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    कबाड़ का काम करने वाले के बेटे ने पास की मेडिकल प्रवेश परीक्षा, जानें पूरी कहानी

    अरविंद कई सालों से प्रयास कर रहे थे.
    अरविंद कई सालों से प्रयास कर रहे थे.

    उन्होंने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने परिवार और खुद के आत्मविश्वास को दिया. अरविंद ने बताया कि उनकी माता अनपढ़ है और पिता सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही पढ़े हैं.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 26, 2020, 6:51 PM IST
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    NEET प्रवेश परीक्षा 2020: 26 साल के अरविंद कुमार (Arvind Kumar) के लिए मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में सफलता पाना महज एक सपना ही था. उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के अरविंद के पिता कबाड़ी का काम करते हैं. अरविंद का सपना एक डॉक्टर बनने का है. अरविंद के लिए मेडिकल क्षेत्र में जाने की राह इतनी आसान नहीं थी. गौरतलब है कि अरविंद ने नौवें प्रयास में इस परीक्षा में सफलता पाई है और आज उनका हौसला बुलंदियों पर है.

    बता दें कि अरविंद पहली बार 2011 में ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) में शामिल हुए थे. अब यह परीक्षा नीट नाम से करवाई जा रही है. अरविंद का कहना है कि उन्हें यह सफलता नौवें प्रयास में मिली है. अरविंद ने ऑल इंडिया स्तर पर 11063 रैंक हासिल की है. वहीं, ओबीसी श्रेणी में उनकी रैंक 4,392 है. अरविंद ने अपनी इस सफलता के बारे में बताया कि लगातार असफल होने के बाद भी उन्होंने कभी अपने हौसले को पस्त नहीं होने दिया.

    अरविंद ने कहा कि 'मैं नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलने के प्रयास में जुटा रहा.  उन्होंने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने परिवार और खुद के आत्मविश्वास को दिया. अरविंद ने बताया कि उनकी माता अनपढ़ है और पिता सिर्फ पांचवीं कक्षा तक ही पढ़े हैं. अरविंद के पिता का नाम भिखारी है जिसके कारण उन्हें समाज में खूब अपमानित होना पड़ता था. पिता भिखारी काम के सिलसिले में दो दशक पहले जमशेदपुर के टाटानगर चले गए थे. कुछ साल पहले ही अरविंद के पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए कुशीनगर आए थे.



    बता दें कि अरविंद के दसवीं कक्षा में 48.6 और 12वीं 60 फीसदी अंक आए थे. यहां से अरविंद के पिता ने बेटे को डॉक्टर बनाने का सपना देखा. भिखानी ने बताया है कि उनके बेटे के कोटा में रहने का खर्च पूरा करने के लिए वह रोजाना 12 से 15 घंटे तक काम करते थे. भिखारी आज बेटे अरविंद की सफलता पर कहते हैं कि उन्हें अपने बेटे पर गर्व है. उन्होंने बताया कि भाई अमित ने भी अरविंद को लगातार प्रोत्साहित किया और उसने ही अरविंद को कोटा जाने का सुझाव दिया था.
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    अपनी सफलता पर अरविंद का कहना है 'मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मेरा परिवार मुझ पर बहुत भरोसा करता है, क्योंकि अपने गांव से मैं पहला व्यक्ति हूं जो डॉक्टर बनने जा रहा हूं, मेरे गांव की आबादी दो हजार भी नहीं है. बता दें कि अरविंद एक हड्डी रोग विशेषज्ञ बनना चाहते हैं और उनके गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में दाखिले की पूरी उम्मीद है.
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