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नौकरियों का अकाल और लोन का बोझ: टूट रहा है इंजीनियरिंग का सपना

नौकरियों का अकाल और लोन का बोझ: टूट रहा है इंजीनियरिंग का सपना

News18 Creatives by Mir Suhail.

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बीटेक करने के बावजूद किसी दूसरे सेक्टर में छोटी-मोटी नौकरियां करना इन बेरोजगारों के लिए सामान्य सी बात हो गई है.

    रौनक सिंह गुंजन
    इंजीनियरिंग करने वाले तमाम ग्रैजुएट्स रोजगार के बड़े संकट से जूझ रहे हैं. इतना ही नहीं उन पर लाखों के एजुकेशन लोन का भी दबाव है. बीटेक करने के बावजूद किसी दूसरे सेक्टर में छोटी-मोटी नौकरियां करना इन बेरोजगारों के लिए सामान्य सी बात हो गई है.

    ऐसे ही एक छात्र पीयूष सेन हैं, जो हेरिटेज इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एक साल पहले पास होने के बाद अब तक नौकरियां ढूंढ़ रहे हैं. बायो टेक्नोलॉजी के स्टूडेंट रहे सेन कई कैम्पस प्लेसमेंट में भी शामिल हुए थे, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली.

    सेन कहते हैं, 'मुझे अब तक नौकरी नहीं मिली, जो मेरे लिए बड़ी परेशानी की बात है. मैं हमेशा से एक बेहतर छात्र रहा हूं. मैं जहां भी नौकरी खोजने जाता हूं, तो वह अनुभव पूछते हैं. अगर आप कैम्पस से प्लेसमेंट नहीं ले पाते तो वाकई यह बहुत मुश्किल हो जाता है.'

    एक ओर जहां सेन इंजनीयरिंग की नौकरी खोज रहे हैं, वहीं बेनेट कॉलेज से पास हर्षित मेहता को जल्द ही यह एहसास हो गया कि उन्हें कैम्पस प्लेसमेंट के जरिये नौकरी नहीं मिलेगी. खुद को बेरोजगारी की आंच से बचाने के लिए उन्होंने ग्रैजुएशन पूरी होने के एक साल पहले से ही एमबीए की तैयारी शुरू कर दी है.

    हर्षित कहते हैं, 'मैंने अपने सीनियर्स को देखा है. उनमें से कई को नौकरी नहीं मिली. मैंने सोचा कि कैम्पस प्लेसमेंट में बैठने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि अच्छी नौकरी तो वहां भी मिलनी नहीं है. अगर नौकरी मिल भी गई तो उसका दायरा 15,000 से 20,000 रुपये होगा. तो मैंने सोचा कि एमबीए करना ही बेहतर होगा.'

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    एक निजी कॉलेज के प्लेसमेंट सेल के हेड ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, 'शायद ही कोई विकल्प है. छात्रों को नौकरियों की जरूरत है. परिवार की मदद करने के लिए उन्हें लोन भी चुकाना है. नौकरियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा तब कठिन हो जाती है, जब बेहद कम कंपनियां आती हैं. पिछले पांच सालों में कंपनियों की संख्या में काफी गिरावट आई है. कम कंपनियों के चलते नौकरियां खुद ब खुद बहुत कम हैं.'


    वहीं टेक महिंद्रा में करने वाले सुमित श्रीवास्तव को नौ महीने पहले इस्तीफा देने को कहा गया था. सुमित ने कहा, 'मैंने कुछ दिन पहले ही जॉइन किया था, इसलिए कभी मेरे मन में नौकरी से हाथ धोने का खयाल भी नहीं आया था. मुझे 2 ऑप्शन दिए गए, या तो मैं इस्तीफा दूं या नोटिस पीरियड सर्व करूं या एक हफ्ते के भीतर छोड़ दूं और एक पैकेज लूं.'

    एग्जीक्यूटिव सर्च फर्म हंटर्स इंडिया ने अनुमान लगाया है कि नई टेक्नोलॉजीज़ को अपनाने की तैयारी कम होने के कारण अगले तीन वर्षों में आईटी क्षेत्र में सालान 1.75 लाख से 2 लाख नौकरियों की कटौती हो सकती है.


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    उधर नैसकॉम इंडिया लीडरशिप फोरम में मैकिंज़ी एंड कंपनी द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए हंटर्स इंडिया के हेड लक्ष्मीकांत ने 17 फरवरी को कहा था, 'मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि इस साल 56,000 आईटी पेशेवरों की नौकरियां जा सकती हैं, लेकिन इसके विपरित नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए कम तैयार होने के कारण अगले तीन वर्षों में वास्तविक नौकरी में कटौती 1.75 लाख और 2 लाख प्रति वर्ष होगी.'

    मैकिंंज़ी इंडिया के प्रबंध निदेशक नोशीर काका ने यह भी कहा था कि उद्योग के लिए बड़ी चुनौती आगे बढ़ने के लिए 50-60 प्रतिशत कार्यबल को बनाए रखना होगा, क्योंकि प्रौद्योगिकियों में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा. यह उद्योग 3.9 मिलियन लोगों को रोजगार देता है और उनमें से अधिकतर को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.

    साल 2003 में यूआर राव समिति ने देश में इंजीनियरिंग ग्रैजुएट्स के बाजार में ज्यादा आने पर सरकार को सतर्क कर दिया था. हालांकि, रिपोर्ट की सिफारिशों को अभी तक औपचारिक रूप से सरकार द्वारा अपनाया जाना बाकी है.

    AICTE की आधिकारिक वेबसाइट के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, भारत भर में इंजीनियरिंग कॉलेजों से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने वाले 41.36 प्रतिशत छात्र 2015-16 में नौकरी पा सके. संख्याएं और आश्चर्यजनक हैं क्योंकि उस वर्ष के लिए सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों में पास करने का प्रतिशत 78.67 प्रतिशत था.

    एस्पायर माइंड्स की साल 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग ग्रैजुएट नौकरी करने योग्य नहीं हैं. उनमें से ज्यादातर गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में नौकरियां लेने या बेरोजगार बने रहने के लिए मजबूर हैं.

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    Tags: Job insecurity, Job Search, Modern Education

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