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Success Story: कभी नहीं थे खाने के भी पैसे, अपने दम पर बने एक्टर

Success Story

Success Story: एक समय था जब जेब में घर का किराया (Rent) देने और खाने (Food) के पैसे (Money) भी नहीं थे. लेकिन हिम्मत नहीं हारी. अपनी मेहनत (Hardwork) और संघर्ष (Struggle) के दम पर एक्टर और राइटर बने. उसी का नतीजा है कि आज वे फ़िल्म इंडस्ट्री (Film Industry) में दूसरे स्ट्रगलर्स (Strugglers) की मदद कर रहे हैं.

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    Success Story: खुद ही को कर बुलंद इतना, कि हर तक़दीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है... एक्टर (Actor) और राइटर (Writer) राघव तिवारी (Raghav Tiwari) पर ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं. एक समय था जब जेब में घर का किराया (Rent) देने और खाने (Food) के पैसे (Money) भी नहीं थे. लेकिन हिम्मत नहीं हारी. अपनी मेहनत (Hard work) और संघर्ष (Struggle) के दम पर एक्टर और राइटर बने. उसी का नतीजा है कि आज वे फ़िल्म इंडस्ट्री (Film Industry) में दूसरे स्ट्रगलर्स (Strugglers) की मदद कर रहे हैं. चलिए जानते हैं राघव की सफलता (Success) के सफर की कहानी, उन्हीं की जुबानी.

    जयपुर के मानसरोवर से है नाता:
    राघव तिवारी जयपुर (Jaipur) के मानसरोवर क्षेत्र से हैं. परिवार में माताजी, एक छोटा भाई और उनकी पत्नी हैं. उनके पिता की नवंबर 2014 में कैंसर (Cancer) से मृत्यु हो गई थी. लेकिन मौजूदा मुकाम तक पहुंचने में पिता ने बहुत मदद की.
    राजस्थान और एमपी से की पढ़ाई:
    राघव की शुरुआती पढ़ाई राजस्थान के जयपुर से हुई. इसके बाद पिता का ट्रांसफर मध्यप्रदेश (MP) के छिंदवाड़ा में हो गया. 10वीं वहीं से पास की. इसके बाद वापस जयपुर लौटे. जयपुर से 12वीं, ग्रेजुएशन और पीजी की पढ़ाई पूरी की. राघव बताते है कि पिता के ट्रांसफर्स के दौरान कई बार स्ट्रलिंग फेस देखा, कई मर्तबा विपरित परिस्थितियों के चलते पढ़ाई ड्रॉप हुई, लेकिन फादर से मिले हौंसले ने हिम्मत हारने नहीं दी और राजस्थान यूनिवर्सिटी से अपनी ही फील्ड ड्रामेटिस्क (Dramatics) से ही पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा हासिल किया.
    2007 से शुरू हुआ एक्टिंग करियर:
    राघव बताते हैं कि साल 2007 में एक टीवी सीरियल शूट हो रहा था. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी उस समय 'उपनिषद गंगा की शूंटिंग कर रहे थे. वे वहां ऑडिशन देने पहुंचे और सलेक्ट हो गए. बस यहीं से उनके एक्टिंग करियर (Acting Career) की शुरूआत हो गई और राघव ने एक्टिंग को ही अपना प्रोफेशन बनाने का फैसला किया

    2010 में फिल्मों में हुई एंट्री:
    राघव तिवारी की फिल्मों में एंट्री साल 2010 में हुई. 2010 में एक्टर विनय पाठक की फ़िल्म 'चलो दिल्ली' आई थी. राघव ने पहली बार उस फिल्म में ही एक छोटा रोल निभाया था. इस फ़िल्म के बाद साल 2011 में वे मुंबई गए और आगे के सफर के लिए स्ट्रगल किया.

    2014 तक हैंडल किया कैमरा:
    मुम्बई पहुंचकर दूसरों की तरह राघव ने भी काफी स्ट्रगल किया. छोटे-मोटे रोल करते रहे. लेकिन 2014 तक मुख्य तौर पर ऑडिशंस में कैमरा हैंडल किया. इसका नतीजा ये हुआ कि लोगों ने उन्हें एक्टर समझना ही बंद कर दिया था. लेकिन थिएटर में जो सीखा, उसने कॉन्फिडेंस (Confidence) बनाए रखा । इसी बीच मुंबई जर्नी के साथ 2013 में एक और स्ट्रगल फेस आया गया, पिता को कैंसर हुआ और 2014 में उनका ऑपरेशन हुआ. फरवरी 2014 में पिता ने फ़ोन किया कि अब ज्यादा समय नहीं रहूंगा. तू घऱ आ जा।

    फरवरी 2014 में ही फ़िल्म मैरीकॉम के लिए आया फोन:
    राघव बताते हैं कि 'चलो दिल्ली' के बाद उन्हें कास्टिंग डायरेक्टर श्रुति महाजन का फोन आया। इसके बाद राघव फ़िल्म 'मैरीकॉम' के लिए सलेक्ट हो गए. यहां से उनकी एक्टिंग की गाड़ी दोबारा पटरी पर लौट आई. लेकिन जब मैरीकॉम की शूटिंग पूरी हुई तब तक उनके पिता की तबीयत ज्यादा बिगड़ चुकी थी। राघव घर लौट आए, सितंबर में फिल्म रिलीज हुई, लेकिन पिता की अवस्था ठीक नहीं होने के कारण वे खुद ही फिल्म नहीं देख पाए, नवबंर में पिता का देहांत हो गया। पिता के जाने के बाद वे टूट गए, लंबे समय तक मुंबई का रुख नहीं किया, साल 2016 में फिर मुंबई गए। थिएटर क्लासेज शुरू की, नए कलाकारों (Artists) को सिखाया। खुद भी क्राइम पेट्रोल (Crime Petrol) जैसे शोज करते रहे। अब हाल ही रिलीज फिल्म 'द पुष्कर लॉज' में विलेन की भूमिका में निभाई. उसके बाद वे दोबारा टीवी और फ़िल्म इंडस्ट्री में बतौर एक्टर और राइटर लगातार सक्रिय हैं.

    बतौर इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर शुरू किया काम:
    कभी खुद काम ढूंढने के लिए भटकने वाले राघव तिवारी अब नए स्ट्रगलर्स की मदद कर रहे हैं. वे जल्द ही अपना प्रोडक्शन हाउस भी शुरू करने जा रहे हैं, ताकि नए टैलेंट को वहां मौका दिया जा सके. इसके तहत वेब सीरीज के साथ फिल्में भी बनाएंगे.

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