Success Story: आंखों की रोशनी खोई लेकिन हौसला नहीं, बने पहले दृष्टिहीन जज

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Updated: August 28, 2019, 3:15 PM IST
Success Story: आंखों की रोशनी खोई लेकिन हौसला नहीं, बने पहले दृष्टिहीन जज
ब्रह्मानंद ने जनवरी 2016 में चित्तौड़गढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में जॉइन किया.

2008 में बार आरजेएस की परीक्षा में सफलता नहीं मिली. तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर गए तो सेंटर वालों ने दाखिला देने से मना कर दिया. लेकिन वे नहीं हारे. तैयारी में पत्नी और भतीजे ने मदद की.

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Success Story: न्यूज18 हिंदी पर आज की सक्सेस स्टोरी एक ऐसे दृष्टिहीन शख्स की है. जिसने शारीरिक विकलांगता को लक्ष्य के आड़े नहीं आने दिया. दृष्टिहीनता को सपनों पर हावी नहीं होने दिया और वे राजस्थान के पहले दृष्टिहीन न्यायाधीश बने. पढ़ें राजस्थान के पहले नेत्रहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की कहानी. 31 साल के ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोट्रास गांव से हैं. वे अजमेर जिले के सरवर शहर में सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर हैं. उनकी आंखों की रोशनी 22 साल की उम्र में ग्लेकोमा बीमारी की वजह से चली गई थी.

ग्रामीण परिवेश के ब्रह्मानंद ने सरकारी स्कूल पढ़ाई है. उनके पिता रिटायर्ड शिक्षक हैं. ब्रह्मानंद बचपन से जज बनना चाहते थे. लेकिन आर्थिक तंगी के चलते जो नौकरी मिली उन्होंने कर ली. इच्छा न होने के बावजूद उन्होंने 1996 में भीलवाड़ा में सार्वजनिक निर्माण विभाग के दफ्तर में एलडीसी के पद के नौकरी की. उइसी नौकरी के दौरान जज बनने के अपने सपने को पूरा करने की कोशिशों में लग गए. नौकरी के साथ ही राजस्थान जुडिशल सर्विस (RJS) की परीक्षा की तैयारी शुरू की.

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31 साल के ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोट्रास गांव से हैं.


कोचिंग सेंटर वालों ने दाखिला देने किया इनकार

2008 में बार आरजेएस की परीक्षा में सफलता नहीं मिली. तैयारी के लिए कोचिंग सेंटर गए तो सेंटर वालों ने दाखिला देने से मना कर दिया. लेकिन वे नहीं हारे. तैयारी में पत्नी और भतीजे ने मदद की. तैयारी के लिए पत्नी और भतीजे की आवाज में किताबों को वे दिनभर रिकॉर्ड करवाते और रात में सुनकर याद करते. मेहनत का फल 2013 में मिला. राजस्थान ज्यूडिशियल सर्विसेज (आरजेएस) की परीक्षा में 83वीं रैंक हासिल की.

मामला हाईकोर्ट पहुंचा
2013 में 20 नवंबर आरजेएस में चयनित 114 में से 112 कैंडीडेट्स को पोस्टिंग दी गई. दृष्टिहीन होने के कारण उनकी नियुक्ति अटक गई. मामला हाईकोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट ने नियुक्ति की सिफारिश की और वे राजस्थान के पहले नेत्रहीन जज बने. 1 साल की ट्रेनिंग मिली. जनवरी 2016 में चित्तौड़गढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में जॉइन किया. अब ट्रांस्फर सरवर किया गया.
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वकील को आवाज से पहचान लेते हैं. सैकड़ों वकीलों में भी वे किसी को पहचानने में धोखा नहीं खाते. हर पक्ष की बातों को सुनने के लिए ई-स्पीक डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं. ये डिवाइस किसी भी नोट्स को पढ़कर सुनाती है.

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First published: August 28, 2019, 4:49 AM IST
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