पुरुष टॉपर्स की तुलना में महिला टॉपर्स को मिलते हैं कम अवसर! ये है वजह

कई कारणों से महिलाओं को अवसरों की कमी होती है.

अभी भी अवसरों की समानता के मामले में जेंडर का काफी फर्क पड़ता है. देश के बाहर जाने से लेकर पारिवारिक मूल्यों के कारण उनके करियर के साथ अक्सर समझौता करना पड़ता है.

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    नई दिल्ली. देश काफी प्रगति पर है और महिलाओं की भी भागीदारी इसमें कम नहीं है लेकिन आज भी कहीं न कहीं ऐसा देखने को मिलता है कि अवसरों की समानता जितनी होनी चाहिए उतनी शायद महिलाओं के लिए नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस की एक स्टोरी के मुताबिक साल 1996 से लेकर 2015 के बीच करीब 51 पुरुष और 35 महिला टॉपर्स के बारे में जानकारी इकट्ठी की जिससे पता चलता है कि अभी भी अवसरों की समानता के मामले में जेंडर का काफी फर्क पड़ता है. देश के बाहर जाने से लेकर पारिवारिक मूल्यों के कारण उनके करियर के साथ अक्सर समझौता करना पड़ता है.

    देश के बाहर जाने में महिलाओं का प्रतिशत कम
    इंडियन एक्सप्रेस ने जितने टॉपर्स के बारे में पता लगाया उनमें से सिर्फ 40 फीसदी महिलाएं ही इस वक्त देश के बाहर पढ़ाई या नौकरी कर रही हैं जबकि पुरुषों में यह प्रतिशत 63 है. हालांकि, दिल्ली यूनिवर्सिटी की शिक्षा विभाग की प्रोफेसर पूनम बत्रा का कहना है कि यह संख्या काफी कम है इसलिए सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता लेकिन वे इस बात को मानती हैं कि जेंडर काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है.

    हालांकि, कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें खुद ही बाहर जाकर पढ़ाई करना पसंद नहीं है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक साल 2010 की सीबीएसई की 12वीं टॉपर स्वाती प्रुस्टि को देश के बाहर जाकर बसने का शौक कभी भी नहीं था, इसलिए उन्हें देश के बाहर जाकर पढ़ने का आकर्षण भी कभी नहीं रहा. उनका कहना है कि चूंकि वे जानती थीं कि उन्हें देश में ही काम करना है इसलिए लोन लेकर बाहर जाकर पढ़ने का कोई अर्थ नहीं था. उन्होंने कहा कि मैं अपने माता-पिता के पास रहना चाहती थीं. साथ ही अपने देश में सुरक्षा का भाव भी रहता है इसलिए इसलिए उन्होंने देश के बाहर जाना उचित नहीं समझा.

    सोहिनी चपराला साला 2008 की सीबीएसई की 12वीं की टॉपर हैं. वे ढाका में अमेरिकन अर्थशास्त्री की नॉन प्राफिट ऑर्गेनाइजेशन में रिसर्च मैनेजर हैं. आईआईटी कानपुर से अर्थशास्त्र में एमएससी करने के बाद वे पीएचडी या पब्लिक पॉलिसी एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन करना चाहती थीं. उनका कहना है कि लेकिन जिंदगी को शायद कुछ और ही मंजूर था. उन्होंने कहा कि मेरी शादी हो गई और मेरी जीवन की प्राथमिकताएं बदल गईं. ज्यादा दूर कहीं जाना संभव नहीं रहा जो कि करियर के लिए कहीं न कहीं नकारात्मक ही रहा. उन्होंने कहा कि मैं सामाजिक मूल्यों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन इसने मेरी परिस्थितियां बदल दीं. अगर मैं महिला नहीं होती तो स्थितियां शायद कुछ और होतीं. वे इस वक्त अपना बच्चा, करियर और लंबी दूरी वाले विवाह को मैनेज कर रही हैं.

