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IAS Success Story: जानिए उस शख्स की कहानी, जिसे IAS एग्‍जाम क्रैक करने के बावजूद दी गई रेलवे में नौकरी

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Updated: November 19, 2019, 2:44 PM IST
IAS Success Story: जानिए उस शख्स की कहानी, जिसे IAS एग्‍जाम क्रैक करने के बावजूद दी गई रेलवे में नौकरी
अजीत ने साल 2008 में सिविल सेवा परीक्षा दी थी. इस साल 791 में से 208वींं रैंक हासिल की

IAS Success Story: पांच साल की उम्र में आंखों की रोशनी खोने वाले अजीत कुमार ने सिविल सेवा परीक्षा में पाई 208वीं रैंक, जानिए कितना मुश्‍किल था उनके लिए ये सफर.

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  • Last Updated: November 19, 2019, 2:44 PM IST
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IAS Success Story: अगर इरादे पक्‍के हों तो किसी भी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है. इस बात को सच साबित कर दिखाया है अजीत कुमार यादव ने. अजीत देश के दूसरे दृष्टिहीन आईएएस अफसर हैं. उनकी लड़ाई केवल अपनी शारीरिक अक्षमता से नहीं थीं, बल्‍कि उनकी लड़ाई थी सरकारी सिस्‍टम से. जी हां, अजीत ने देश की सबसे मुश्‍किल परीक्षा में शुमार संघ लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित होने वाली परीक्षा में 208वीं रैंक हासिल की थी लेकिन फिर भी उन्‍हें सिविल सेवा में कोई पद न देकर भारतीय रेलवे में बतौर अधिकारी पद की पेशकश की गई.

अजीत को अपनी अक्षमता की वजह से मिलने वाला ये पद मंजूर नहीं था. इसलिए उन्‍होंने इस पद को स्‍वीकार करने से मना कर दिया था. साथ  ही सिस्‍टम के इस भेदभाव के खिलाफ जाकर उन्‍होंने लड़ाई लड़ी. आखिरकार साल 2010 में उन्‍हें सफलता मिली और उन्‍हें IAS का पद ऑफर किया गया. कितना मुश्‍किल था ये सफर आइए जानते हैं.

अजीत यादव हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के खेरी गांव से ताल्‍लुक रखते हैं. अजीत जन्‍म से दृष्टिहीन नहीं थे. दरअसल पांच साल की उम्र में उन्‍हें डायरिया हो गया था. इसके बाद उनकी हालत इतनी बिगड़ी कि उनकी आंखों की रोशनी ही चली गई लेकिन अजीत ने अपनी इस कमजोरी को कभी बाधा नहीं बनने दिया.

बोर्ड परीक्षा में टॉप किया

अजीत ने पूसा रोड के स्प्रिंगडेल्स स्कूल में प्रवेश लिया. यहां से उन्होंने दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में टॉप किया. इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से राजनीति विज्ञान (ऑनर्स) में ग्रेजुएशन किया. यहां से ग्रेजुएशन के बाद एमए में जूनियर रिसर्च स्कॉलरशिप हासिल हुई. इसके बाद उन्हें डीयू के श्यामलाल कॉलेज में भी पढ़ाने का मौका मिला.

पीएम से मिली प्रेरणा
अजीत एक इंटरव्‍यू में कहते हैं कि साल  2005 में एक कार्यक्रम के दौरान उन्‍होंने पीएम मनमोहन सिंह को यह कहते हुए सुना कि IAS के दरवाजे दृष्टिहीन नागरिकों के लिए भी खोले जाने चाहिए. बस इस पल के बाद ही मुझे एहसास हुआ कि मुझे क्या करना है. यहां से मैंने सिविल सर्विसेज में जाने की ठानी. यहांं से ही उन्‍होंने परीक्षा की तैयारी शुरू की.
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रेलवे में अधिकारी का पद ठुकराया
यादव ने साल 2008 में सिविल सेवा परीक्षा दी थी. इस साल 791 में से 208वींं रैंक हासिल की लेकिन फिर भी उन्‍हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में कोई पद ऑफर न करके भारतीय रेलवे में बतौर अधिकारी पद ऑफर किया गया लेकिन अजीत को ये गवारा नहीं था. इसलिए उन्‍होंने इसके खिलाफ कदम उठाया. उन्‍होंने केस फाइल  किया.

साल 2010 में मिली जीत
आखिर उनका मामला केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण में पहुंच गया. एक लंबी लड़ाई के बाद साल 2010 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया गया. प्राधिकरण ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को आठ सप्ताह के भीतर उनके रैंक के मुताबिक पद ऑफर करने के निर्देश दिए. 14 फरवरी, 2012 को आखिरकार उनका कॉल लेटर आ गया.

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First published: November 19, 2019, 11:11 AM IST
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