OPINION: 34 साल बाद मंत्रालय के नाम के साथ शिक्षा नीति भी बदली, आखिर क्या है इसके मायने

OPINION: 34 साल बाद मंत्रालय के नाम के साथ शिक्षा नीति भी बदली, आखिर क्या है इसके मायने
नई शिक्षा नीति में तमाम तरह के बदलाव किए गए हैं.

New Education Policy 2020: शिक्षा पर कुल जीडीपी के मुकाबले में मौजूदा खर्च 4.43 फीसदी है, जिसे केंद्र और राज्य को मिलकर 6 फीसदी पर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है.

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यह एक संयोग है कि 34 साल पहले जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी (PM Rajiv Gandhi) नई शिक्षा नीति (Education Policy) ला रहे थे, तब शिक्षा मंत्रालय का नाम बदलकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया था. अब जब नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) ने नई शिक्षा नीति को मंजूरी दी है तो मंत्रालय का नाम एक बार फिर बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया. अगर शिक्षा नीति में बदलाव को देखा जाए तो निश्चित तौर से कई मायनों में इसे क्रांतिकारी बदलाव कहा जा सकता है. खास तौर से गरीबों, वंचितों के लिए जिनके बच्चे कतिपय कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते थे या छोड़ने को मजबूर हो जाते थे.

इस नीति के तहत पहली बार स्कूलों में अब मध्यान्ह भोजन के साथ-साथ ब्रेक फास्ट को भी जोड़ने की बात हो रही है. इस नीति का खाका भले 29 जुलाई को कैबिनेट की मंजूरी के बाद सार्वजनिक हुआ, लेकिन इसका ढांचा प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन-1 में ही तय कर दिया था. प्रधानमंत्री मोदी ने जब 1 मई को नई शिक्षा नीति के संदर्भ में विस्तृत बैठक की थी, तो उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ-साथ गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा तक सभी की पहुंच सुनिश्चित करने, शिक्षा में एकरूपता लाने, नए राष्‍ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे के तहत बहु-भाषाई शिक्षा, 21वीं सदी के कौशल, खेल एवं कला के एकीकरण जैसे मुद्दों पर जोर दिया था. इस बैठक में इस तरह की नई शिक्षा नीति बनाने का निर्देश दिया गया था कि भारत को 'ग्‍लोबल नॉलेज सुपर पावर' बनाया जा सके.

सबसे पहले नई शिक्षा नीति में क्या अहम बदलाव हुए हैं, इसको समझना जरूरी है. 1986 के बाद पहली बार शिक्षा को लेकर नई नीति बनी है. जिसे पहले पूर्व कैबिनेट सचिव टीआर. सुब्रमण्यम की कमेटी ने तैयार की और फिर इसरो के चीफ रहे डॉ. के. कस्तूरीरंगन ने भी अपनी रिपोर्ट दी. इस रिपोर्ट के लिए व्यापक विचार विमर्श की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया. करीब सवा दो लाख सुझाव आए, जिसमें सिर्फ अकादमिक जगत ही नहीं, बल्कि सामान्य लोगों और अभिभावकों को भी शामिल किया गया. इस नीति से अब चार साल के उच्च शिक्षा कोर्स में अगर कोई छात्र एक-दो या तीन साल भी पढ़ाई करता है और बाद में किसी मजबूरी की वजह से पढ़ाई छूट जाती है तो उसका साल अब खराब नहीं होगा. इसे छात्र के एकेडमिक क्रेडिट में जोड़ दिया जाएगा.