    STEM में महिलाओं की कमी
    साल 2018 के ऑल इंडिया सर्व ऑन हायर एजुकेशन के एडिशन के मुताबिक पहली बार बीएससी प्रोग्राम में एनरोल हुए छात्र-छात्राओं की संख्या बराबर थी. कुल 48.19 लाख स्टूडेंट्स में से 50.7 फीसदी पुरुष और 49.3 फीसदी महिलाएं थीं. वहीं साल 2017-18 में एसएससी के स्तर पर प्रति 100 पुरुषों में महिलाओं की संख्या 171 थी जबकि पांच साल पहले यह संख्या 138 थी.

    इसके बावजूद STEM (साइंस, टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग, मैथमेटिक्स) में महिलाओं का रिप्रेजेंटेशन कम है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कुल 10 में से सात पुरुषों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की जबकि महिलाओं में दस में से 3 महिलाओं ने ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई की बाकियों ने बीकॉम या मैनेजमेंट की पढ़ाई की. इसके अंडर-रिप्रेजेंटेशन के कारण महिलाओं की इस फील्ड में नौकिरियां भी कम हैं.

    इस तरह का अंतर स्कूल के स्तर पर ही दिख जाता है. पुरुष टॉपर्स का 96 फीसदी 11वीं और 12वीं कक्षा में साइंस चुना जबकि सिर्फ 76 फीसदी महिलाओं ने ही साइंस को चुना. इसी तरह से 10 महिला टॉपर्स ने कॉमर्स चुना जबकि कुल 51 पुरुष टॉपर्स में से केवल एक ने ही कॉमर्स चुना.

    सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियां
    अपने शानदार अचीवमेंट के बावजूद भी बहुत सी महिला टॉपर्स सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में तमाम मुश्किलों का सामना कर रही हैं. हालांकि, यह हमेशा खुले तौर पर प्रेशर के रूप में नहीं होता है लेकिन उनमें से कइयों का कहना है कि उन्हें अपने करियर को फिर से नए सिरे से बनाना पड़ा.

    इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इनमें से तमाम महिलाओं का कहना था कि शादी के बाद उन्हें ऐसी जॉब करनी थी जिसमें उनके काम करने के घंटे बिल्कुल निर्धारित हों क्योंकि वे ज्यादा घंटे तक काम नहीं कर सकती थीं.

    शालिनी प्रसाद ने आसनसोल के लॉरेटो कॉन्वेंट स्कूल से दसवीं की पढ़ाई की. वे सर्वे में टियर-2, 3 से टॉप करने वाली महिलाओं में से एक थीं. उन्होंने 1997 में 12वीं कक्षा में आईएससी बोर्ड से टॉप किया. वे इस लक्त लंदन में ब्रिटिश पेट्रोलियम की वॉइस प्रेसिडेंट हैं. लेकिन वे कहती हैं कि यहां तक पहुंचने में दो पुरुषों ने उनकी मदद की. वे बताती हैं कि दिल्ली एसआरसीसी में उनकी पढ़ने की काफी इच्छा थी. जब उन्होंने अपने पिता से इस बात की इच्छा जताई तो उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है जब मैं बोर्ड में इतने ज्यादा अंक ला सकूं कि मुझे हॉस्टल मिल सके. उन्होंने कहा कि जब बैंगलोर में अपनी जॉब से जब मैं परेशान हो चुकी थी तो मेरे फादर इन-लॉ ने लंदन में जॉब की ओर मेरा ध्यान खींचा और अप्लाई करने के लिए प्रेरित किया.

    एक टॉपर का कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद परिवार ने शादी को लेकर मुझपर दबाव डाला. शादी के बाद मेरी पढ़ाई पर असर पड़ा. मेरे दोस्त मेरे ऊपर व्यंग्य करते थे. लेकिन मैने हार नहीं मानी और पढ़ाई को आगे जारी रखने का फैसला किया. अब मेरे पैरेंट्स ने भी मेरी पढ़ाई को आगे जारी रखने को लेकर हामी भर दी है.

    एक महिला टॉपर का यह भी कहना है कि ऐसा नहीं कि जेंडर की वजह से भेदभाव झेलना पड़े लेकिन कहीं न कहीं न कहीं वर्क प्लेस पर पुरुषों के बीच घिरे होने का अहसास होता है.