SC/ST के उप-वर्गीकरण पर 2004 के फैसले पर पुनर्विचार करने की जरुरत: सुप्रीम कोर्ट

SC/ST के उप-वर्गीकरण पर 2004 के फैसले पर पुनर्विचार करने की जरुरत: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ड ने कहा, शिक्षण संस्थानों में नौकरियों और प्रवेशों में कोटा देने के लिए, पुन: विचार करने की आवश्यकता है.

हाई कोर्ट ने शीर्ष अदालत के 2004 के फैसले पर भरोसा किया था और यह माना था कि पंजाब सरकार को एससी / एसटी को उप-वर्गीकृत करने की कवायद करने का अधिकार नहीं था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 27, 2020, 12:58 PM IST
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के दौरान कहा, उसके 2004 के फैसले में कहा गया है कि राज्यों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को उप-वर्गीकृत करने की शक्ति नहीं है. शिक्षण संस्थानों में नौकरियों और प्रवेशों में कोटा देने के लिए, पुन: विचार करने की आवश्यकता है.

2004 के फैसले पर पुनर्विचार
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, ई वी चिन्नाया मामले में संविधान पीठ के 2004 के फैसले पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. इसलिए, इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उचित निर्देश के लिए रखा जाना चाहिए.

2004 का फैसले सही ढंग से तय नहीं
न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, एम आर शाह और अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा, 2004 के फैसले को सही ढंग से तय नहीं किया गया था. राज्य एससी / एसटी के भीतर जाति को अधीन करके preferential treatment देने के लिए कानून बना सकते हैं.



फैसला फिर से शुरू 
पीठ ने पंजाब सरकार द्वारा सीजेआई न्यायमूर्ति एस ए बोबडे के समक्ष उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर मामले के पहले के फैसले को फिर से शुरू करने के लिए रेफर किया.

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पंजाब सरकार को एससी / एसटी को उप-वर्गीकृत का अधिकार नहीं
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को एससी / एसटी को उप-वर्गीकृत करने के लिए सशक्त बनाने वाला एक राज्य कानून बनाया था. हाई कोर्ट ने शीर्ष अदालत के 2004 के फैसले पर भरोसा किया था और यह माना था कि पंजाब सरकार को एससी / एसटी को उप-वर्गीकृत करने की कवायद करने का अधिकार नहीं था.
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