शिक्षा पर कुल जीडीपी के मुकाबले में मौजूदा खर्च 4.43 फीसदी है, जिसे केंद्र और राज्य को मिलकर 6 फीसदी पर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. शोध को बढ़ावा देने के लिए अलग से नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना और शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के मकसद से ऐसा ढांचा खड़ा करने की पहल होगी कि विदेश से आने वाले छात्र भी आएं और भारत से जाने वाले छात्रों को विदेश के उच्च रैंकिंग संस्थानों में मौका मिले. भाषाओं को लेकर भी सभी भारतीय भाषाओं को फोकस करने और उसे मजबूती देने की भी पहल इस नीति से होगी. इतना ही नहीं, सिर्फ अंग्रेजी या हिंदी में उपलब्ध होने वाली ई-सामग्री अब 8 भाषाओं में उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा.
मेंटरिंग यानी स्कूल-कॉलेज के एलुमनि छात्रों को गाइड कर सके, इसकी व्यवस्था भी जा रही है. 1986 में बनी शिक्षा नीति के बाद नवोदय की स्थापना हुई थी और संयोग से मेरी पढ़ाई नवोदय से हुई है. लेकिन आज जब अपने नवोदय के स्कूल को देखने पर महसूस हो रहा है कि छात्रों को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और हमारा एलुमनि ग्रुप मेंटरिंग की अवधारणा पर काम कर रहा है. ऐसे में इस नई पहल को एक बेहतर कदम कहा जा सकता है, जो मौजूदा छात्रों को सिर्फ शिक्षा ही नहीं, मेंटरिंग के माध्यम से प्रेरणा भी मिलेगी.

अगर स्कूली शिक्षा में बदलाव को देखें तो अब प्ले स्कूल जैसी अवधारणा को सरकार अपने माध्यम से जोड़ने जा रही है. इसके पीछे सरकार का मकसद सौ फीसदी साक्षरता को हासिल करना है. इसमें 3 से 6 साल के बच्चों को प्ले स्कूल की तरह ही गतिविधियां कराई जाएगी तो आगे के तीन साल यानी 6-9 की उम्र में जब वह कक्षा 1 से 3 तक होगा, उसमें उसे संख्यात्मक ज्ञान मिल जाए, ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा. पहले 10वीं तक एक जैसी व्यवस्था थी और उसके बाद विषय का स्पेशलाइजेशन होता था. जिसमें बदलाव करते हुए सरकार ने उसे चार स्तर पर ले जाने, बोर्ड की परीक्षा को सहज बनाने, गणित सिखाने के लिए छठी कक्षा से ही कोडिंग की क्लास देने की व्यवस्था की जाएगी. इतना ही नहीं, संगीत, पीटी जैसे अन्य विषय जो पहले वैकल्पिक माने जाते थे, अब एक स्तर पर लाया जाएगा ताकि छात्रों की अभिरूचि बढ़े. इसके जरिए छात्रों के भीतर के टैलेंट को उभारना और 12वीं के बाद उसके अंदर एक स्किल हो, यह सुनिश्चित करना है.

कक्षा छह से ही वोकेशनल कोर्स के जरिए इंटर्नशिप का प्रोग्राम भी रखा जाएगा. छात्रों के लिए वित्तीय सहायता, डिस्टेंस एंड ओपन लर्निंग शिक्षा,ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा के तहत 100 फीसदी प्रौढ़ साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना है. सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को देश में स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली में परिवर्तनकारी सुधार वाला कदम करार दिया है.

अगर इस शिक्षा नीति के निहितार्थ को देखें तो लंबे समय से शिक्षा के भारतीयकरण की जो मांग उठती रही है, उसे साकार करने की दिशा में सरकार ने अहम कदम उठाया है. लेकिन कोरोना के बाद जिस तरह से कार्य संस्कृति बदली है, उसमें शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता है. इसलिए सरकार ने शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ व्यापक मंथन के बाद इस नीति का आकार दिया है. सरकार ने इस नीति में भारतीयकरण के साथ-साथ उसे ग्लोबल ढांचे को जोड़ा है ताकि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार पर लगने वाले भगवाकरण के आरोपों से बचा जा सके. नई शिक्षा नीति में सरकार ने फ्रेमवर्क के जरिए ढांचा तो खड़ा कर दिया है, लेकिन अब इसके क्रियान्वयन के लिए तैयार होने वाले पाठ्यक्रम और अन्य उपायों पर सभी स्टेकहोल्डर्से के साथ-साथ विरोधियों की पैनी निगाह रहेगी. लेकिन इस फ्रेमवर्क को देखते हुए नई शिक्षा नीति एक अहम पायदान पर पहुंच गई है जिसका इंतज़ार सभी को लंबे समय से था.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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