केंद्र सरकार की नौकरियों में कितनी हो गई ओबीसी की भागीदारी?

मोदी सरकार में ओबीसी की बहार, केंद्र सरकार की नौकरियों में 21.57 फीसदी हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग, 2012 में थे सिर्फ 16.55 परसेंट

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 10, 2019, 7:33 AM IST
केंद्र सरकार की नौकरियों में कितनी हो गई ओबीसी की भागीदारी?
ओबीसी के अंदर ज्यादा पिछड़े लोगों को लाभ देने की कोशिश में सरकार! (File Photo)
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: June 10, 2019, 7:33 AM IST
केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की भागीदारी बढ़ गई है. जनवरी 2012 में ओबीसी का नौकरियों में प्रतिनिधित्व 16.55 परसेंट था जो मोदी सरकार के दौरान जनवरी 2016 में 21.57 परसेंट हो गया. हालांकि अब भी उनके लिए निर्धारित 27 पर्सेंट तक पहुंचना बड़ी चुनौती है. पिछड़ा वर्ग की आबादी देश में सबसे ज्यादा करीब 52 फीसदी है. लेकिन केंद्र की नौकरियों में वे अपनी आबादी से आधी संख्या में भी नहीं हैं. जानकारों को उम्मीद है कि जब 2018 के आंकड़े आएंगे तो स्थिति और सुधरी होगी.

यह आंकड़ा संघ लोकसेवा आयोग एवं चुनाव आयोग सहित 78 मंत्रालयों, विभागों और उनसे संबंधित कार्यालयों में काम करने वाले ओबीसी कर्मचारियों का है. केंद्र सरकार ने दिसंबर 2014 में ही रिजर्व सीटों के बैकलॉग की पहचान करने, ऐसा होने के कारण जानने और विशेष भर्ती अभियान के जरिये ऐसे खाली स्थानों को भरने के लिए मंत्रालयों, विभागों को एक आंतरिक समिति गठित करने के निर्देश दिए थे. इसके बाद इसमें तेजी आई है.

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27 फीसदी है केंद्र सरकार में कोटा
कार्मिक विभाग के आंकड़े बताते हैं कि सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद 2011 तक केंद्र की सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग की भागीदारी अनुसूचित जातियों से भी कम थी. केंद्र ने अगस्त 2018 में लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब में कहा था, ‘केंद्र सरकार की सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व अभी उनके लिए निर्धारित 27 फीसदी तक नहीं पहुंच सका है, क्योंकि इस वर्ग के लिए आरक्षण की शुरुआत 1993 में ही हुई.’ अब से डेढ़ दशक पहले केंद्र की सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व महज 4.53 प्रतिशत ही था.

जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की मांग
कार्मिक विभाग के आंकड़ों की मानें तो आज भी सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्ग की भागीदारी 57.79 फीसदी है. वहीं बड़े पदों की बात करें तो ये आंकड़ा 74.48 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. इसीलिए ओबीसी समुदाय के नेता लगातार मांग करते रहे हैं कि एससी/एसटी ( आबादी: एससी-16.63, एसटी-8.6 फीसदी,  आरक्षण: एससी- 15, एसटी- 7.5 फीसदी)  की ही तरह उन्हें भी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण मिले.

लोकसभा में अनुप्रिया पटेल और उपेंद्र कुशवाहा यह मांग उठा चुके हैं. बीजेपी सांसद रहे राजकुमार सैनी भी इस मांग का समर्थन करते रहे हैं. एनएसएसओ (2011-12) की रिपोर्ट बताती है कि ओबीसी के 36.6 फीसदी लोग खेती पर ही निर्भर हैं. ओबीसी में पांच हजार से अधिक जातियां हैं.

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बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि मोदी सरकार हर वर्ग के लिए काम कर रही है, चाहे वो पिछड़ा हो, अनुसूचित जाति का हो या सामान्य वर्ग का. इसीलिए नौकरियों में पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी बढ़ी है. उम्मीद है कि आगे और बढ़ेगी. यही सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास मंत्र है.

पिछड़ों में भी पिछड़े लोगों पर दांव
ओबीसी में भी सबसे पिछड़ी जातियों को लाभ देने के लिए मोदी सरकार ने 27 फीसदी कोटे के अंदर कोटा देने का प्लान बनाया हुआ है. सरकार उन जातियों को ज्यादा लाभ देने की कोशिश में है जो ओबीसी में तो हैं लेकिन उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका. उनकी नौकरियों में भागीदारी नहीं हो पाई. ओबीसी सब-कटेगराइजेशन के लिए 2 अक्टूबर 2017 को सरकार ने एक आयोग गठित किया था. जिसकी अध्यक्ष दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी हैं.

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यह आयोग तय कर रहा है कि ओबीसी में शामिल ऐसी कौन सी जातियां हैं जिन्हें आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिला और ऐसी कौन सी जातियां हैं जो आरक्षण की मलाई खा रही हैं. माना जाता है आरक्षण का लाभ कुछ ही जातियों ने उठाया. बाकी सब हाशिए पर रहीं.

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