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Success story: पिता ने कहा था- घर गिरवीं रख दूंगा लेकिन तुम तैयारी करो, ऐसे बना IAS

News18Hindi
Updated: November 22, 2019, 11:19 AM IST
Success story: पिता ने कहा था- घर गिरवीं रख दूंगा लेकिन तुम तैयारी करो, ऐसे बना IAS
इन्होंने पांचवें अटेंप्ट में 2018 की परीक्षा में 261वीं रैंक हासिल की.

Success story: पांच अप्रैल 2019 को रिजल्ट आया तो 261वीं रैंक थी. पापा को कॉल किया, गला रुंध गया. मैं कुछ बोल नहीं पाया. बस उनसे इतना कहा, आपका इं‍तजार खत्म, मैं अब सेलेक्ट हो गया हूं.

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  • Last Updated: November 22, 2019, 11:19 AM IST
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Success story: न्यूज18 हिंदी पर आप हर दिन एक ऐसी शख्सियत की Success story से रूबरू होते हैं, जिसने विषम परिस्थितियों से जीतकर कामयाबी हासिल की. आज की कहानी में मिलिए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा पास कर चुके सैयद रियाज अहमद से. इन्होंने पांचवें अटेंप्ट में 2018 की परीक्षा में 261वीं रैंक हासिल की.

नागपुर के रियाज घर में खास एजुकेटेड माहौल में नहीं पले बढ़े. स्कूली शिक्षा की बात करें तो उनके माता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं है. लेकिन उन्होंने अपने बेटे को पूरा सपोर्ट किया. रियाज की मां ने 7वीं तक, पिता तीसरी क्लास तक स्कूली शिक्षा हासिल की. एजुकेशन में गाइडेंस की कमी के चलते रियाज 12वीं में एक सब्जेक्ट में फेल हुए. लेकिन एक बार फेल होने के बाद उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया.

लीडरशिप को एजुकेशन में कैसे ढालें 
रियाज कॉलेज के दौरान में स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स में शामिल हुए. 2013 में बतौर स्टूडेंट लीडर रहे लेकिन लीडरशिप ज्वाइन करने में घरवालों का सपोर्ट नहीं था. तब उन्होंने सोचा, लीडरशिप को एजुकेशन में कैसे ढालें और फिर सिविल सर्वेंट का विकल्प सूझा. उसी साल से वे सिविल सेवा परीक्षा की तैयारियों में जुट गए. 2013 में ही तैयारी के लिए पूना गए. उस समय कुछ नहीं पता था, न टेस्ट सीरीज के बारे में, न तैयारी के अलग अलग तरीकों के बारे में.

जामिया की आईएएस एकादमी में दाखिला
2014 में पहला अटेंप्ट दिया, प्रीलिम्स से ही फेल हुए. 2015 में जामिया की आईएएस एकादमी में दाखिला और उसी साल प्रीलिम्स एग्जाम में 93 सवाल किए. लेकिन निगेटिव मार्किंग थी तो एक नंबर से रह गए. पास न होने की वजह तैयारी ठीक नहीं होना रही. तब समझा आया खराब स्ट्रेटजी मेन वजह है. फिर प्रीलिम्स के लिए खुद स्ट्रेटजी बनाई, उसे 1-2-3 स्ट्रेटजी नाम दिया. 1 यानी वो सवाल जिन्हें लेकर वे कान्फीडेंट थे. 2 यानी वे सवाल जिसमें वे कन्फ्यूज्ड हैं, उन्हें छोड़ दें. 3 यानी वो सवाल जो बिल्कुल नहीं आते.

खुद स्ट्रेटजी बनाई
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2016 में तीसरे अटेंप्ट में इस स्ट्रेटजी से प्री-मेन्स क्वालीफाई किया, लेकिन इंटरव्यू में फेल हुए. घरवालों ने फिर भी सपोर्ट किया. इस दौरान पिता रिटायर हो गए थे. अब उन्हें फाइनेंशियली सपोर्ट खुद ही तलाशना था. तीसरे अटेंप्ट में फेल होने के बाद पिता ने कहा, तुम तैयारी न छोड़ो. हम चाहे घर गिरवी रख दें या बेच दें, लेकिन तू तैयारी कर.

2017 में फिर से चौथी बार परीक्षा दी. चौथे अटेंप्ट में मेन्स क्लीयर हुआ लेकिन इंटरव्यू में नहीं आया. पापा से कहा कि तैयारी छोड़ दूंगा और घर आकर बिजनेस शुरू करूंगा. पिता ने फिर समझाया, छोड़ना है तो छोड़ दो लेकिन सपना सपना ही रह जाएगा.

पिता के भरोसे ने दी हिम्मत
साल नौकरी तलाशनी. स्टेट सर्विसेज की परीक्षा दी. बहुत अच्छे नंबर से पास की और रेंज फारेस्ट ऑफिसर बन गया. वहां से मुझे फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बनी. 2018 यानी पांचवें अटेंप्ट में तीसरे-चौथे अटेंप्ट से भी कम तैयारी की थी. लेकिन मेन्स पास हुआ. कट ऑफ में 90 नंबर ज्यादा थे. अब बचा था सिर्फ इंटरव्यू.

उम्मीद थी कि इंटरव्यू अच्छा होगा, मॉक इंटरव्यू में अच्छे नंबर मिल रहे थे. इंटरव्यू से बाहर आया तो पिता से कहा कि इंटरव्यू काफी खराब था. पापा ने हौसला बढ़ाते हुए कहा, मुझे लग रहा है कि तू आईएएस बन गया. पांच अप्रैल 2019 को रिजल्ट आया तो 261वीं रैंक थी. पापा को कॉल किया, गला रुंध गया. मैं कुछ बोल नहीं पाया. मैं यकीन नहीं कर पा रहा था. पिता से कहा, आपका इं‍तजार खत्म, मैं अब सेलेक्ट हो गया हूं.

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First published: November 22, 2019, 11:19 AM IST
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