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किस ओर जा रहा है आपका करियर? ये तीन फैक्टर्स करते हैं फैसला!

किस ओर जा रहा है आपका करियर? ये तीन फैक्टर्स करते हैं फैसला!

सांकेतिक तस्वीर Image: Reuters

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इन तीनों फैक्टर्स के क्या मायने हैं? ये तीनों फैक्टर्स मिलकर श्रम बाजार को नया आकार दे सकते हैं. श्रम की मांग और आपूर्ति वेतन पर भी प्रभाव डाल सकती है.

    अभिजीत भादुरी

    डेमोग्राफिक्स, ऑटोमेशन और इनइक्वेलिटी इन तीनों फैक्टर्स को करियर पर बड़ा प्रभाव डालने के लिए ग्लोबल मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म द्वारा सूचीबद्ध किया गया है.

    इन तीनों फैक्टर्स के क्या मायने हैं? ये तीनों फैक्टर्स मिलकर श्रम बाजार को नया आकार दे सकते हैं. श्रम की मांग और आपूर्ति वेतन पर भी प्रभाव डाल सकती है. जब कौशल की अच्छी मात्रा में आपूर्ति होती है तो ये वेतन को कम करती है. इन तीनों फैक्टर्स में से, मेरा मानना है कि जन्म दर जब दूसरे फैक्टर्स जैसे सुधरते स्वास्थ्य, दवाओं और अवेयरनेस की वजह से ज्यादा जीने की क्षमता के साथ जुड़ जाता है तो आपके करियर के रास्ते को निर्धारित कर सकता है.

    लेबर पूल का विस्तार
    अपनी किताब 'द राइज एंड फाल ऑफ नेशंस' में इकोनॉमिस्ट रुचिर शर्मा बताते हैं कि कामकाजी आबादी में आर्थिक विकास का ट्रिगर 2.1 प्रतिशत की वृद्धि में है. कई देशों में जन्म दर गिर रहा है. हाल ही में 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने लिखा कि रेस्टोरेंट्स बर्गर को फ्लिप करने के लिए रोबोट का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त लोग नहीं मिल रहे. रोबोट का इस्तेमाल उत्पादकता को भी बढ़ावा देता है क्योंकि मशीन शिकायत नहीं करते और साल में 365 दिन काम करते हैं.

    जब जन्म दर गिरती है और लोग लंबे समय तक जीवित रहते हैं, तो दो चीजें होती हैं-
    1. माल और सेवाओं की मांग में कमी आती है. उम्र में बड़े लोग युवाओं की तरह कई सामान और सेवाओं के लिए पैसे खर्च नहीं करते. इसलिए न बेचे गए सामान निर्माताओं को परेशान करना शुरू करते हैं.

    2. 65 साल से अधिक की उम्र के लोगों के बढ़ते हिस्से सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को रोकना शुरू करते हैं. क्योंकि छोटी कामकाजी आबादी को बुजुर्ग आश्रितों की बढ़ती आबादी को संभालना होता है.

    देश को काम की जगहों पर अप्रयुक्त लेबर पूल के लिए पॉलिसी बनानी है. गिरते लेबर पूल के सप्लीमेंट के रूप में महिलाओं, रिटायर्ड लोग, अप्रवासियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

    अप्रवासियों ने पैदा की नौकरियां
    रोबोट अब बेहतर और सस्ते हो रहे हैं. ऑटोमेशन की कीमत कम हो रही है और अब इंसानों का मशीनों से बदलना ज्यादा आकर्षित कर रहा है. इसका मतलब है कि भारत जैसे विकासशील देशों को रोबोट की घटती कीमतों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करनी होगी.

    शिक्षा में निवेश की फिर से जांच की जानी चाहिए. विकासशील देशों में नए टैलेंट पूल्स जैसे महिलाओं, रिटायर्ड लोगों और अप्रवासियों को स्किल्ड करने की जरूरत है. अप्रवासियों को खतरा माना जाता है क्योंकि अपराध से लेकर बेरोजगारी तक सबका इल्जाम उन पर लगता है. सबकि सच्चाई कुछ और है. एप्पल, गूगल ऑरेकल, अमेजॉन, सिमेंटक और ईबे ये सारी कंपनियां अप्रवासियों या उनके बच्चों द्वारा बनाया गया है. फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से 216 अप्रवासियों या उनके बच्चों द्वारा बनाए गए थे.

    एजुकेशन सिस्टम को ठीक करना
    भारत को ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो बुनियादी साक्षरता और रोजगारपरकता को आगे बढ़कर प्रोत्साहित करे. कई संगठन उच्च शिक्षा और गहरी विशेषज्ञता की जरूरत वाली नौकरियों के लिए प्रीमियम का भुगतान करने को तैयार हैं. कई गैर-लाभकारी संगठनों में भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सैलरी दस लाख डॉलर तक पहुंच रही है. दुनिया में इसमें स्किल्ड लोगों की भारी कमी है.

    रिलेशनशिप वर्कर
    मशीनें हर बार हमसे अच्छा परफॉर्म करेंगी. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में गहरी विशेषज्ञता के साथ टेक्नीक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर क्षमता का निर्माण करना मुश्किल हो सकता है. जैसे-जैसे मशीन इंसानों से आगे निकलते हैं, क्रिएटिविटी और मानवीय रिलेशनशिप ही बचते हैं. इसकी वजह से ही भारत उत्कृष्ट बनता है.

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    इस बार हम मशीनों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. यह एक असमान रेस है जब तक कि हम उत्सुक सीखने वालों का देश नहीं बनते.

    Tags: Job and career

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