कॉलेज की परीक्षा से अलग है आईएएस का एग्जाम, पास करने के लिए बदलना होगा माइंडसेट

IAS की परीक्षा को पास करने  के लिए अभ्यर्थियों को अपना माइंडसेट बदलना होगा.
IAS की परीक्षा को पास करने के लिए अभ्यर्थियों को अपना माइंडसेट बदलना होगा.

UPSC Exam Tips: प्रतियोगी परीक्षाएं यह मांग करती हैं कि आप उन्हें अपना सर्वोत्तम दें. यहां उस क्षमता से काम नहीं चलता कि कोर्स पढ़ लिया और पास हो गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 12:06 PM IST
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कॉलेज की परीक्षाएं पास और फेल होने की नीति पर आधारित रहती हैं. वहां न्यूनतम अंक ले लाइए, आपका वह साल सार्थक हो जाएगा और आप अगली क्लास में पहुंच जाएंगे. इस तरह अन्त में आपको एक डिग्री मिल ही जाएगी. पर प्रतियोगी परीक्षाएं ऐसी नहीं होतीं. यहां पास और फेल का सिद्धान्त काम नहीं करता, सिलेक्शन का सिद्धान्त काम करता है. प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सिलेक्ट किए जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या पहले से ही घोषित होती है.

परीक्षा आयोजित की जाती है और अन्तिम परिणाम में मेरिट के आधार पर उतने विद्यार्थी चयनित घोषित कर दिए जाते हैं, जितने अधिकारियों की उन्हें जरूरत होती है. जाहिर है कि ऐसी स्थिति में हो सकता है कि आपने परीक्षा में मार्क्स तो साठ प्रतिशत स्कोर किए हों, लेकिन आप सिलेक्ट नहीं हो पाए हों. इसका मतलब यह हुआ कि जो सिलेक्ट हुए हैं, उनके अंक आपकी तुलना में अधिक थे. अब आपको फिर से परीक्षा में बैठना पड़ेगा. इस परीक्षा के अंकों की कोई रियायत आपको अगले साल की परीक्षा में नहीं मिलेगी. और न ही इस बात का कोई सर्टीफिकेट मिलेगा कि आपने इस स्तर तक की सफलता प्राप्त कर ली है.

यह मूलतः कॉम्पीटिशन पर आधरित एक ऐसी परीक्षा है, जिसमें हर विद्यार्थी एक-दूसरे के विरोध में खड़ा हुआ है. यह एक ऐसी परीक्षा है, जिसमें आपकी सफलता किसी और की असफलता का तो आपकी असफलता किसी और की सफलता का कारण बनती है. इसलिए इसमें जो क्षमता चाहिए, वह एक प्रकार से खिलाड़ियों वाली मारक क्षमता चाहिए, जिसे हम ‘किलिंग इंस्टिंक्ट‘ के नाम से जानते हैं. इसलिए ऐसी परीक्षा की तैयारी की पद्धति भी बदल जाती है, क्योंकि आपकी सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आपने कैसी तैयारी की है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि दूसरों की तैयारी कैसी है. हो सकता है कि किसी साल साठ प्रतिशत लाने के बाद भी आपका सिलेक्शन न हो. लेकिन हो सकता है कि उसके अगले ही साल आप पचपन प्रतिशत नम्बर लाएं और आपका सिलेक्शन हो जाए.



यही कारण है कि प्रतियोगी परीक्षाएं यह मांग करती हैं कि आप उन्हें अपना सर्वोत्तम दें. यहां उस क्षमता से काम नहीं चलता कि कोर्स पढ़ लिया और पास हो गए. यहां आप स्वयं तक सीमित नहीं हैं. यदि बडी क्रूर भाषा में बात की जाए तो यहां पछाड़ने की नीति काम करती है. आपको इतनी ताकत जुटानी पड़ेगी कि आप दूसरों को हरा सकें. क्या आपको नहीं लगता कि यदि इस बात की जरूरत है, तो आपको अपनी तैयारी करने के तरीके में भी परिवर्तन लाना होगा ?
किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से पहले हर विद्यार्थी कम से कम पन्द्रह साल तक तो स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं में बैठ ही चुका होता है. उन परीक्षाओें में बैठते-बैठते उसके पढ़ने, सोचने और लिखने का तरीका एक ठोस रूप अख्तियार कर लेता है. जहां तक राज्यों की सिविल सेवा परीक्षाओं का सवाल है, वहां तो यह तरीका थोड़ा चल भी जाता है, लेकिन आई.ए.एस. की परीक्षा में यह बिल्कुल भी नहीं चलता. सच पूछिए तो उस तरीके की यहां कोई अहमियत ही नहीं रह जाती. किसी भी स्टूडेन्ट के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती होती है कि वह कैसे अपनी इस पुरानी आदत से छुटकारा पाए.

(लेखक पूर्व सिविल सर्वेंट तथा afeias के संस्थापक है.)
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