए आपके मूल्यांकन का माॅडल देश के प्रतिभावान विद्यार्थी होने चाहिए, ताकि आप स्वयं को उनके स्तर तक ले जाने से पहले ही आत्मसंतुष्ट होकर बैठ न जायें.

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First published: August 27, 2019, 5:10 AM IST
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